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Monday , June 21, 2010

भोपाल का दर्द


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शनिवार को खबर आई कि भोपाल गैस हादसे पर बने मंत्रियों के समूह यानी जीओएम भोपाल मामले पर सुप्रीम कोर्ट में क्यूरेटिव यानी सुधार याचिका दाखिल करने का विचार कर रही है। मन में सवाल कौंधा कि आखिर क्यों हादसे के 26 साल और सुप्रीम कोर्ट के फैसले के 14 साल बाद सरकार को लगा कि सुप्रीम कोर्ट ने ये फैसला देते हुए गलती की थी। गलती भी एक बार नहीं, बल्कि दो बार। सुप्रीम कोर्ट ने पहले साल 1996 में आरोपियों के ऊपर से हत्या की श्रेणी में नहीं आने वाले मानव वध की धारा यानी आईपीसी 304 (पार्ट 2) हटा दी और मामूली लापरवाही से हुई मौत की धारा यानी आईपीसी 304 (ए) लगाने का निर्देश दिया। बाद में जब रिवीजन यानी संशोधन याचिका दाखिल हुई, तो सुप्रीम कोर्ट ने बिना सुनवाई किए बंद कमरे में उसे खारिज कर दिया था। आखिर क्या कारण था कि पूरे....

Friday , February 12, 2010

आई एम हर्ट, वी ऑर आल्सो हर्ट...


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\"मुझे इस बात से तकलीफ पहुंची कि 2008 में देश का सबसे सीनियर चीफ जस्टिस होने के बावजूद मुझे सुप्रीम कोर्ट नहीं भेजा गया।\" सत्रह साल तक हाईकोर्ट के जज रहने के बाद पद पर अपने आखिरी दिन दिल्ली के चीफ जस्टिस अजित प्रकाश शाह ने ये बात कही। इस बयान में सिर्फ उनका दुख नहीं झलकता, बल्कि देश की सर्वोच्च अदालत के जज बनने के पैमानों पर भी बड़ा सवाल उठता है। कई बार देश के अलग-अलग हलकों से सुप्रीम कोर्ट का जज बनने यानि कॉलेजियम सिस्टम पर सवाल उठता रहा है। लेकिन देश के बेहतरीन जज कहे जाने वाले जस्टिस शाह की पीड़ा इस सवाल को और ज्यादा गंभीर बना देती है। जस्टिस शाह ने यहां तक कहा कि अगर किसी जज को सुप्रीम कोर्ट का जज नहीं बनाया जाता, तो कॉलेजियम को कम से कम उन कारणों को जरूर बताना चाहिए जिसकी वजह से जज की पदोन्नति....

Friday , January 15, 2010

‘मॉई लॉर्ड यू ऑर नॉट सेकरोसेंट’


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दिल्ली हाई कोर्ट के एक फैसले ने अब तक आम लोगों की निगाहों में खुदा के बराबर मानी जाने वाली न्यायपालिका को उन्हीं के दायरे में लाकर खड़ा कर दिया है। हाई कोर्ट ने साफ कर दिया है कि सूचना के अधिकार का कानून देश की सभी पब्लिक अथॉरिटीज पर लागू है और देश की सर्वोच्च अदालत यानी सुप्रीम कोर्ट भी पब्लिक अथॉरिटी है क्योंकि वो भी संविधान के तहत ही बनी है। कोर्ट ने आरटीआई कानून के बारे में कहा कि निस्संदेह ये भारतीय लोकतंत्र की सबसे महत्वपूर्ण घटना है। इस फैसले ने निश्चित तौर पर न्यायपालिका का कद आम लोगों की निगाह में एकाएक बढ़ा दिया क्योंकि अगर ये फैसला विधायिका करती तो इसकी इतनी महत्ता नहीं होती, लेकिन ये फैसला खुद अपनी सर्वोच्च सत्ता के खिलाफ देश के एक हाई कोर्ट का फैसला था। इस मामले में सबसे पहले आरटीआई के तहत सुप्रीम कोर्ट से....

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विक्रांत यादव के बारे में कुछ और

दिल्ली विश्वविद्यालय से साल 1995 में बी-कॉम (पास) स्नातक। दो साल तक दिल्ली से प्रकाशित एक मैगजीन "एक्सप्रेस न्यूज" में बतौर रिपोर्टर काम किया। साल 1999-2000 तक भारतीय जनसंचार संस्थान (आईआईएमसी) से पत्रकारिता में डिप्लोमा किया। उसके बाद छह महीने तक अमर उजाला नोएडा में काम किया। जनवरी 2001 से जनवरी 2005 तक दैनिक जागरण दिल्ली के लिए रिपोर्टिंग की। फरवरी 2005 से पहले चैनल 7 और अब आईबीएन 7 में रिपोर्टिंग टीम का हिस्सा हूं।
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