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भगवान से अपनी बात मनवाने के लिए ऐसा करें!

Updated Nov 27, 2012 at 10:52 am IST |

 

इंडो-एशियन न्यूज सर्विस
रवीन्द्र

एक ऋषि थे। उनकी मंडली में कभी-कभी कुछ नए विद्यार्थी भी आ जाते थे। उनके भी अपने प्रश्न होते थे और ऋषिवर हमसे पहले उन्हें अवसर दिया करते थे।

एक दिन घूमते-घूमते कुछ विद्यार्थी आ गए और आते ही उन्होंने हमारे सामने एक प्रश्न रख दिया, "जब भगवान् कृपा-सिंधु हैं, सर्वशक्तिमान हैं और घर-घर में निवास करते हैं तो फिर दुनिया में इतना कष्ट क्यों है? हम देखते हैं कि भगवान का नाम जपने वाले कुछ कम कष्ट नहीं पाते। हमने भी बहुत बार प्रार्थना की है, पर कोई खास असर नहीं हुआ।"

ऋषिवर अभी तक नहीं आए थे, इसलिए उत्तर देने की जिम्मेदारी हम लोगों ने अपने सिर पर ओढ़ ली। मारिया ने कहा, "हां, यह बात तो ठीक है कि भगवान हर एक प्रार्थना को स्वीकार नहीं करते और यह हमारा सौभाग्य है। संस्कृत के एक श्लोक में कहा गया है- सांपों की, खलों की और लुटेरों की इच्छाएं पूरी नहीं होती, इसलिए यह जगत बना हुआ है।"

कमल बोला, "अरे, दूसरों की बात क्यों? अपनी ही बात ले लो न। कई बार गुस्से में आकर या निराश होकर हम किसी का सत्यानाश चाहते हैं तो कभी अपनी ही मौत बुलाते हैं। हमने ऐसी नारियां देखी हैं, जो खड़ी होकर भगवान से प्रार्थना करती हैं कि उनके पति के शरीर में कीड़े पड़ें लेकिन दूसरे ही क्षण अगर पति के सिर में जरा-सा दर्द हो जाय तो रोती, बिलखती, हा-हा करती हैं। अब बताओ, भगवान कौन-सी और किसी प्रार्थना स्वीकार करें?"

मारिया ने कहा, "हां, ठीक ही तो है। किसान चाहता है कि खूब वर्षा हो और अच्छी फसल आये, व्यापारी चाहता है कि वर्षा कम हो और चीजों के दाम बढ़ जायं। भगवान किसकी सुनें, किसकी न सुनें?"

वंदना अभी तक चुपचाप बैठी थी अब उससे न रहा गया। उसने कहा, "ऋषिवर से मैंने सुना है कि सच्ची सरल प्रार्थनाएं ही अग्नि की पवित्र ज्वाला की तरह भगवान तक पहुंच सकती है। ऐसी-वैसी प्रार्थनाएं धुएं से भरी, दम घोंटने वाली और भारी होती हैं। परम प्रभु के पास उनकी पहुंच नहीं होती। लेकिन संसार में भगवान की शक्तियों के विरूद्ध लड़नेवाली आसुरी शक्तियां भी हैं। सारे झगड़े-फसाद, गाली-गलौज, बुरी इच्छाएं, दूसरों के प्रति असद्भाव- ये सब आसुरी शक्तियों के प्रति की गई प्रार्थनाएं हैं और उनसे इन्हें बढ़ावा मिलता है।

दैवी शक्तियां संसार में प्रकाश, सामंजस्य और एकता लाना चाहती हैं और आसुरी शक्तियां अंधकार, वैमनस्य और सामंजस्य का अभाव रखना चाहती हैं। बहुत-कुछ इस पर भी निर्भर है कि हम किससे और कैसे प्रार्थना करते हैं।"

अभी यह बात चल ही रही थी कि ऋषिवर आ गए। उन्हें हमारी बातें सुनने में बड़ा मजा आता है। शायद उन्होंने वंदना का भाषण सुन लिया था। आते ही उन्होंने उससे पूछ लिया, "तो क्या भगवान हमारी प्रार्थना सुन लेते हैं?"

उसने उत्तर दिया, "नहीं, भगवान हमारी वहीं प्रार्थना स्वीकार करते हैं, जो सचमुच हमारे हित में हो। अगर हम अपने अहित की बात के लिए प्रार्थना करें तो वे उसे ठुकरा देते हैं।"

"देवर्षि नारद के बारे में एक कहानी है। उन्होंने एक बार काम पर विजय पा ली और इससे फूल उठे। भगवान गर्व पसंद नहीं करते, क्योंकि गर्व हमारा बहुत अहित करता है। भक्तों में अंदर इसका अंकुर पैदा हो तो वे उसे तोड़ देते हैं।"

"भगवान ने एक लीला की। नारद एक ऐसे नगर में जा पहुंचे, जहां राजकुमारी का स्वयंवर होने की तैयारी थी। राजकुमारी आर्शीवाद लेने के लिए नारद के पैरों पर गिरी और काम पर विजय पा लेने का गर्व करने वाले नारद उसके ऊपर मुग्ध हो गये। हर क्षण उनके मन में यही विचार करने लगा कि राजकुमारी मेरे गले में जयमाला डाल दे। लेकिन यह हो कैसे?"

"उन्होंने ध्यान लगाया और झट विष्णु भगवान उनके सामने आ खड़े हुए। नारद ने उन्हें सारी बात बतलाई और बोले, "बस, आप अपनी सुंदरता दे दीजिए, तभी राजकुमारी मुझे जयमाला पहना सकेगी। उसके बिना कोई आशा नहीं।"

"भगवान को उत्तर देते देर न लगी। उन्होंने कहा, 'हम तो सेवक-हितकारी हैं, जो कुछ तुम्हारे हित में होगा, वह अवश्य करेंगे। नारद खुश हो गये और बड़े गर्व के साथ स्वयंवर की सभा में जा बैठे। कहानी तो लंबी है, जो पढ़ना चाहें, तुलसी रामायण में पढ़ लें, पर जिस चीज के साथ मेरे विषय का संबंध है, वह बस इतनी ही है कि भगवान ने नारद को बंदर का भयावना चेहरा दे दिया और राजकुमारी ने उनकी ओर देखा तक नहीं। "

"काम-विजय के गर्व को चूर-चूर करने के लिए ही भगवान ने यह लीला की थी। कई बार हमारी प्रार्थनाएं इसलिए स्वीकार नहीं की जातीं, क्योंकि उनके स्वीकार होने से हमारे कुपंथ पर जाने की संभावना ज्यादा हो जाती है।"

अब ऋषिवर ने कहा, "और एक बात यह भी तो है कि कई-कई क्यों, अधिकतर प्रार्थनाएं यांत्रिक होती हैं। जैसे मशीन का पहिया घूमा करता है, उसी तरह प्रार्थनाएं घूमती हैं, उनके पीछे जान नहीं होती। ऐसी प्रार्थनाओं का कोई विशेष मूल्य नहीं होता।"

"प्रार्थना के लिए यह जरूरी है कि वह सच्चे दिल से की जाय और पूरी श्रद्धा के साथ की जाय। श्रद्धा के अभाव में की गई प्रार्थना का कोई मूल्य नहीं होता। हमने ऐसे बहुत से लोग देखे हैं, जो महादेव, हनुमान, गणपति, पीर साहब आदि अनेकों को पुकार कर अपना काम पूरा करने की फरमाइश करते हैं। इसका मतलब स्पष्ट है कि उनमें से किसी के लिए श्रद्धा नहीं है।

"वे व्यवहार-कुशल आदमी की तरह दस अफसरों को सलाम करते हैं और आशा रखते हैं कि किसी-न-किसी से उनका काम बन ही जायगा।"

"भगवान् को हमारी श्रद्धा, प्रार्थना या सलामती की जरूरत नहीं है। लेकिन श्रद्धा और प्रार्थना के द्वारा ही हम उनके निकट पहुंच सकते हैं। श्रद्धा के द्वारा ही हमारे अंदर ग्रहण-शीलता आती है, जिससे हम उनकी कृपा को ग्रहण कर पाते हैं। वैसे तो उनकी कृपा हमेशा बरसती रहती है। श्रद्धा के अभाव में हम उसका लाभ नहीं उठा पाते।"

(सस्ता साहित्य प्रकाशन द्वारा प्रकाशित पुस्तक 'हमारी बोध कथाएं' से साभार)

 
 

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