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मिर्ज़ा गालिब की शायरी

Updated May 22, 2008 at 17:29 pm IST |

 

www.diamondpublication.com

दीवान-ए-ग़ालिब   

लाज़िम था कि देखो मिरा रास्ता कोई दिन और
तन्हा गए क्यों अब रहो तन्हा कोई दिन और

मिट जाएगा सर, गर तिरा पत्थर न घिसेगा
हूं दर पर तिरे नासिया फर्सा  कोई दिन और
    
आये हो कल, और आज ही कहते हो कि जाऊं
मानो, कि हमेशा नहीं अच्छा, कोई दिन और

जाते हुए कहते हो, कयामत को मिलेंगे
क्या खूब, कयाम़त का है गोया कोई दिन और

हां ऐ फ़लके-पीर  जवां था अभी ‘आरिफ’
क्या तेरा बिगड़ता, जो न मरता कोई दिन और

तुम माहे-शबे-चारदहम  थे, मिरे घर के
फिर क्यों न रहा घर का वह नक्शा कोई दिन और

तुम कौन से ऐसे थे खरे, दादो-सितद  के
करता मलकुल-मौत  तक़ाज़ा, कोई दिन और

मुझसे तुम्हें नफरत सही नैयर  से लड़ाई
बच्चों का भी देखा न तमाशा कोई दिन और

गुजरी न बहर हाल यह मुद्दत खुशो-नाखुश
करना था, जवांमर्ग, गुज़ारा कोई दिन और

नांदा हो, जो कहते हो, कि क्यों जीते हो ‘गालिब’
क़िस्मत में है, मरने की तमन्ना कोई दिन और

(साभार: दीवान-ए-ग़ालिब, डायमंड प्रकाशन, सर्वाधिकार सुरक्षित।)

1.    फर्सा- माथा रगड़ने वाला
2.    फ़लके-पीर- बूढ़ा आकाश
3.    चारदहम- चौदहवीं रात का चांद
4.    दादो-सितद- लेन-देन
5.    मलकुल-मौत- यमराज
6.    नैयर-  सितारा विशेष

 

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पाठकों की राय | 22 May 2008


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