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‘गौरी’ के आगमन से शुरू तीन दिवसीय महोत्‍सव

Updated Sep 21, 2012 at 10:45 am IST |

 

21 सितम्‍बर 2012
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गणेश चतुर्थी के साथ ही 10 दिनों तक विशेष पूजा का आयो‍जन किया जाता है। इसी दौर में गणेश चतुर्थी के तीसरे दिन कई घरों में गौरी या महालक्ष्मी की स्‍थापना कर पूजा की जाती है। महिलाओं का यह खास पूजन तीन दिनों तक चलता है।

गणोशोत्सव के मध्य महालक्ष्मी की स्थापना विधि-विधान से की जाती है। इसी क्रम में शुक्रवार यानी आज 21 सितंबर को तीन दिवसीय महालक्ष्मी महोत्सव का शुभारंभ होगा।

अनुराधा नक्षत्र में महालक्ष्मी की स्थापना की जाएगी। भाद्रपद शुक्ल पक्ष में श्री महालक्ष्मी अर्थात ज्येष्ठा-गौरी का व्रत और उत्सव की विशेष प्रधानता है। शुक्रवार को शाम 4 बजे तक कुलाचार के अनुसार श्री महालक्ष्मी की स्थापना शुभ-मुहूर्त में कर सकते हैं।

शनिवार, 22 सितंबर को दिन भर ज्येष्ठा नक्षत्र रहेगा। इस दिन सुख-समृद्धि की अराध्य श्री महालक्ष्मी का पूजन होगा। नैवेद्य अर्पण कर प्रसाद वितरण किया जाएगा। रविवार, 23 सितंबर को दोपहर 1.29 बजे तक अपने कुलाचार अनुसार श्री महालक्ष्मी का विसर्जन किया जाएगा।

गौरी, देवी पार्वती का ही दूसरा नाम है। ये सब जानते हैं कि देवी गौरी भगवान गणेश की मां है पर गणेश चतुर्थी के दौरान, महाराष्ट्र के कुछ भागों में, विशेष रूप से पुणे में इन्हें गणपति की बहन भी कहते हैं।

देवी गौरी घर में अच्छा स्वस्थ्य, धन, खुशी और समृद्धि लाती हैं। गौरी हमेशा जोड़े में ही ज्येष्ठ (यानी बड़ी बहन) और कनिष्ठ (यानी छोटी बहन) के रूप में आती है।  महालक्ष्मी कि इन दो मूर्तियों को घर में गणेश की बहनों के आगमन के तौर पर लाया जाता है और पूजा की जाती है। इनके साथ बहुत प्यार और सम्मान से व्यवहार किया जाता है क्योंकि ये माता-पिता के घर आई बेटियों की तरह होती हैं।

गौरी कि मूर्तियों को गणेश चतुर्थी के तीसरे दिन पर घरों में लाया जाता है और इन्हें 3 दिनों के लिए रखा जाता है।

पहले दिन को आवाहान कहते हैं। इस दिन गौरी को घर लाया जाता है। महालक्ष्मी के पैरों के हल्दी कुमकुम से बनाए छापों की मोहर घर के प्रवेश से लेकर पूरे घर में लगाई जाती है। गौरी को घर में प्रवेश कराते वक्त उनकी आरती कर उन पर पानी और चावल छिड़का जाता है और पूरे घर में घुमाया जाता है।

गौरी कि मूर्तिया आमतौर पर अविवाहित लड़कियों द्वारा घरों में लाई जाती है। प्रवेश के दौरान घर कि सौभाग्यवती औरते गौरी से पूछती हैं की "आप किधर आए हो?", जिनका जवाब गौरी को लाने वाली अविवाहित लड़की देती है, उस घर का वर्णन करके जहां गौरी को लाया जाता है। तब घर कि महिलाएं कहती है कि "सोने, चांदी, हीरे, जवाहरात के पैर के साथ हमारे पास आओ और हमेशा के लिए हमारे साथ ही रह जाओ"। पहले दिन उन्हें ज्वार या बाजरे कि भाकरी और सुआपालक कि सब्जी का भोग चढ़ाया जाता है।

इस त्यौहार के दुसरे दिन भगवान सत्यनारायण कि पूजा की जाती है। पूजा के बाद गौरी को ‘नैवेद्य’ लगाया जाता है जिसमे सोलह तरीके कि सब्जी और चटनी, पूरणपोली, दाल-चावल के साथ और भी भिन्न-भिन्न प्रकार के व्यंजन और मिठाइयां बनायी जाती हैं।
 
गौरी पूजन के तीसरे और अंतिम दिन पर गौरी को ‘दही-चावल’ का भोग चढ़ाया जाता है जिसका सेवन केवल घर वाले ही करते हैं। इसके बाद उनका पानी में विसर्जन किया जाता है।  विसर्जन के बाद यह प्रथागत है कि लोग नदी से पत्थर के छोटे टुकड़े लाते हैं और उन्हें पूरे घर में फैलाते हैं। यह समृद्धि और पौधों-फसलों के संरक्षण का प्रतीक है।

गौरी पूजन के दिन घर कि सौभाग्यवती महिलाएं अपने-अपने घरों में ‘हल्दी-कुमकुम’ का आयोजन करती हैं। वे आस पास कि सौभाग्यावातियों को गौरी के दर्शन करने का आमंत्रण देती हैं और उन्हें हल्दी कुमकुम लगाकर प्रसाद वितरित करती हैं।

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