21वीं शताब्दी के इस युग में आज संवाद के माध्यम वाकई काफी बदल गए हैं। इंटरनेट की भूल-भुलैया अब कंप्यूटर की कैद से निकलकर हमारे मोबाइल तक पहुंच गई है। ऑरकुट की जगह अब फेसबुक और ट्विटर ने ले ली है। दौड़ती-भागती इस जिंदगी में अखबार की सुर्खियां पढ़ने का सुख अब चाय की चुस्कियों के साथ नहीं मिलता। ... लेकिन इन सबके बीच जो अब तक नहीं बदली वो है सिनेमा की ताकत। आज भी न्यूज चैनल्स चाहे कितनी भी विविधता और वर्चुअल ग्राफिक्स के सहारे खबरों को आम आदमी से जोड़ने की कोशिश कर लें लेकिन वो एक दर्शक के मन-मस्तिष्क पर वो छाप नहीं छोड़ पाते जो सिनेमाहॉल से 3 घंटे बाद बाहर निकलने पर एक दर्शक खुद में महसूस करता है। आज भी सिनेमा वो हथियार है जिसमें समाज को बदलने की अदभुत क्षमता है। कई बार ये हथियार 'थ्री इडियट्स' के रूप में हमें अपने....









