हिमाचल प्रदेश की राजधानी शिमला से जब मनाली की तरफ निकलो तो रास्ते में या तो टूरिस्टों का सामान लदी गाड़ियां मिलती हैं या फिर कलिंकर की कालिख पुते ट्रक। ये ट्रक दिन रात कानों के परदे फाड़ देने वाली आवाज़ के साथ दौड़ते रहते हैं। रास्ते में छोटे-छोटे ढाबों, जहां-तहां साफ़ सफाई करते ट्रक ड्राइवरों और छोटे-छोटे सर्विस स्टेशनों को देखते निहारते दाड़लाघाट पहुंचते हैं। यहां अचानक ट्रकों से हमारा सफ़र अलग हो जाता है। ट्रक दायें मुड़कर एक नालेनुमा इलाके में गुम हो जाते हैं और मनाली की ख़ूबसूरती में लम्हे बिताने की बेताबी इन ट्रकों की कालिख और भारी आवाज़ को हमारे ज़ेहन से निकाल देती है। ऐसा शायद ही कभी किसी के दिमाग में आया होगा कि ट्रकों की ये भारी भरकम आवाज़ लुटियंस में सुनायी देगी। क्लिंकर की ये कालिख पचास साल पुरानी एक बेदाग़ सियासी इमारत की दीवार को काला कर देगी। मगर ऐसा....
किस्सा तब का है जब चांद शिमला के माल रोड को रोशन करता था और जुगनू दिल्ली के कनॉट प्लेस में टिमटिमाते थे। गोरे भगवान (लॉर्ड) को माल रोड पर कुत्तों और इंडियंस से सामना मंजूर न था। ऐसे में 1936 में एक और लॉर्ड ने अवतार लिया। नाम था लॉर्ड लिनलिथगो, जो खुद को गरीबों का हमदर्द बताता था। भारत में राज का सरताज होने के नाते उसने तय किया कि उसकी शान में जो जश्न मनाया जाए वो बंद कमरे में नहीं बल्कि खुले आसमान के नीचे हो। ऊपर वाला भगवान कहीं खेल न कर दे तो मौसम विभाग को तलब कर जश्न की तारीख तय की गई। जश्न के दिन लाट साहब माल रोड घूमने निकले तो सामने एक धोबी और उसके गधे को पाया। गरीबों से हमदर्दी का दावा था तो भला बिना बात किए कैसे जाते, तो पूछ ही लिया \'बताओ आज बारिश....
थॉमस पैन नाम के एक विचारक हुए जिन्होंने कहा कि \'किसी राष्ट्र की सत्ता का झुकाव सिविल सोसाइटी के पक्ष में होना चाहिए क्योंकि वो इंसान की स्वाभाविक सामाजिक अभिव्यक्ति है। कुछ बुद्धिजीवी समाज और सरकार को एक ही पक्ष समझते हैं जो कि सही नहीं है। समाज लोगों की ज़रूरतों से पैदा होता है जबकि सरकार जनता की आपसी होड़ या झगड़े से पैदा होती है। समाज लोगों के आपसी प्यार को जोड़कर खुशी को बढ़ावा देता है वहीं सरकार हमारे आपसी झगड़ों को दबाकर खुश करने की कोशिश करती है। पहला मेलजोल पर जोर देता है तो दूसरा भेदभाव बढ़ाती है। पहला रक्षक है तो दूसरा दंडक।\' इन थॉमस पैन को अमेरिकी क्रांति का जनक कहा जाता है। बात बात में पैन ने सरकार और सिविल सोसाइटी जैसे दो शब्दों की तुलनात्मक व्याख्या कर दी। बहरहाल, दूसरे पर बाद में आएंगे पहले सरकार पर आते हैं क्योंकि हमने....
'हम भारतीयों में अलग-अलग चीज़ों को भगवान बनाने की आदत है। अगर इस देश में हम किसी चीज़ को खत्म करना चाहते हैं तो हम उसे दैवीय रूप दे देते हैं। इसलिए अगर आप इस संविधान को मारना चाहते हैं तो इसे पावन-पवित्र बना दीजिए। एक ऐसा संविधान जो स्थिर और अपरिवर्तित है, अपनी उपयोगिता गंवा देगा फिर वो चाहे कितना ही अच्छा क्यों न हो। ये बूढ़ा हो जाता है और धीरे-धीरे मौत की तरफ बढ़ता है। इसलिए संविधान को अगर जिंदा रखना है तो उसे बढ़ने वाला, अनुकूलनशील, लचीला और परिवर्तनशील होना चाहिए। लोगों को ये समझना होगा कि ये जो संविधान हमने बरसों की मेहनत के बाद बनाया है ये तब तक अच्छा है जब तक ठीक चल रहा है लेकिन जैसे ही समाज बदलता है, परिस्थितियां बदलती हैं हमें इसमें आवश्यक सुधार करने होंगे। ये उन मीडियन और पर्शियन कानूनों की तरह नहीं है जिन्हें बदला....
'उस वक्त की कल्पना करना बेमानी नहीं है जब हमारे बच्चे अपने घरों में सस्ती बिजली का आनंद उठा पाएंगे, वक्त-वक्त पर दस्तक देने वाले आकाल के बारे में वो इतिहास की किताबों में ही पढ़ पाएंगे, जब वो समंदर के नीचे और ऊपर आसनी से चल पाएंगे, हवा में बिना किसी खतरे और तेज रफ़्तार से उड़ पाएंगे और उनका जीवनकाल हमसे कहीं ज्यादा हो जाएगा जब बीमारियां साधी जाएंगीं और बुढ़ापे का राज़ सामने आएगा' 16 सितम्बर 1954 को नैश्नल एसोसिएशन ऑफ साईंस राइटर को संबोधित करते हुए अमेरिका के एटोमिक एनर्जी कमीशन के उस वक्त के चेयरमन लुईस एल स्ट्रॉस ने इन्हीं शब्दों के साथ परमाणु से बिजली पैदा करने की पैरोकारी की थी। इतिहास में ये भाषण \'चीप टू मीटर\' नाम से मशहूर हुआ। मकसद साफ़ था कि जापान के दो शहरों के लाखों घरों में जिस परमाणु ने मौत का अंधेरा फैलाया था वही....
भौगौलिक नजरिए से देखें तो धर्मशाला और ल्हासा के बीच मीलों का फासला है लेकिन कहने वाले इसे मिनी ल्हासा कहते हैं। दिल्ली और ल्हासा के दिल कुछ 50 साल पहले तब मिले जब एक भिक्षुक ने कहा कि \'भारत संघम शरणम गच्छामि\'! बीजिंग और दिल्ली के बीच न तो दिलों के फासले कम हो पाए हैं और न ही भूगोल के और जब दिल में कहीं कसक हो तो हर घटना में साजिश का दिखना लाजमी है। तो फिर क्या था 11 लाख की बेहद मामूली मुद्रा ने भी बवाल खड़ा कर दिया क्योंकि ये युआन थे। युआन यानी चीन की मुद्रा। चीन का नाम जिस चीज के साथ जुड़ता है वो अपने आप में शक के घेरे में आ जाती है, यहां तो साथ में तिब्बत भी जुड़ गया। युआन और तिब्बत! जिस युआन को तिब्बत में रहने वाले लोग भी मजबूरी समझकर रखते हैं वही युआन अगर....
\'धरती पर ऐसी कोई ताकत नहीं है जो उस विचार को रोक सके जिसका वक्त आ गया हो\' - मशहूर चिंतक विक्टर ह्यूगो ने ये विचार जिस भी संदर्भ में रखे हों लेकिन वित्तमंत्री के रूप में अपने पहले बजट भाषण में मनमोहन सिंह ने जब इन शब्दों को संसद में रखा तो संदर्भ और मकसद बिल्कुल साफ था। वो एक ऐसे दौर की तरफ इशारा कर रहे जहां सरकार अपने आपको व्यापारी या कारोबारी की वजाय नीति निर्माण और उनके सुचारू संचालन तक ही सीमित रखेगी। वो उस वक्त की राजनीति को ये समझाने में कामयाब भी हुए। धनकुबेरों की तिजोरियां खुलने लगीं और देश की आधारभूत संरचना के कायाकल्प का काम जोर पकड़ने लगा। फिर वो चाहे सड़क हो या पानी, रेल हो या हवाई जहाज, संचार हो या टेक्नॉलोजी, स्वास्थ्य हो या फिर शिक्षा, पैसा पानी की तरह बहने लगा। नतीजा सामने है, चंद्रशेखर के जमाने में....
संचार भवन, 20 अशोका रोड - दिल्ली का ये पता शायद हमारे जेहन में वो असर न डालता हो जितना 7RCR या फिर 10 जनपथ। लेकिन ये पता इतना मामूली भी नहीं है। ये उस 'रिंगटोन' का एड्रेस है जिसकी गूंज ने वक्त-वक्त पर 7 रेसकोर्स रोड में 'बाइब्रेशन' पैदा की है। यहां मौजूद कुर्सी में कुछ तो बात है कि जो भी उस पर बैठता है वो दामन में दाग लगाकर ही बाहर निकलता हैं। हालांकि मौजूदा राजनीतिक परिदृष्य में हर कुर्सी शक के घेरे में है लेकिन संचार भवन तो जैसे शाप भवन बन चुका है जो न सिर्फ अपने मुखिया की बल्कि सरकार के मुखिया की कुर्सी का भी नाप लेता है। पिछले दो दशकों में करीब 10 लोगों ने टेलीकॉम मिनिस्ट्री की बागडोर थामी जिनमें से जगमोहन, अरुण शौरी और दयानिधि मारन राजनीतिक वजहों से नप गए तो सुखराम, प्रमोद महाजन और ए. राजा मोह और....
'अगले साल मैं 50 का हो जाऊंगा, लेकिन जितना भी जीवन मैंने जिया है वो उस अमेरिका में था जो अपनी आर्थिक (और सामरिक!) ताकत के दम पर दुनिया के साथ अपनी शर्तों के हिसाब से रिश्ते गढ़ता था। अब दौर बदल गया है। भारत, चीन और ब्राजील जैसे देशों की अद्भुत तरक्की ने (खेल का रुख!) मोड़ दिया है।' मुंबई के सेंट जेवियर कॉलेज कैंपस में 21वीं सदी के भारत ने जब सवाल किया तो 'अंकल' (सैम) ओबामा के इस जवाब ने ये बता दिया कि 'अंकल' सच में जमीन पर उतरे हैं। नए भारत के हर सवाल के जवाब से पहले की वो सकपकाहट साफ बता रही थी कि दिमाग और जुबान का तालमेल भी वक्त के साथ ढीला पड़ चुका है। हालत शायद और पतली होती अगर 'प्रेजीडेंट' ओबामा को बराक हुसैन ओबामा की शानदार पर्सनेलिटी और बेहतरीन कम्युनिकेशन स्किल का साथ न होता। युवा भारत....
मुंबई के पॉश इलाके में सफाई का काम करने वाली सक्कू बाई को पता है कि रोजमर्रा के खर्चे से अगर वो कुछ रुपए बचाकर अपने बच्चे का किसी अच्छे स्कूल में एडमिशन करवाकर अंग्रेजी शिक्षा दिला पाती है तो उसके बच्चे का भविष्य कम से कम उसके अपने वर्तमान से लाख अच्छा होगा। ये भारत का आशावाद है, वहीं दूसरी ओर मिशिगन के किसी कॉर्पोरेट ऑफिस में ऊंची सैलेरी पाने वाली बारबरा या सामंथा, जिनका मौजूदा जीवन स्तर सक्कू बाई से हजार गुना ऊपर है, इस बात को लेकर आश्वस्त नहीं हैं कि उनके बच्चे उनका मौजूदा जीवन स्तर भी बरकरार रख पाएंगे या नहीं? ये अमेरिका का निराशावाद है। 2010 का अमेरिकी समाज एक घोर निराशा के दौर से गुजर रहा है तो 2010 का भारत एक अच्छे भविष्य की आशा में है फिर भले ही वर्तमान में समस्याओं का अंबार ही क्यों न हो। पिछले 60 सालों....




एसोसिएट प्रोड्यूसर





