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संभल जा अभी वक़्त है संभलने का...

Updated Feb 24, 2011 at 13:11 pm IST |

 

diamondpublication.com

जांनिसार अख्तर


ज़माना आज नहीं डगमगा के चलने का
संभल भ़ी जा कि अभी वक़्त है संभलने का

ये ठीक है कि सितारों पे घूम आये हम
मगर किसे है सलीक़ा ज़मीं पे चलने का

फिरै हैं रातों को आवारा हम, तो देखा है
गली-गली में समां चांद के निकलने का

हमें तो इतना पता है कि जब तलक हम हैं
रिवाज-ए-चाक गिरेबां नहीं बदलने का

(साभारः तनहा सफ़र की रात, डायमंड प्रकाशन, सर्वाधिकार सुरक्षित।)

 

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पाठकों की राय | 24 Feb 2011

Mar 07, 2011

“रिवाज-ए-चाक गिरेबां नहीं बदलने का” मतलब है कि हम जैसे हैं वैसे ही रहेंगे हम नहीं बदलेंगे

editor mumbai

Mar 03, 2011

प्लीस ट्रंलते लास्ट लाइन

Prakash Delhi


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