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EXCLUSIVE - विश्वविख्यात पुणे ढोल-ताशा मंडल से साक्षात्कार

Updated Sep 21, 2012 at 13:56 pm IST |

 

21 सितम्‍बर 2012
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गणपति उत्सव के दौरान मुंबई, पुणे सहित पूरे महाराष्ट्र में ढोल-ताशा की परंपरा चली आ रही है। गणपति को ढोल-नगाड़े, ताशा-लैजिम के साथ घर लाने की इस परंपरा ने मराठी संस्कृति में एक संगीत परंपरा को जन्म दिया है। कई सौ सालों में ढोल-ताशा की ये परंपरा न केवल फली-फूली है, लोगों के बीच लोकप्रिय भी हुई है। दुनिया के एक कोने की इस अनूठी संगीत परंपरा के बारे में हिन्दी इन डॉट कॉम के संपादक निमिष कुमार ने विख्यात पुणे ढोल-ताशा मंडल के केदार देशमुख से बात की।

 

हिन्दी इन डॉट कॉम – आपकी इस कला को क्या कहते हैं? इसके बारे में बताएं।
ढोल-ताशा मंडल – संगीत की ये परंपरा ‘ढोल-ताशा’ कहलाती है। ये ही नाम हम अपने बचपन से सुनते आ रहे हैं। सदियों से इसे इसी नाम से पुकारा जाता है। दरअसल ढोल-ताशा नाम इसमें बजाए जाने वाले दो वाद्ययंत्रों के चलते पड़ा। इस संगीत में बड़े ढोल बजाए जाते हैं, जो लकड़ी के सिलेंडरनुमा के दोनों ओर चमड़े की कवर लगाकर बनाए जाते हैं। दूसरे पतले तरह के ढोल को ताशा कहते है। इसके अलावा पीतल का दो मोटी प्लेटनुमा वाद्य होता है जिसे दोनों हाथों में पकड़कर बजाता जाता है, जैसे हम ताली बजाते है। इसे झांझ कहते हैं। इसके अलावा इसमें घंटा भी होता है। इस तरह ढोल, ताशा, झांझी और घंटा मिलकर ‘ढोल-ताशा’ बनाते हैं।

हिन्दी इन डॉट कॉम –
ढोल-ताशा संगीत परंपरा की शुरुआत कैसे हुई? इसकी मराठी संस्कृति में क्या स्थान है?
ढोल-ताशा मंडल – बताया जाता है कि ढोल-ताशा सबसे पहले शिवाजी महाराज के शिवनेर के किले पर जीत के उपलक्ष्य में बजाया गया था। शिवाजी महाराज की हर जीत, हर उत्सव में फिर ढोल-ताशा बजाया जाने लगा। ये मराठा जीत का संगीत बन गया। बाद में लोकमान्य बालगंगाधर तिलक ने आजादी की लड़ाई के वक्त जब गणपति उत्सव की शुरुआत की, तो ढोल-ताशा को गणपति उत्सव का हिस्सा बना दिया। सदियों से चली आ रही ये परंपरा अब मराठी संस्कृति का हिस्सा बन चुकी है। आज भी महाराष्ट्र के गावों में गणपति उत्सव ही नहीं, नवरात्रि, शिवरात्रि, शादी जैसे तमाम उत्सवों के दौरान ढोल-ताशा की परंपरा विकसित हो गई है।

हिन्दी इन डॉट कॉम – एक ढोल-ताशा ग्रुप में कितने कलाकार होते हैं? समूह में सबका काम कैसे बाटां जाता है?
ढोल-ताशा मंडल – एक ढोल-ताशा ट्रुप में औसतन 40 कलाकार होते हैं। 10 कलाकारों पर बड़े ढोल बजाने का जिम्मा होता है। ट्रुप में 10 कलाकार ताशा बजाते हैं। 10 कलाकारों पर झांझ बजाने की जिम्मेदारी होती है। एक कलाकार घंटा बजाता है। बाकी के नौ कलाकार प्रदर्शन करने वाले कलाकारों को रिप्लेस करने के लिए होते है। जब समूह का कोई कलाकार प्रदर्शन के दौरान थकने लगता है, तो एक्सट्रा कलाकार उसकी जगह लेता है। इस तरह एक ढोल-ताशा ट्रुप में तकरीबन 40 कलाकार होना जरुरी होता है।

हिन्दी इन डॉट कॉम – 40 कलाकारों की टीम में संगीत संयोजन कैसे होता है?
ढोल-ताशा मंडल – इन 40 कलाकारों का पूरा समूह उस घंटा बजाने वाले के संगीत संकेतों पर परर्फोम करता है। दरअसल ढोल-ताशा ट्रुप में घंटा बजाने वाला सबसे अनुभवी कलाकार होता है, या आप यूं कहें कि वो पूरे ढोल-ताशा ट्रुप का म्युजिक डॉयरेक्टर होता है। हमारे किसी भी प्रदर्शन की शुरुआत घंटा बजाने वाले कलाकार के संकेत से होती है। पूरे प्रदर्शन के दौरान धुनों का बदलाव भी ट्रुप घंटा बजाने वाले के संकेतों पर करता है। इतना ही नहीं ढोल-ताशा का एक प्रदर्शन कब पूरा होगा, ये भी घंटा बजाने वाले के संकेत पर तय होता है।

हिन्दी इन डॉट कॉम – हमने ढोल-ताशा ट्रुप में बच्चे भी देखे और बूढ़े भी। क्या ढोल-ताशा ट्रुप में कलाकार बनने की और रिटायरमेंट की कोई उम्र होती है?
ढोल-ताशा मंडल – छह से सात साल का कोई बच्चा ढोल-ताशा ट्रुप का हिस्सा बनने के लिए ट्रेनिंग लेना शुरु कर सकता है। इससे कम उम्र के बच्चों को हम ढोल-ताशा की ट्रेनिंग नहीं देते। ढोल-ताशा मंडल में प्रदर्शन के लिए बच्चों को कम से कम एक से डेढ़ साल की ट्रेनिंग लेनी पड़ती है। ट्रेनिंग के दौरान इन बच्चों को ट्रुप के साथ गांवों में होने वाले छोटे प्रदर्शनों में चलना होता है। जहां इन ट्रेनी कलाकारों को सबसे पहले झांझा बजाने को दिया जाता है। झांझा बजाना सीख लेने पर उसे ताशा बजाने की ट्रेनिंग दी जाती है। फिर वो ढोल बजाना सीख सकता है। ढोल-ताशा समूहों में यही लाइन-ऑफ-ट्रेनिंग होती है। घंटा बजाने या यूं कहें कि पूरे ट्रुप के संगीत संयोजन का मौका तो सबसे अनुभवी ढोल-ताशा कलाकार को ही मिल पाता है। ढोल-ताशा ट्रुप में कोई भी कलाकार करीब ५० साल तक की उम्र तक प्रदर्शन करता है। उसके बाद वो सक्रिय प्रदर्शनों से हट जाता है या यूं कहें की रिटायरमेंट ले लेता है।

हिन्दी इन डॉट कॉम –
क्या ढोल-ताशा प्रदर्शन के लिए कोई संगीत संयोजन होता है, जिसके मुताबिक ढोल-ताशा ट्रुप अपना प्रदर्शन करते हैं?
ढोल-ताशा मंडल – जी हां! एक ढोल-ताशा प्रदर्शन तकरीबन तीन से चार घंटे लंबा होता है। जिसमें हम पुणे के ढोल-ताशा कलाकार करीब १५ धुन बजाते हैं। हर प्रदर्शन की शुरुआत पुणे ढोल-ताशा की एक खास धुन से होती है। जिसके बाद हम दूसरी धुनें बजाना शुरु करते हैं। जिसमें शिवाजी महाराज के गीत की धुन, तुरही धुन, गणपति आरती धुन, गरबा धुन सहित कई धुनें होती हैं। अपने हर प्रदर्शन का समापन हम पुणे ढोल-ताशा की एक खास समापन धुन से करते हैं। पूरे प्रदर्शन के दौरान घंटा बजाने वाले कलाकार संकेत देता और उसके मुताबिक पूरा ढोल-ताशा ट्रुप धुन बदलता है।

हिन्दी इन डॉट कॉम – एक ढोल-ताशा प्रदर्शन के पहले आप सभी कलाकारों को कितने दिन प्रैक्ट्रिस करनी पड़ती है?
ढोल-ताशा मंडल – ढोल-ताशा समूहों को अभ्यास की जरुरत नहीं होती, क्योंकि हम साल-भर पूरे राज्य में घूम-घूमकर प्रदर्शन करते रहते हैं। लगातार प्रदर्शन ही हमारे लिए अभ्यास होता है। दरअसल ढोल-ताशा हम लोगों की रगों में, हमारी सांसों में बस जाता है, हमारी जिंदगी बन जाता है, ऐसे में जब भी घंटे वाला कलाकार पहला संकेत देता है, हमारे ढोल,ताशा, झांझ सब अपने-आप सुर-ताल में आ जाते हैं। यहीं हमारी जिंदगी है, यही हमारा जीवन है।

हिन्दी इन डॉट कॉम – ढोल-ताशा कलाकार इतने तेज संगीत के बीच हमेशा रहते है, क्या आप लोगों को प्राब्लम नहीं होती?
ढोल-ताशा मंडल – नहीं, हम लोगों को आदत-सी हो गई है। हर एक ढोल-ताशा कलाकार को सालों हो जाते है ये काम करते-करते, ऐसे में इतने तेज संगीत के बावजूद हम कभी शारीरिक रुप से परेशान नहीं होते। कभी-कभी किसी कलाकार को कान या सर में दर्द की शिकायत होती है। लेकिन हम इसके लिए कान में रुई लगाकर रखते हैं। वैसे ढोल-ताशा के बीच हम सब इतने मग्न हो जाते है कि किसी तकलीफ का ध्यान ही नहीं रहता।

हिन्दी इन डॉट कॉम – मुंबई, पुणे के अलावा आप लोग और कहां – कहां ढोल-ताशा का प्रदर्शन कर चुके है?
ढोल-ताशा मंडल – पुणे ढोल-ताशा तो अब पूरे देश में जाना जाता है। मुंबई, पुणे ही नहीं ढोल-ताशा का प्रदर्शन दिल्ली, बंग्लुरु, कोलकाता, गुजरात, त्रिवेंद्रम, गोवा सहित देश के कई हिस्सों में हो चुका है। हमारे कई साथी तो विदेशों में भी ढोल-ताशा का प्रदर्शन कर चुके हैं।

हिन्दी इन डॉट कॉम – क्या ढोल-ताशा प्रदर्शन के जरिए जिंदगी चलाई जा सकती है? क्या ढोल-ताशा प्रदर्शनों से इतनी कमाई हो जाती है कि कलाकार एक अच्छी जिंदगी जी सके?
ढोल-ताशा मंडल – हम गणपति उत्सव या बड़े समारोह में तीन-चार घंटे के एक ढोल-ताशा प्रदर्शन के लिए १२ हजार रुपये लेते हैं। इसके अलावा हम ग्रामीण इलाकों में भी सालभर प्रदर्शन करते है। ये जरुर है कि सिर्फ ढोल-ताशा प्रदर्शन से कोई कलाकार अपनी जिंदगी नहीं चला सकता। रोजी-रोटी के लिए हम सब ढोल-ताशा कलाकार दूसरे काम करते हैं। दरअसल ढोल-ताशा हम कलाकारों के लिए रोजी-रोटी नहीं, अपनी परंपराओं को बचाने की एक कोशिश है। हम भले ही भूखे रहें, कम सुविधाओं में रहें, लेकिन अपनी इस गौरवशाली संगीत परंपरा को बचाने के लिए हम हमेशा इसी तरह संघर्ष करते रहेंगे।

हिन्दी इन डॉट कॉम -   ढोल-ताशा मराठी संस्कृति का एक हिस्सा है, ऐसे में क्या महाराष्ट्र सरकार या केंद्र सरकार इस अमूल्य संगीत परंपरा को बचाने के लिए, इसके संरक्षण के लिए आगे आई? कभी आप से किसी सरकारी अधिकारी या संस्था ने संपर्क साधा? किसी प्रकार की सरकारी मदद आप लोगों को मिली?
ढोल-ताशा मंडल – अभी तक तो हमसे कभी कोई सरकार या सरकार का नुमाइंदा मिलने नहीं आया, ना ही हमें किसी प्रकार का सरकारी संरक्षण मिला या सरकारी मदद मिली। हम जो कुछ कर पा रहे हैं, वो सबकुछ अपने बूते पर कर रहे हैं। हम अपने कलाकारों का बीमा कराते हैं। अपने वाद्य यंत्रों का बीमा कराते हैं। लेकिन हमें ये सब अपने ही बूते करना होता है।

हिन्दी इन डॉट कॉम- आखिरी सवाल, क्या ढोल-ताशा कलाकारों की नई पीढ़ी इसमें रुचि लेती है?
ढोल-ताशा मंडल- बिलकुल! हमारी युवा पीढ़ी भी अपनी इस गौरवशाली परंपरा को बचाने के लिए आगे आती रही हैं। आपने देखा है कि हमारे ढोल-ताशा समूहों में बच्चों की संख्या लगातार बढ़ रही है, और ये बच्चे पूरे उत्साह के साथ शिवाजी महाराज के समय से चली आ रही इस गौरवशाली परंपरा को आगे बढ़ाने की कोशिश कर रहे हैं।

आपने हिन्दी इन डॉट कॉम से बात की। हमारे पाठकों को पुणे ढोल-ताशा के बारे में बताया इसके लिए आप सभी का धन्यवाद।

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पाठकों की राय | 21 Sep 2012

Sep 21, 2012

बहुत बाड़िया जानकारी है वाकई ये जानकारी कही ना मिलेगी

suresh sonwalkar pune


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