

नई दिल्ली। दिल्ली का जल विभाग हजारों लोगों को बूंद बूंद पानी के लिए तरसा रहा है। साथ ही बिना पानी दिए यह उन लोगों से इसकी भारी कीमत भी वसूल रहा है। सिटीजन जर्नलिस्ट राजेश परेवा इस गोरखधंधे की कहानी बता रहे हैं। राजेश कहते हैं कि दिल्ली के टिकरी इलाके के जेजे कैंप में 9 बजे रात को सड़कों पर काफी चहल पहल रहती है। यहां के लोग पानी की वजह से घरों के बाहर हैं। यहां टैंकर से पानी सप्लाई किया जाता है और वो भी रात में।
यहां पानी भरना किसी जंग लड़ने से कम नहीं। इसलिए उसी हिसाब से इसकी तैयारी भी की जाती है। सिटिजन जर्नलिस्ट राजेश परेवा दिल्ली की टीकरी कॉलोनी के ही रहने वाले हैं। राजेश दिखा रहे हैं कि राजधानी की एक बस्ती में लोग अपनी जरूरत का पानी कैसे भरते हैं। उन्होंने बताया कि यहां टैंकर आने का कोई वक्त नहीं होता। कभी रात के 12 बजे, कभी 2 बजे और कभी सुबह के 4-5 बजे भी यहां पानी का सप्लाई की जाती है। हद तो तब होती है जब कई बार तीन दिन में एक बार ही पानी आ पाता है।

मुंबई। हर लड़की कभी ना कभी ईव टीसिंग का सामना जरूर करती हैं। गुस्सा और झुंझलाहट दिखाने के अलावा अकसर वो कुछ कर नहीं पातीं। दिल्ली की रहने वाली मेघना वर्मा ने सिटिजन जर्नलिस्ट बनकर इसका मुकाबला किया। मेघना बताती हैं कि जब लड़कियां मुश्किल में होती हैं तो उन घटनाओं का सामना करने में वो लाचार होती हैं कि कैसे मदद मांगे। कैसे अपनों को जल्दी से बुलाएं। ये समझ में नहीं आता। लेकिन महाराष्ट्र के नासिक में तीन नौजवानों ने एक ऐसी मोबाइल एप्लीकेशन तैयार की है जिसके इस्तेमाल से वो बेखौफ और सुरक्षित रह सकती हैं।
दूसरे सिटिजन जर्नलिस्ट गणेश बताशे इस एप्लीकेशन के ऑपरेटिंग के बारे में बता रहे हैं। गणेश एक सॉफ्टवेयर इंजीनियर हैं। वे और उनके साथ काम करने वाले दो दोस्त अनूप उन्नीकृष्णन और जयेश बैंकर अक्सर देखते थे कि महिलाएं सड़कों पर बिल्कुल भी सुरक्षित नहीं हैं। कभी भी कहीं भी उनके साथ छेड़छाड़ होती रहती है। जब वो बिल्कुल अकेली होती हैं तो मदद के लिए भी किसे बुलाएं सोच नहीं पाती।

कानपुर। कानपुर के बर्रा-दो इलाके की पहचान है एक बदहाल पार्क। सिटिजन जर्नलिस्ट नीरज बता रहे हैं कि कैसे दो सालों से वो इस पार्क को संवारने की लड़ाई लड़ रहे हैं। कानपुर नगर निगम के मुताबिक ये वो पार्क है जहां बच्चे खेलते हैं और लोग सैर का मजा लेते हैं पर हकीकत कुछ और ही है।
इसी इलाके में रहनेवाले सिटिजन जर्नलिस्ट नीरज ने बताया कि ये पार्क मेरे घर के काफी करीब है। पिछले 20 सालों से मैं इस इलाके में रहता हूं। इस पार्क में ना चारदीवारी है और ना बच्चों के लिए झूले। पार्क में लगे हैंडपंप ने शायद ही कभी काम किया हो। बचपन से मैंने इस पार्क को इसी हालत देखा। अक्सर यहां पर जानवरों का जमावड़ा रहता है और आसपास के कुछ लोगों ने तो अपनी गाड़ियों की पार्किंग के लिए यहां अवैध कब्जा कर लिया है।

गाजियाबाद। शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए गाजियाबाद डेवेलप्मेंट अथॉरिटी ने कुछ संस्थानों को कौड़ियों के दाम में जमीनों का आवंटन किया। लेकिन जिन लोगों को जमीनें मिलीं उन्होंने उस जमीन का सही उपयोग न करके मनमानी शुरू कर दी। इस धांधली का पर्दाफ़ाश कर रहे हैं सिटिजन जर्नलिस्ट बने सचिन सोनी।
शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए सरकार बेहद कम कीमतों पर निजी संस्थाओं को जमीन एलॉट करती हैं। नियमों के मुताबिक आंवटित जमीन का इस्तेमाल सिर्फ शिक्षण संस्थान चलाने के लिए ही किया जाना चाहिए। इस जमीन का उपयोग किसी दूसरे काम के लिए नहीं किया जा सकता। न ही ये जमीन किसी दुसरी संस्था को ट्रांसफर की जा सकती है।

गाजियाबाद। इस हफ्ते सिटिजन जर्नलिस्ट में है उत्तरप्रदेश के गाजियाबाद शहर में जमीनों के सही इस्तेमाल के लिए संघर्ष करती CJ की कहानी।

कानपुर। इस हफ्ते सिटिजन जर्नलिस्ट में है उत्तर प्रदेश के कानपुर शहर में पार्क के लिए का संघर्ष करता सिटिजन जर्नलिस्ट।

श्रीनगर। जम्मू कश्मीर के कठुआ जिले में 1965 में राज्य सरकार ने एक योजना बनाई थी। इसके तहत गरीबों को मकान बनाने के लिए मुफ्त प्लॉट दिए जाने थे। 50 साल गुजर गए लेकिन लोग आज भी उस आशियाने का इंतजार ही कर रहे हैं। सिटिज़न जर्नलिस्ट बनकर रामपाल पूछ रहे हैं कि आखिर कब बनेगी ये दलित बस्ती।
1965 में राज्य सरकार के सामाज कल्याण विभाग ने कठुआ में दो हजार मकान बनाने के लिए जमीन चिन्हित की थीं। योजना के तहत गरीबों को फ्री प्लॉट दिए जाने थे। लेकिन गरीबों को प्लॉट कभी नहीं मिल सके। सरकार ने जो जमीन खरीदी थी उसपर कुछ दबंग लोगों ने कब्जा कर लिया।

नई दिल्ली। इस हफ्ते सिटिजन जर्नलिस्ट में है देश की राजधानी दिल्ली में पानी बचाने की मुहिम में जुटे दिल्ली के स्कूली बच्चे।

गाजियाबाद। गाजियाबाद के एक इलाके के रहने वाले लोगों ने सुरक्षा और शोर शराबे से बचने के लिए एक सर्विस रोड को गेट लगाकर बंद कर दिया है। अब उस रास्ते से रोजाना गुजरने वाले सैकड़ों लोगों की मुश्किलें बढ़ गईं हैं। और वहां रहने वाली शालिनी सोनी इस नाजायज कब्ज़े को हटवाने के लिए संघर्ष कर रही है। गाजियाबाद के कवि नगर से राज नगर जाने वाली रोड पर जाम रोज की कहानी है। कई लोग इस जाम से बच कर आगे जा सकते हैं अगर पास ही बने कविनगर ब्लाक एच और एफ से सामने से गुजर रही सर्विस लेन का इस्तेमाल कर सकें। लेकिन सर्विस लेन को गेट लगा कर बंद कर दिया गया है।

बैंगलोर। कामकाजी महिलाओं के साथ अगर दफ्तर में किसी तरह का यौन शोषण होता है तो वो खामोश रहती हैं। अगर हालात काबू से बाहर होते हैं, तो वो आवाज़ उठाने का बजाय नौकरी ही छोड़ देती है। हमारी सिटिज़न जर्नलिस्ट एक बेहद हिम्मती महिला हैं। उनकी पहचान को छुपाने के लिए हम आपको उनका नाम और चेहरा नहीं दिखा रहे हैं। लेकिन उनके संघर्ष को दुनिया तक पहुंचाना बेहद जरूरी है। मैं आज सिटिज़न जर्नलिस्ट बनी हूं आपको अपनी लड़ाई से रूबरू कराने के लिए जो कि काम-काज की जगहों पर होने वाले यौन शोषण से संबंधित है।






















































