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मैरी क्रिसमस: खुशियां बांटने का त्योहार, बड़ा ही ‘खास दिन’

Updated Dec 25, 2012 at 09:56 am IST |

 

25 दिसम्बर 2012
एजेंसियां


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क्रिसमस ईसाई धर्म का सबसे अहम और विश्व का सबसे लोकप्रिय त्यौहार है। हर साल 25 दिसम्बर को मनाया जाने वाला यह त्यौहार आज हर जाति और धर्म में समान लोकप्रियता हासिल कर चुका है। इसकी रंगारंग धूमधाम और मनोरंजन को देखते हुए अब ज्यादा से ज्यादा लोग इससे जुड़ने लगे हैं।

क्यों कहा जाता है ‘क्रिसमस’

क्रिसमस भगवान ईसा मसीह (जिन्हें यीशु के नाम से भी पुकारा जाता है) के जन्मदिवस के रुप में मनाया जाता है। ‘क्रिसमस’ शब्द ‘क्राइस्ट्स और मास’ दो शब्दों के मेल से बना है, जो मध्य काल के अंग्रेजी शब्द ‘क्रिस्टेमसे’ और पुरानी अंग्रेजी शब्द ‘क्रिस्टेसमैसे’ से नकल किया गया है। 1038 ई। से इसे ‘क्रिसमस’ कहा जाने लगा। इसमें ‘क्रिस’ का अर्थ ईसा मसीह और ‘मस’ का अर्थ ईसाइयों का प्रार्थनामय समूह या ‘मास’ है। यीशु के जन्‍म के संबंध में नए टेस्‍टामेंट के अनुसार व्‍यापक रूप से स्‍वीकार्य ईसाई पौराणिक कथा है।

जीसस का जन्म

ऐसी मान्यता है कि पहला क्रिसमस रोम में 336 ई। में मनाया गया था। ईसाई पौराणिक कथा के अनुसार प्रभु ने मैरी नामक एक कुंवारी लड़की के पास गैब्रियल नामक देवदूत भेजा था। गैब्रियल ने मैरी को बताया कि वह प्रभु के पुत्र को जन्म देगी तथा बच्चे का नाम जीसस रखा जायेगा। वह बड़ा होकर राजा बनेगा, तथा उसके राज्य की कोई सीमाएं नहीं होंगी। आधी रात को जीसस ने  गोशाला में जन्म लिया। जिस रात को जीसस का जन्‍म हुआ, उस समय लागू नियमों के अनुसार अपने नाम पंजीकृत कराने के लिए मैरी और जोसफ बेथलेहेम जाने के लिए रास्‍ते में थे। उन्‍होंने एक अस्‍तबल में शरण ली, जहां मैरी ने आधी रात को यीशु को जन्‍म दिया तथा उसे एक नांद में लिटा दिया। इस प्रकार प्रभु के पुत्र यीशु का जन्‍म हुआ।

क्रिसमस ट्री की कहानी

क्रिसमस पर घर-घर और प्रत्येक चर्च में सजने वाला क्रिसमस ट्री आज पूरे विश्व में मशहूर हो चला है। रंग-बिरंगी सजावटों से, रोशनियों, गिफ्ट्स से सजा-धजा यह क्रिसमस ट्री अपना अद्भुत आकर्षण पेश करता है। माना जाता है कि क्रिसमस ट्री सजाने की परंपरा की शुरु आत हजारों साल पहले उत्तरी यूरोप से हुई थी। पहले के समय में क्रि समस ट्री गमले में रखने की जगह घर की सीलिंग में लटकाये जाते थे। फर के अलावा लोग चैरी के वृक्ष को भी क्रिसमस ट्री के रूप में सजाते थे।
 
या फिर लकड़ी के पिरामिड को एप्पल और अन्य सजावटों से इस प्रकार सजाते थे कि यह क्रिसमस ट्री की तरह लगे क्योंकि क्रिसमस ट्री का आकार भी पिरामिड के जैसा ही होता है। ऐसा माना जाता है कि संत बोनिफेस इंग्लैंड को छोड़ कर जर्मनी चले गये। जहां उनका उद्देश्य जर्मन लोगों को ईसा मसीह का संदेश सुनाना था।

 इस दौरान उन्होंने पाया कि कुछ लोग ईश्वर को संतुष्ट करने हेतु ओक वृक्ष के नीचे एक छोटे बालक की बलि दे रहे थे। गुस्से में आकर संत बोनिफेस ने वह ओक वृक्ष कटवा डाला और उसकी जगह फर का नया पौधा लगवाया, जिसे संत बोनिफेस ने प्रभु यीशु मसीह के जन्म का प्रतीक माना और उनके अनुयायिओं ने उस पौधे को मोमबत्तियों से सजाया। तभी से क्रि समस पर क्रिसमस ट्री सजाने की परंपरा चली आ रही है।

रेनडियर में आये सांता क्लॉज

जब-जब सांता क्लॉज की बात होती है, तो मन में एक ऐसे व्यक्ति की छवि उभरती है, जो दानशील, दयालु और सबके चेहरे पर खुशियां बिखेरने के लिए, खासतौर पर नॉर्थ पोल से चलकर आता हो। दुनिया भर में बच्चों को सांता के गिफ्ट की बेसब्री से प्रतीक्षा रहती है, लेकिन क्या तुम्हें यह पता है वह कौन थे, जिन्होंने सबसे पहले क्रिसमस गिफ्ट की प्रथा चलायी। माना जाता है कि तीसरी सदी में तुर्की में जन्मे संत निकोलस का ही आधुनिक रूप है सांता क्लॉज।

अपने धर्मालु और दयालु स्वभाव के कारण वह जबरदस्त लोकिप्रय थे। उन्होंने अपनी तमाम पुश्तैनी धन-दौलत दान कर दी थी और दूर-दूर तक सफर करके वह गरीबों की मदद किया करते थे। बच्चों के प्रति उनके स्नेह की कथाएं विशेष रूप से प्रचिलत हुईं। 6 दिसंबर को उनकी पुण्यतिथि बड़े पैमाने पर मनायी जाने लगी।
 
सेंट (संत) निकोलस का नाम ही सांता क्लॉज पड़ गया। सांता क्लॉज का क्रिसमस के साथ कोई सीधा संबंध नहीं था, लेकिन 1822 में क्लेमेंट क्लार्क मूर द्वारा लिखी गयी कविता में सेंट निकोलस को एक गोलमटोल, हंसमुख बुजुर्ग बताया गया, जो क्रिसमस की पूर्व रात्रि में रेनडियर वाली गाड़ी में उड़ते हुए आते हैं और चिमनी के रास्ते घरों में प्रवेश कर घर में टंगी जुराबों में बच्चों के लिए उपहार छोड़ जाते हैं। इसके साथ ही सांता क्लॉज का क्रि समस के साथ संबंध जुड़ गया।

कैरोल गीतों में क्रिसमस का उल्लास

दुनिया को शांति और अहिंसा का पाठ पढ़ाने वाले प्रभु यीशु मसीह के जन्मदिन क्रिसमस से ठीक पहले उनके संदेशों को भजनों (कैरोल) के माध्यम से घर-घर तक पहुंचाने की प्रथा को विश्व के विभिन्न हिस्सों में ‘गो कैरोलिंग दिवस’ के रूप में मनाया जाता है। इस दिन लोग रंग-बिरंगे कपड़े पहन कर एक-दूसरे के घर जाते हैं और भजनों के माध्यम से प्रभु के संदेश का प्रचार-प्रसार करते हैं। कैरोल एक तरह का भजन होता है, जिसके बोल क्रि समस या शीत ऋतु पर आधारित होते हैं।

ये कैरोल क्रि समस से पहले गाये जाते हैं। कहा जाता है कि कैरोल गाने की शुरुआत जीसस के जन्म के साथ हुई। प्रभु का जन्म जैसे ही एक गौशाला में हुआ वैसे ही स्वर्ग से आये दूतों ने उनके सम्मान में कैरोल गाना शुरू कर दिया थ़ा। नगालैंड, मिजोरम, मणिपुर समेत समूचे पूर्वोत्तर भारत में लोग विशेषकर युवा बेहद उत्साह के साथ टोलियों में निकलते हैं और रात भर घर-घर जाकर कैरोल गाते हैं। कैरोल गाने के बाद लोग चॉकलेट और मीठे बिस्कुट खाकर उत्सव मनाते हैं।

प्रभु ईसा मसीह के जन्म की खुशी का दिन

पूरी दुनिया में धूमधाम से मनाया जाने वाला क्रि समस प्रभु ईसा मसीह के जन्म की खुशी में हर साल 25 दिसंबर को मनाया जाता है। यह ईसाइयों के सबसे महत्वपूर्ण त्योहारों में से एक है। इस दिन को बड़ा दिन भी कहते हैं। नव वर्ष के आगमन तक क्रि समस उत्सव का माहौल कायम रहता है। क्रि समस से 12 दिन पहले ही क्रिसमसटाइड उत्सव की शुरु आत होती है। एन्नो डोमिनी काल प्रणाली के आधार पर यीशु का जन्म 7 से 2 ई पूर्व के बीच बेथलेहम में हुआ था।

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