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गणपति: आज है ‘गणेश चतुर्थी’, ऐसे करें गजानन की पूजा!

Updated Sep 19, 2012 at 10:01 am IST |

 

19 सितम्‍बर 2012
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भाद्रपद शुक्ल पक्ष चतुर्थी को ‘गणेश चतुर्थी’ के तौर पर मनाया जाता है। इस बार गणेश महोत्‍सव 19 सितम्‍बर यानी कल से शुरू होने वाला है। हिंदुओं के आदि देव भगवान गणेश सब देवों में प्रथम पूज्यनीय है और सभी शुभ कार्यों से पहले उनकी पूजा की जाती है। ऐसा माना जाता है कि भगवान गणेश हरियाली के भी देवता है। आज हम आपको बताते हैं कि ऐसे करें ‘विघ्‍नहर्ता गणपति की पूजा’।

माना जाता है कि हर शुभ काम से पहले गणेश पूजा करने से विघ्नों का नाश होता है। भगवान गणेश विघ्नकर्ता और हर्ता दोनों हैं। कहा जाता है भगवान गणेश की परिक्रमा कर के पूजा की जानी चाहिए। परिक्रमा करते वक्त अपनी इच्छाओं को लगातार दोहराते रहना चाहिए। भगवान ऐसा करने वाले भक्तों की मनोकामना जरूर पूरी करते हैं। भक्तों को विनायक के मंदिर की तीन परिक्रमा करनी चाहिए। इसके अलावा भक्त अगर भगवान विनायक को खुश करना चाहते हैं और अपनी इच्छाओं के पूरा करना चाहते हैं तो उन्हें विनायक के नाम से तर्पण करना चाहिए।

भगवान गणेश को दुर्वा और मोदक बेहद प्रिय है। दुर्वा के बगैर उनकी पूजा अधूरी समझी जाती है। भगवान गणेश को तुलसी नहीं चढ़ानी चाहिए वर्ना अशांति होती है। पद्म पुराण के मुताबिक उनकी पूजा दूब से की जाती है। घर में कभी भी तीन गणेश की पूजा नहीं करनी चाहिए। भगवान गणेश की तीन प्रदक्षिणा ही करनी चाहिए। गणेश चतुर्थी के दिन चंद्रमा के दर्शन भी नहीं करने चाहिए।

मान्यता के मुताबिक चंद्रमा को भगवान गणेश का श्राप लगा हुआ है। मान्यता है कि जो कोई चंद्रमा के दर्शन करेगा उस पर झूठा कलंक लग सकता है। अगर भूल से चंद्रमा के दर्शन हो जाएं तो इससे मुक्ति के लिए हरिवंश भागवतोत्त संयमन्तक मणि के आख्यान के पाठ का विधान किया गया है। कहा जाता है पूरी विधि से भगवान गणेश की पूजा करना वाले भक्त को हर खुशी मिलती है और वो सदा सुखी रहता है।

श्रीगणेश चतुर्थी विघ्नराज, मंगल कारक, प्रथम पूज्य, एकदंत भगवान गणपति के प्राकट्य का उत्सव पर्व है। आज के युग में यह कहना अतिश्योक्ति नहीं होगी कि मानव जाति को गणेश जी के मार्गदर्शन व कृपा की आज हमें सर्वाधिक आवश्यकता है। आज हर व्यक्ति का अपने जीवन में यही सपना है की रिद्धि सिद्धि, शुभ-लाभ उसे निरंतर प्राप्त होता रहे, जिसके लिए वह इतना अथक परिश्रम करता है। ऐसे में गणपति हमें प्रेरित करते हैं और हमारा मार्गदर्शन करते हैं।

विषय का ज्ञान अर्जन कर विद्या और बुद्धि से एकाग्रचित्त होकर पूरे मनोयोग तथा विवेक के साथ जो भी अपने लक्ष्य को प्राप्त करने हेतु परिश्रम करे, निरंतर प्रयासरत रहे तो उसे सफलता अवश्य मिलती है। गणेश पुराण के अनुसार गणपति अपनी छोटी-सी उम्र में ही समस्त देव-गणों के अधिपति इसी कारण बन गए क्योंकि वे किसी भी कार्य को बल से करने की अपेक्षा बुद्धि से करते हैं। बुद्धि के त्वरित व उचित उपयोग के कारण ही उन्होंने पिता महादेव से वरदान लेकर सभी देवताओं से पहले पूजा का अधिकार प्राप्त किया।

चन्द्र दर्शन निषेध:

'जो व्यक्ति इस रात्रि को चन्द्रमा को देखते हैं उन्हें झूठा-कलंक प्राप्त होता है। इस दिन चन्द्र दर्शन करने से भगवान श्री कृष्ण को भी मणि चोरी का कलंक लगा था।

यदि जाने-अनजाने में चन्द्रमा दिख भी जाए तो निम्न मंत्र का पाठ अवश्य कर लेना चाहिए-

'सिहःप्रसेनम्‌ अवधीत्‌, सिंहो जाम्बवता हतः। सुकुमारक मा रोदीस्तव ह्येष स्वमन्तकः॥

करें ऐसे गणपति पूजन:

सर्वप्रथम एक शुद्ध मिटटी या किसी धातु से बनी श्री गणेश जी की मूर्ति घर में लाकर स्थापित करें व मूर्ति पर सिंदूर चढ़ाकर षोड्शोपचार से उनका पूजन करना चाहिए तथा दक्षिणा अर्पित करके 21 लडडुओं का भोग लगाएं। इनमें से पांच लडडू गणेश जी की प्रतिमा के पास रखकर शेष ब्राम्हणों में बांट देना चाहिए। गणेश जी की पूजा सायंकाल के समय की जानी चाहिए जो उत्तम है।

गजानन की आरती

जय गणेश जय गणेश जय गणेश देवा। माता जाकी पार्वती पिता महादेवा॥

एकदन्त दयावन्त चार भुजाधारी माथे पर तिलक सोहे मूसे की सवारी।
पान चढ़े फल चढ़े और चढ़े मेवा लड्डुअन का भोग लगे सन्त करें सेवा॥

अंधे को आँख देत कोढ़िन को काया बाँझन को पुत्र देत निर्धन को माया।
दीनन की लाज राखो शम्भु-सुत वारी । कामना को पूरी करो जग बलिहारी।

सूर श्याम शरण आए सफल कीजे सेवा जय गणेश जय गणेश जय गणेश देवा॥

जय गणेश जय गणेश जय गणेश देवा।  माता जाकी पार्वती पिता महादेवा।।

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