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आज है ‘विश्व साक्षरता दिवस’, आओ पढ़ें और पढ़ाएं

Updated Sep 08, 2012 at 12:17 pm IST |

 

08 सितम्‍बर 2012
एजेंसियां

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कम साक्षरता होने से किसी देश को कितना नुकसान उठाना पड़ता है इसका सबूत वहां की विकास दर से ही पता चल जाता है। विश्व में साक्षरता के महत्व को ध्यान में रखते हुए ही संयुक्त राष्ट्र के शैक्षिक, वैज्ञानिक एवं सांस्कृतिक संगठन (यूनेस्को) ने 17 नवंबर, 1965 को आठ सितंबर का दिन विश्व साक्षरता दिवस के लिए निर्धारित किया था। 1966 में पहला ‘विश्व साक्षरता दिवस’ मनाया गया था और तब से हर साल इसे मनाए जाने की परंपरा जारी है। संयुक्त राष्ट्र ने वैश्विक समुदाय को साक्षरता के प्रति जागरूक करने के लिए इसकी शुरुआत की थी। प्रत्येक वर्ष एक नए उद्देश्य के साथ ‘विश्व साक्षरता दिवस’ मनाया जाता है।

आज विश्व के सामने कई मुसीबतें मुंह खोले खड़ी हैं। इंसानों की जरा-सी लापरवाही किसी भी पल विकराल मुसीबतों को दावत दे सकती है। पर्यावरण संकट, प्रदूषण, जनसंख्या, बेरोजगारी, बीमारी, अकाल, प्राकृतिक आपदाओं से पूरा विश्व घिरा हुआ है। इन सब मुसीबतों से अगर विश्व को कोई चीज अब तक बचाए हुए है तो वह है इंसानों की सूझबूझ और तकनीक, जो बिना शिक्षा के प्राप्त करना मुश्किल होता है। आज तकनीक और विकास के इस दौर में शिक्षा ही मनुष्य की सबसे बड़ी सहयोगी है। शिक्षा एक ऐसा धन है जो मनुष्य के साथ हमेशा रहती है, जो ना बांटने से कम होती है और ना ही इसे कोई चुरा सकता है।

शिक्षा के महत्व का अगर बखान किया जाए तो हो सकता है एक आर्टिकल भी कम पड़ जाए। शिक्षा के महत्व को समझते हुए ही विश्व का हर देश अपनी शिक्षा व्यवस्था को दुरूस्त करने के लिए सभी तरह के तिकड़म अपनाता है। भारत हो या अमेरिका सभी अपनी शिक्षा व्यवस्था को लेकर हमेशा सजग रहते हैं।

जानें क्या है ‘साक्षरता’ का अर्थ

साक्षरता सिर्फ किताबी शिक्षा प्राप्त करने तक ही सीमित नहीं होती बल्कि साक्षरता का तात्पर्य लोगों में उनके अधिकारों और कर्तव्यों के प्रति जागरुकता लाकर सामाजिक विकास का आधार बनाना है। साक्षरता गरीबी उन्मूलन, लिंग अनुपात सुधारने, भ्रष्टाचार और आतंकवाद से निपटने में सहायक और समर्थ है। आज विश्व में साक्षरता दर सुधरी जरूर है फिर भी शत-प्रतिशत से यह कोसों दूर है।

भारत में साक्षरता

भारत एक प्रगतिशील देश है। यहां आजादी के समय से ही देश के नेताओं ने साक्षरता बढ़ाने के लिए कई कार्य किए और कानून बनाए पर जितना सुधार कागजों में दिखा उतना असल में नहीं हो पाया। केरल को छोड़ दिया जाए तो देश के अन्य शहरों की हालत औसत है जिसमें से बिहार और उत्तर प्रदेश में तो साक्षरता दर सबसे कम है। स्वतंत्रता के समय वर्ष 1947 में देश की केवल 12 प्रतिशत आबादी ही साक्षर थी। बाद में वर्ष 2007 तक यह प्रतिशत बढ़कर 68 हो गया। 2001 की जनगणना के अनुसार 65 प्रतिशत साक्षरता दर के साथ ही देश में 29 करोड़ 60 लाख निरक्षर हैं, जो आजादी के समय की 27 करोड़ की जनसंख्या के आसपास हैं।

सरकार द्वारा साक्षरता को बढ़ाने के लिए सर्व शिक्षा अभियान, मिड डे मील योजना, प्रौढ़ शिक्षा योजना, राजीव गांधी साक्षरता मिशन आदि न जानें कितने अभियान चलाये गए, मगर सफलता आशा के अनुरूप नहीं मिली। इनमें से मिड डे मील ही एक ऐसी योजना है जिसने देश में साक्षरता बढ़ाने में अहम भूमिका निभाई। इसकी शुरूआत तमिलनाडु से हुई जहां 1982 में तत्कालीन मुख्यमंत्री एम.जी. रामचंद्रन ने 15 साल से कम उम्र के स्कूली बच्चों को प्रति दिन निःशुल्क भोजन देने की योजना शुरू की थी।

देश में कम साक्षरता दर का एक कारण शिक्षा प्राप्त लोगों का भी बेरोजगार होना है। एक गरीब आदमी जब एक साक्षर आदमी को नौकरी की तलाश में भटकते हुए देखता है तो वह सोचता है कि इससे बढ़िया तो मैं हूं जो बिना पढ़े कम से कम काम तो कर रहा हूं और वह अपनी इसी सोच के साथ अपने बच्चों को भी शिक्षा की जगह काम करना सिखाता है।

हमारे यहां की शिक्षा व्यवस्था में प्रयोगवादी सोच की कमी है। यहां थ्योरी तो बहुत ही बढ़िया ढंग से पढ़ा दी जाती है पर उसे असल जिंदगी में कैसे अमल लाया जाए यह सिखाने में चूक हो जाती है। जो बच्चे इंजीनियरिंग या कोई कोर्स आदि कर लेते हैं वह तो सफल हो जाते हैं पर जिसने बी.ए. आदि की डिग्री ली हो उसके लिए राहें कठिन होती हैं। देश की सरकार को समझना होगा कि सिर्फ साक्षर बनाने से लोगों का पेट नहीं भरेगा बल्कि शिक्षा के साथ कुछ ऐसा भी सिखाना होगा जिससे बच्चे आगे जाकर अपना पेट पाल सकें।

आज विश्व आगे बढ़ता जा रहा है और अगर भारत को भी प्रगति की राह पर कदम से कदम मिलाकर चलना है तो साक्षरता दर में वृद्धि करनी ही होगी।

 

 

 

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