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राजा ने कैसे समझाया स्वदेशी का मोल?

Hindi.in.com | Updated Aug 17, 2013 at 10:56 am IST |

 

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(हमारी लोककथाएँ पीढ़ी-दर-पीढ़ी मौखिक रूप से चली आ रही हैं। इनमें भारत की सांस्कृतिक एकता और धार्मिक मान्यताओं की सुंदर झलक देखने को मिलती है। दरअसल, कथाएँ बच्चों की सूझ-बूझ विकसित करने और उनकी मानसिक क्षुधा शांत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। बालपन का कल्पना संसार विस्तृत होता चला जाता है। साथ ही सामाजिक मूल्य और भारतीय संस्कारों के प्रति चेतना भी जाग्रत होती है।)

पहचानो स्वदेशी का मोल

एक अंग्रेज व्यापारी महाराज रणजीतसिंह दरबार में हाजिर हुआ और महाराज को अपने साथ में लाया हुआ बहुत सा कांच का बेशकीमती सामान दिखाया। उसे पूरी उम्मीद की महाराज काफी सारा सामन उससे खरीदेंगे।

महाराज ने उन सभी चीजों में से सबसे कीमती फूलदान उठाया और उसे दरबार के बीच में फेंक दिया। कांच का होने से फूलदान चकनाचूर हो गया।

महाराज ने वे सभी टुकड़े मंगवाकर गंभीर स्वर में उस व्यापारी से पूछा अब इस टूटे हुए फूलदान की क्या कीमत है। व्यापारी ने जबाब दिया- अब इसका मूल्य कुछ भी न रहा।

इसके बाद महाराज ने अपने एक सेवक को पीतल की एक दवात देकर आज्ञा दी- इसे हथौड़े से तोड़ों और फिर बाजार जाकर इसे बेच आओ। सेवक ने ऐसा ही किया। थोड़ी देर में सेवक ने दो पैसे लाकर महाराज को दे दिए।

महाराज उस व्यापारी से बोले ‘मेरा देश गरीबों का देश है, हमें ऐसी परदेशी वस्तुओं की आवश्यकता नहीं। हम तो उन देशी वस्तुओं का उपयोग करते हैं जिनका वास्तविक मूल्य कम हो लेकिन टूटने के बाद भी कुछ न कुछ मूल्य जरूर हो।

महाराज ने विदेशी व्यापारी को फूलदान के कुछ पैसे दिए और साथ ही कुछ नसीहत भी दी कि वो ये न समझे कि महाराज विदेशी कीमती चीजें नहीं खरीद सकते लेकिन मेरे लिए देश में बनी स्वदेशी चीजें ज्यादा मायने रखती हैं।

(साभारः भारत की लोक कथाएं, डायमंड प्रकाशन, सर्वाधिकार सुरक्षित।)

 

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पाठकों की राय | 17 Aug 2013

Aug 16, 2013

स्वदेसी अपनाओ देश का पैसा बचाओ चाइना माल तो एक बार में टूट जाता है और दोबारा नही बनता

DEEPAK KUMAR SONKAR Raipur Chhattisgarh

Aug 16, 2013

इस्को कहते हॅ सच्चा देश भक्त

satya parkash faridabad


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