27 नवम्बर 2014

न्यूजलैटर सब्सक्राइब करें

CLOSE

Sign Up


सूदखोरों का हमदर्द मुल्ला नसरुद्दीन, दास्तान–26

Updated Feb 03, 2013 at 09:20 am IST |

 

(पिछला भागः  जल्लादों का क़हर...:-ल्ला नसरुद्दीन ने तसल्ली देते हुए, ‘कोई फ़िक्र नहीं दोस्तो, छः हफ्ते बाजार में बैठकर तुमने वक्‍त बर्बाद नहीं किया। तुम लोगों को बिल्कुल सही इन्साफ मिला है। क्योंकि सभी जानते हैं कि सारी दुनिया में हमारे अमीर से बढ़कर अक्लमंद और मेहरबान कोई और नहीं है। अगर किसी को इस बात में शक है तो...)

अब आगे...:- सूदखोरों का हमदर्द...

बख्त़ियार ने दूसरे मामले भी निबटाए लेकिन अमीर के ख़जाने को भरना नहीं भूला। उसने कई गुनगारों को उनके पास भेजा। उनमें दस साल का एक बच्चा भी था, जिसने अमीर के महल के सामने की जमीन बगावत के इरादे से गीली की थी। उसे भी सजा मिली। इसे देखकर मुल्ला नसरुद्दीन का दिल गुस्से से भर उठा।

वह जोर से बोला, ‘वाकई यह लड़का बहुत बड़ा अपराधी है। ऐसे दुश्मनों से अपने तख्त़ की रक्षा करने में अमीर की दूरंदेशी की जितनी तारीफ की जाए, कम है। इसे तो सूली पर चढ़ा देना चाहिए था। यह लड़का सिर्फ़ चार साल का था, लेकिन उम्र तो बहाना नहीं है। हमारे बुखारा में दुश्मनों ने कितने घोंसले बना लिए हैं, यह देखकर ही मेरा दिल उदास हो जाता है। फिर भी हमें यकीन है कि अमीर के सिपाहियों और जल्लादों की मदद से सारी बुराइयाँ जल्दी ही दूर हो जाएँगी और उनकी जगह अच्छाइयाँ ले लेंगी।’

अचानक नसरुद्दीन ने देखा कि भीड़ छँट गई है। कुछ लोग जल्दी से खिसक गए थे, कुछ भाग रहे थे। सहसा उसने सूदख़ोर को आते देखा। उसके पीछे सिपाहियों से घिरा मिट्टी से सना लबादा पहने सफेद दाढ़ीवाला एक दुबला-पतला बूढ़ा आ रहा था। उसके साथ बुर्का ओढ़े एक औरत थीं। नसरुद्दीन की अनुभवी आँखें उसकी चाल देखकर भाँप गई। वह जवान लड़की थी।


अपनी एक आँख से लोगों को ताकते हुए सूदख़ोर बोला,‘जाकिर, जूरा, सईद और सादिक कहाँ है? अभी तो वे यहीं थे। उनके कर्ज़ चुकाने का वक्त आ रहा है। भागकर छिपना बेकार है।’ कूबड़ के बोझ से लँगड़ाता हुआ वह आगे बढ़ा।

लोग आपस में बातें करने लगे,‘यह बूढ़ा कुबड़ा कुम्हार और उसकी बेटी को अमीर के सामने खींच लाया है।’ ‘बेचारे कुम्हार को उसने एक दिन की भी मोहलत नहीं दी।’ ‘खुदा इसे गारत करे। मुझे भी एक पखवाड़े बाद कर्ज चुकाना है।’ ‘मुझे तो एक हफ्‍ते बाद ही चुकाना है।’

‘देखा, जब यह आता है तो लोग कैसे भागकर छिप जाते हैं। जैसे यह हैजा या कोढ़ लेकर आ रहा हो।’ ‘सूदख़ोर तो कोढ़ी से भी गया-बीता है।’ मुल्ला नसरुद्दीन का मन दुख से भर उठा। उसने अपनी कसम दोहराई, ‘मैं इसे उसी तालाब में डुबोकर दम लूँगा।’ अर्सला बेग ने सूदख़ोर को उसकी बारी से पहले ही आ जाने दिया। उसके पीछे कुम्हार और उसकी बेटी भी आ गई।

आगे पढ़िएः  सूदखोर जाफर के कर्जदार...

(साभारः मुल्ला नसरुद्दीन, डायमंड प्रकाशन, सर्वाधिकार सुरक्षित।)

जल्लादों का कहर, मुल्ला नसरुद्दीन की दास्तान-25

फरियादी पर टैक्स, मुल्ला नसरुद्दीन की दास्तान-24

मुल्ला नसरुद्दीन ने देखा नाइंसाफी का खेल, दास्तान-23

मुल्ला नसरुद्दीन के लिए खुला दरवाजा, दास्तान-22

अमीर के महल में पहुंचा मुल्ला नसरुद्दीन, दास्तान-21

facebook पर hindi.in.com पेज को LIKE किया क्या?    

 

 

यह खबर आपको कैसी लगी

10 में से 1 वोट मिले

पाठकों की राय | 03 Feb 2013


कृपया ध्यान रखें: अपनी राय देते समय किसी प्रकार के अभद्र शब्द, भाषा का इस्तेमाल न करें। अभद्र शब्दों का इस्तेमाल आपको इस साइट पर राय देने से प्रतिबंधित किए जाने का कारण बन सकता है। सभी टिप्पणियां समुचित जांच के बाद प्रकशित की जाएंगी।
नाम
शहर
इमेल

आज के वीडियो

प्रमुख ख़बरें

Live TV  |  Stock Market India  |  IBNLive News  |  Cricket News  |  In.com  |  Latest Movie Songs  |  Latest Videos  |  Play Online Games  |  Rss Feed  |  हमारे बारे में  |  हमारा पता  |  हमें बताइए  |  विज्ञापन  |  अस्वीकरण  |  गोपनीयता  |  शर्तें  |  साइट जानकारी
© 2011, Web18 Software Services Ltd. All Rights Reserved.