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‘मौन’ में बहुत शक्ति होती है!

Updated Mar 30, 2012 at 18:15 pm IST |

 

30 मार्च 2012
वार्ता

उज्जैन।
मौन में बहुत शक्ति होती है, ऐसा पुराने शास्त्रों सहित श्रीमद् भागवत गीता और चाणक्या नीति सहित अन्य धर्मों के ग्रंथो में इसका उल्लेख किया गया है।

डॉक्टरो का भी ऐसा मानना है कि चित की चंचलता को शांत करना न केवल शरीर की ऊर्जा को बचाया जा सकता है बल्कि मस्तिष्क की एकाग्रता भी बढ़ाई जा सकती है, लेकिन एक समय पश्चात इसका सेहत पर नकारात्मक प्रभाव दिखने लगता है।

एसोसिएशन ऑफ स्टडीज फॉर मेंटल केयर के मनोचिकित्सक एवं शोधार्थी डॉ.नरेश पुरोहित ने मौन को लेकर श्रीमद् भागवत गीता, चाणक्य सहित अन्य धर्मों जानकारी एकत्रित करते हुए ‘क्यो जरुरी है मौन व्रत’ .शीर्षक से तैयार की गई अपनी शोध अध्ययन रिर्पोट उक्त जानकारी का खुलासा करते हुए बताया कि मौन एक तरह का संवाद है जिसमें मौन धारण करने वाला व्यक्ति विभिन्न भाव भंगिमा से अपनी बात कहता है।

उन्होंने बताया कि न बोलने वाले व्यक्ति के इशारो को सामने वाला समझ नही पाता है या गलत ढंग से समझ लेता है इस प्रकार न बोलने की सूरत में दो तरह की स्थितियां सामने आती है। ऐसी स्थिति में न बोलने के कारण सेहत पर पड़ने वाला प्रभाव बढे़ हुए रक्तचाप के रुप में सामने आता है जबकि निरंतर अनियंत्रित रक्तचाप से ब्रेन हैमरेज भी हो सकता है। उन्होने बताया कि मौन रहना भी विरोध का भी एक तरीका हो सकता है। यही कारण है कि अकसर किसी से नाराज होने पर हम दूसरे से बोलना छोड़ देते है लेकिन विरोध का यह तरीका सेहत के लिये नुकसानदायक ही होता है।

ऑनलाइन बातचीत में भी होते हैं ‘मौन संवाद’

डॉ. पुरोहित ने अपनी रिर्पोट में बताया कि श्रीमद् भागवत गीता 16 व 17 वें अध्याय में मौन व्रत के महत्व का उल्लेख किया और कहा गया है कि मन की चंचलता को नियंत्रित कर रखने वाले मौन की स्थिति में मनुष्य सीधे परमात्मा से संवाद कर सकता है।  इसी प्रकार कि चाणक्य नीति का 11 वां, नौवां अध्याय कहता है कि मौन आत्मशक्ति एवं आत्मविश्वास को बढ़ाता है। लेकिन मन में उपजी भावनाओं को व्यक्त न करने से धमनियो पर अधिक दबाव पड़ता है।

उन्होंने कहा कि धर्मशास्त्रों में जिस तरह के मौन व्रत की बात कही गई है उसमें बोलने, सोचने, समझने एवं किसी भी तरह की प्रतिक्रिया देने की बात शामिल नही है। उन्होंने अपनी रिपोर्ट में रेखांकित करते हुए बताया कि मौन एक तरह का योग है जिसमें धीरे-धीरे साधक खुद से दूर अध्यात्म में लीन हो जाता है।

उन्होंने बताया कि मन की चंचलता को नियंत्रित करना मौन व्रत है और यदि मौन आध्यात्मिक नही है तो इसका अर्थ है कि दिल और दिमाग को सामान्य दिनो की अपेक्षा अधिक काम करना पड़ रहा है।

मन के विचारों के किसी भी साधन के जरिए उजागर करना हर व्यक्ति का स्वभाव होता है कम बोलने वाला व्यक्ति भी दिन में कई बार बोलता है। उन्होंने बताया कि बोलने की इच्छा होने पर भी नही बोल पाने से धमनियो में रक्त प्रवाह तेज होने लगता है इससे दिल दिमाग का काम बढ़ जाता है और एक स्थिति के बाद धमनियां फट भी सकती है।

 

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