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मुल्ला नसरुद्दीन की दरियादिली का सफर, दास्तान-18

Updated Jan 10, 2013 at 10:43 am IST |

 

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(पिछले बार आपने पढ़ाः मुल्ला की दरियादिली:- मुल्ला नसरुद्दीन के लिए धार्मिक किताबें बेकार थीं। लेकिन बूढे के दिल को ठेस न पहुँचे, इसलिए उसने किताब ले ली। किताब को उसने जी़न से लगे थैले में रखा और गधे पर सवार हो गया। ‘तुम्हारा नाम? तुम्हारा नाम क्या है?’ कई लोग एक साथ पूछने लगे, ‘अपना नाम तो बताते जाओ। ताकि नमाज पढ़ते वक्त़ तुम्हारे लिए दुआ माँग सकें।’

अब उसके: दरियादिली का सफर


अपने वतन में मुल्ला नसरुद्दीन की वापसी का दिन बहुत सारी घटनाओं और बेचैनियों से भरा हुआ सिद्ध हुआ। वह बेहद थका हुआ था। वह किसी ऐसी जगह की तलाश में था, जहाँ एकांत हो और वह आराम कर सके।

एक तालाब के किनारे उसने लोगों की भारी भीड़ देखी और लंबी साँस भरकर कहा, ‘लगता है, आज मुझे आराम मिलेगा। यहाँ ज़रूर कुछ गड़बड़ है।’ तालाब सड़क से थोड़ी दूर था। वह सीधा अपने रास्ते जा सकता था। लेकिन वह उन लोगों में से नहीं था, जो किसी भी लड़ाई-झगड़े में कूदने का मौक़ा हाथ से जाने देते हैं।

इतने वर्षों से साथ रहने के कारण गधा भी अपने मालिक की आदतों से परिचित हो गया था। वह अपने आप तालाब की ओर मुड़ गया। ‘क्या बात है भाईयों? क्या यहाँ किसी का खून हो गया है? कोई लुट गया है?’ भीड़ में गधे को लेकर जाते हुए वह चिल्लाया, ‘जगह खाली करो, अलग हटो।’

तालाब के किनारे पहुँचकर मुल्ला नसरुद्दीन ने एक विचित्र दृश्य देखा। चिकनी मिट्टी और काई से भरे तालाब में एक आदमी डूब रहा था। वह आदमी बीच-बीच में सतह पर आता लेकिन फिर डूब जाता। कई लोग उसे बाहर खींचने के लिए बार-बार हाथ बढ़ा रहे थे। ‘हाथ बढ़ाओ-इधर-यहाँ-अपना हाथ दो।’ वे चिल्ला रहे थे।

लेकिन ऐसा लगता था कि डूबता हुआ आदमी उन लोगों की बातें नहीं सुन रहा है। वह पानी से ऊपर आता और फिर डूब जाता। इस दृश्य को देखकर मुल्ला नसरुद्दीन सोचने लगा, ‘बड़ी अजीब बात है! इसका क्या कारण हो सकता है? यह आदमी अपना हाथ क्यों नहीं बढ़ा रहा है? हो सकता है यह कोई चतुर गो़ताख़ोर हो, और शर्त लगाकर गो़ते लगा रहा हो। यदि यह बात है तो वह अपनी खिलअत क्यों पहने हुए है?’

तभी डूबने वाला एक बार फिर से पाने की सतह पर आया और फिर डूब गया। पानी में रहने का समय हर बार पहले अधिक था।

‘तू यहीं ठहर,’ मुल्ला नसरुद्दीन ने गधे से उतरते हुए कहा, ‘पास जाकर देखूँ, क्या बात है।’ डूबने वाला फिर पानी के भीतर पहुँच चुका था। इस बार वह इतनी देर तक पानी में रहा कि किनारे पर खड़े लोग उसे मरा समझकर उसके लिए दुआ माँगने लगे।

अचानक वह फिर दिखाई दिया। ‘यहाँ, इधर-अपना हाथ दो-हमें हाथ दो।’ लोग चिल्ला उठे। उन्होंने अपने हाथ बढ़ाए। लेकिन वह उनकी ओर सूनी आँखों से देखता रहा और फिर चुपचाप पानी में समा गया।

‘अरे बेवकूफ़ों, उसके रेशमी साफ़े और की़मती खिलअत को देखकर तुम्हें समझ लेना चाहिए कि यह कोई सूदख़ोर या अफसर है। तुम लोग सूदख़ोरों और अफसरों के तौर-तरीक़ों को नहीं जानते कि उन्हें पानी से किस तरह निकालना चाहिए।’ मुल्ला नसरुद्दीन चिल्लाया।

‘तुम जानते हो तो निकालो उसे बाहर। वह पानी के ऊपर आ गया है। उसे बाहर खींच लो।’ भीड़ से कई आवाज़ें उठीं। ‘क्या तुमने किसी सूदख़ोर या अफसर को कभी किसी को कुछ देते देखा है?’ अरे जाहिलो, याद रखो ये लोग किसी को कुछ देते नहीं हैं, सिर्फ़ लेते हैं।’

(साभारः मुल्ला नसरुद्दीन, डायमंड प्रकाशन, सर्वाधिकार सुरक्षित।)

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