गांधी ने 1947 में कहा था कि कांग्रेस का काम पूरा हो चुका है, उसे भंग कर देना चाहिए। इसकी जगह लोकसेवक संघ बनना चाहिए। मगर नेहरू समेत दूसरे कांग्रेसियों को लगा कि गांधीजी सठिया गए हैं। जिस पार्टी ने उन्हें गुलामी के समंदर में नैया बनकर आजादी के तट पर उतारा, उसी को त्याग दें। उधर, गांधी की हत्या हुई और इधर, कांग्रेस गांधी के नाम पर कुंडली मारकर बैठ गई, ताकि उससे संजीवनी हासिल कर सके। पार्टी अब सत्ता सुख भोगना चाहती थी। अगर कांग्रेस का मकसद सिर्फ जनसेवा होता, तो शायद उसे और 63 साल की जिंदगी हासिल न होती। विभिन्नताओं से भरे इस देश की जनता का ध्रुवीकरण कर उसे आजादी के रास्ते पर लाने वाले गांधी की सोच साफ थी। उनकी दृष्टि साफ थी कि अगर कांग्रेस बची, तो सत्ता उसे गंदे तालाब में बदल देगी। इसीलिए उन्होंने इसका रिप्लेसमेंट सोच लिया था। कांग्रेस का....
कहीं पढ़ा था और बाद में कई विद्वानों से सुना भी कि आदमी अपनी जवानी में साम्यवादी होता है और अगर आप साम्यवादी नहीं हैं तो वो जवानी बेकार समझिए। मैं शायद अपनी जवानी से पहले ही साम्यवाद की चपेट में आ गया था। इस हद तक कि एक जमाने में मुझे उसमें दुनिया की हर मुश्किल का हल नजर आता था और इस आसन्न लगने वाली क्रांति की हवाएं आती थीं सोवियत संघ और हिंदुस्तान के बीच समझौते की वजह से हासिल होने वाले सस्ती किताबों के जरिए जो पीपुल्स पब्लिशिंग हाउस, रादुगा और मीर प्रकाशनों की ओर से मेरी मातृभाषा में मुझे मिलती थीं, बेहद सस्ते दामों पर तब मैंने जाना कि मार्क्स, एंगेल्स और लेनिन का हमारी दुनिया को समझने में क्या योगदान रहा है। माओ के बारे में मैंने जाना जरूर था लेकिन कुछ पढ़ा नहीं था। साम्यवाद को जानने की चाह ने मुझे खुद खोजने....
नरेगा का नरक वो सच है, जिसे इस साल बेस्ट इन्वेस्टिगेटिव स्टोरी के न्यूज टेलीविजन अवॉर्ड से नवाजा गया है। नरेगा का नरक घूसखोरों और सरकारी लुटेरों की वजह से घास खाने को मजबूर लोगों की दास्तान है। इस खबर ने संवेदनशीलों को सुन्न किया तो सरकार की बेचारगी और लाचारी दिखाई। पिछले कुछ सालों में टेलीविजन पर दिखी खोजी पत्रकारिता का नायाब नमूना। जिस मीडिया के सामने मौत मनोरंजन हो, पेट भरने के सवाल बचकाना बातें हों, किसानों की खुदकुशी बेमानी बात हो, ऐसे वक्त में गरीबी और भूख की कहानी का सच अगर पुरस्कृत किया जाता है, तो ये अनोखी बात है। साथ ही कुछ आशा जगाने वाली भी। इसे यूं भी कह सकते हैं कि नरेगा में भ्रष्टाचार उजागर करना अगर पुरस्कार के लायक समझा गया है तो ये मौजूदा हिंदी पत्रकारिता में नई घटना है। ऐसे समय जब खबर एंटरटेनमेंट से ज्यादा कुछ नहीं, और....
जिस दिन हिंदुस्तान गणतंत्र की 60वीं सालगिरह मना रहा था, उसी दिन दुनिया की एक बेहद दुर्लभ भाषा दम तोड़ रही थी, हिंदुस्तान में - बो। बो भाषा की आखिरी जानकार की मौत हो गई। 85 साल की बोआ सीनियर अंडमान द्वीप समूह में रहती थी और उसी के साथ वह भाषा भी खत्म हो गई, जिसे दुनिया की ऐसी ढाई हजार भाषाओं में से एक गिना जा रहा था, जो खत्म होने के कगार पर हैं। इंसानी तरक्की और संस्कृति में रुचि रखने वालों के लिए बोआ सीनियर की मौत काफी दुखद है। अब इस भाषा का आखिरी सबूत अगर बचा है तो वह बीबीसी और सीएनएन के पास है- एक ऑडियो फाइल के रूप में, जिसमें इस भाषा के कुछ शब्दों का मतलब और संवाद अदायगी के स्टाइल का पता चलता है। बोआ सीनियर अंडमानीज जनजातियों में काफी बूढ़ी महिला थी, जिनके जिंदा होने से यह....
हमारी हिंदी कितनी संपन्न भाषा है। इसकी बानगी देखिए जरा। सिर्फ एक शब्द के जरिए आपको इसकी ताकत का पता चल जाएगा। दुर्व्यवहार..मीडिया ने इस शब्द की ताकत को दोबाला कर दिया है। आप पूछ सकते हैं कैसे, हम बताते हैं। अगर आपके मुंह पर किसी ने घूंसा चलाया और आपका दांत टूट गया है तो ये दुर्व्यवहार है। किसी ने सदन में आपसे मारपीट की है तो ये दुर्व्यवहार है, सड़क पर आपकी गाड़ी रोककर कोई आपको घसीटता और मारता पीटता है, तो ये भी दुर्व्यवहार है। अगर किसी ने चलती बस में महिला से छेड़खानी की, तो ये भी दुर्व्यवहार है, यहां तक कि अगर कोई महिला से बलात्कार कर देता है तो ये भी दुर्व्यवहार ही होगा। अगर आप कोई अखबार नहीं पढ़ते और न ही टीवी देखते हैं तो बस गूगल बाबा में जाकर ये शब्द टाइप करें- 'से दुर्व्यवहार'.. गूगल आपके सामने 1 लाख 68....
3 ईडियट्स ने एक नया जुमला क्वायन किया- आल इज वैल (न-न, ऑल इज़ वैल नहीं) ऐसा नहीं कि ये पहली बार हुआ है। दरअसल हिंदी फिल्मों को हमेशा एक ताबीज़ की जरूरत होती है जिसके सहारे वो अपनी नैया पार लगा सकें। ये बॉलीवुड फिल्मों के लज़ीज़ व्यंजन का एक अहम इन्ग्रेडिएंट (मसाला) है। बहुत ताकतवर और प्रोड्यूसर-डायरेक्टर अच्छी तरह जानते हैं कि हिंदी फिल्मों के दर्शकों की याददाश्त काफी कमजोर है। हां, अगर फिल्म को बॉक्स ऑफिस के सबसे ऊंचे पायदान पर खड़ा करना है तो उन्हें ये गंडे-ताबीज याद दिलाने होंगे और वो इन्हें बरसों अपने मन में बसाए रखेंगे। ज़ाहिर है कि फिल्म बॉलीवुड में बन रही है तो इस ताबीज़ का इस्तेमाल क्योंकर न हो। थियेटर से बाहर आते ही दर्शक कहता है- - यार, आल इज वैल तो कमाल की चीज है जब आमिर बोलता है न तो पिया की बहन के....
ऑल इज नॉट वैल-3 ईडियट्स यानी हवाई लफ्फाजी के साथ हिंदी फिल्मों के रटे रटाए फॉर्मूलों का जोड़-घटाव। पूरी कहानी का गर्भपात, पैदा तो हुई लेकिन क्षत-विक्षत और मरी हुई, आदर्शवाद का फिल्मी मसाला। 3 ईडियट, एक कन्फ्यूज्ड फिल्म-गंभीर बातों को बेहद दुखद ढंग से पेश करने का बहाना करने वाली, दोहराव में उलझी, तार्किक लगने वाले नकली और थोपे गए सीन ईजाद करने वाली औसत दर्जे की बॉलीवुड मूवी। औकात से ज्यादा प्रचारित फिल्म, जिसने एक अच्छे ख्याल का कत्ल कर दिया जिसमें बगैर किसी तर्क या वजह के जबर्दस्ती इस बात पर जोर देने की कोशिश की गई है कि मौजूदा शिक्षण व्यवस्था खुदकुशियों को बढ़ावा देने वाली और मार्क्स का बोझ खड़ा करने वाली चीज है। ये बात कथानक और उसे कहने के स्टाइल के साथ फिट ही नहीं बैठती। पूरी फिल्म न तो कॉमेडी है (अगर आप पैंट उतारने वाले और इसी तरह के....









