बाल गंगाधर तिलक, महात्मा गांधी, डॉ. बिनायक सेन, अरुधंति रॉय और अब असीम त्रिवेदी....वैसे तो इस सूची में दर्ज नामों में विचारधारा का फर्क है, लेकिन एक गजब समानता भी है। इन सभी को कभी ना कभी देशद्रोह के आरोप में गिरफ्तार किया गया। गांधी और तिलक को गुलाम भारत में तो बाकी को आजाद भारत में। इन सबको देशद्रोही बताने के लिए सरकार ने एक ही कानून का सहारा लिया। वो कानून जिसे अंग्रेजों ने 1870 में आजादी के आंदोलन को कुचलने के लिए लागू किया था। उस समय आजादी की लड़ाई लड रहे मतवालों को कुचलने, सरकार के खिलाफ उठने वाली आजाद को दबाने के लिए इस कानून का दुरुपयोग किया जाता था। यहां तक कि समाचार पत्रों के जरिए आम जनता को जागृत करने वाले पत्रकारों के खिलाफ भी जमकर इस कानून का दुरुपयोग किया गया। इंग्लैंड में भी एक ऐसा ही कानून था जिसे जुलाई....
अन्ना हजारे की राजनीतिक पार्टी अभी अस्तित्व में आई भी नहीं है कि उनके दो अहम सिपहसलारों अरविंद केजरीवाल और किरण बेदी में मतभेद खुलकर सामने आ गए हैं। अरविंद का मानना है कि भ्रष्टाचार के लिए सभी राजनीतिक पार्टियां बराबर की जिम्मेदार हैं और किरण का कहना है कि हमें अपना फोकस सिर्फ सत्ताधारी दल पर रखना चाहिए। अरविंद का कहना है कि कोयला ब्लॉक आवंटन में कांग्रेस और बीजेपी दोनों ने मिलकर फायदा उठाया, तो किरण का मानना है कि हमें सिर्फ कांग्रेस का विरोध करना चाहिए। अरविंद का कहना है कि अपनी राजनीतिक पार्टी बनाने और सिस्टम का हिस्सा बनने के बाद ही सिस्टम को सुधारा जा सकता है। तो किरण का मानना है कि सबसे बड़े राजनीतिक दल यानी बीजेपी के साथ मिलकर भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई लड़ी जा सकती है। जाहिर है कि दोनों के बीच भारी मतभेद हैं और ये मतभेद खुलकर सामने आए....
शनिवार को खबर आई कि भोपाल गैस हादसे पर बने मंत्रियों के समूह यानी जीओएम भोपाल मामले पर सुप्रीम कोर्ट में क्यूरेटिव यानी सुधार याचिका दाखिल करने का विचार कर रही है। मन में सवाल कौंधा कि आखिर क्यों हादसे के 26 साल और सुप्रीम कोर्ट के फैसले के 14 साल बाद सरकार को लगा कि सुप्रीम कोर्ट ने ये फैसला देते हुए गलती की थी। गलती भी एक बार नहीं, बल्कि दो बार। सुप्रीम कोर्ट ने पहले साल 1996 में आरोपियों के ऊपर से हत्या की श्रेणी में नहीं आने वाले मानव वध की धारा यानी आईपीसी 304 (पार्ट 2) हटा दी और मामूली लापरवाही से हुई मौत की धारा यानी आईपीसी 304 (ए) लगाने का निर्देश दिया। बाद में जब रिवीजन यानी संशोधन याचिका दाखिल हुई, तो सुप्रीम कोर्ट ने बिना सुनवाई किए बंद कमरे में उसे खारिज कर दिया था। आखिर क्या कारण था कि पूरे....
\"मुझे इस बात से तकलीफ पहुंची कि 2008 में देश का सबसे सीनियर चीफ जस्टिस होने के बावजूद मुझे सुप्रीम कोर्ट नहीं भेजा गया।\" सत्रह साल तक हाईकोर्ट के जज रहने के बाद पद पर अपने आखिरी दिन दिल्ली के चीफ जस्टिस अजित प्रकाश शाह ने ये बात कही। इस बयान में सिर्फ उनका दुख नहीं झलकता, बल्कि देश की सर्वोच्च अदालत के जज बनने के पैमानों पर भी बड़ा सवाल उठता है। कई बार देश के अलग-अलग हलकों से सुप्रीम कोर्ट का जज बनने यानि कॉलेजियम सिस्टम पर सवाल उठता रहा है। लेकिन देश के बेहतरीन जज कहे जाने वाले जस्टिस शाह की पीड़ा इस सवाल को और ज्यादा गंभीर बना देती है। जस्टिस शाह ने यहां तक कहा कि अगर किसी जज को सुप्रीम कोर्ट का जज नहीं बनाया जाता, तो कॉलेजियम को कम से कम उन कारणों को जरूर बताना चाहिए जिसकी वजह से जज की पदोन्नति....
दिल्ली हाई कोर्ट के एक फैसले ने अब तक आम लोगों की निगाहों में खुदा के बराबर मानी जाने वाली न्यायपालिका को उन्हीं के दायरे में लाकर खड़ा कर दिया है। हाई कोर्ट ने साफ कर दिया है कि सूचना के अधिकार का कानून देश की सभी पब्लिक अथॉरिटीज पर लागू है और देश की सर्वोच्च अदालत यानी सुप्रीम कोर्ट भी पब्लिक अथॉरिटी है क्योंकि वो भी संविधान के तहत ही बनी है। कोर्ट ने आरटीआई कानून के बारे में कहा कि निस्संदेह ये भारतीय लोकतंत्र की सबसे महत्वपूर्ण घटना है। इस फैसले ने निश्चित तौर पर न्यायपालिका का कद आम लोगों की निगाह में एकाएक बढ़ा दिया क्योंकि अगर ये फैसला विधायिका करती तो इसकी इतनी महत्ता नहीं होती, लेकिन ये फैसला खुद अपनी सर्वोच्च सत्ता के खिलाफ देश के एक हाई कोर्ट का फैसला था। इस मामले में सबसे पहले आरटीआई के तहत सुप्रीम कोर्ट से....









