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एडिट पेज : क्या ‘टीवी के हरिशंकर परसाई’ थे ‘उल्टा-पुल्टा’, ‘फ्लॉप शो’ जसपाल भट्टी?

Updated Oct 25, 2012 at 17:30 pm IST |

 

25 अक्टूबर 2012

 निमिष कुमार,

संपादक,

हिन्दी इन डॉट कॉम



25 अक्टूबर की सुबह-सुबह पूरे देश को खबर मिली- जसपाल भट्टी नहीं रहे। पंजाब में देर रात एक सड़क दुर्घटना में जसपाल भट्टी की मौत हो गई। जिसने सुना वो स्तब्ध रह गया। किसी ने कभी सोचा ना था जसपाल भट्टी का यूं जाना। खबर सुनते ही लोगों के दिलोदिमाग में दशकों पुराने उल्टा-पुल्टा, फ्लॉप शो जैसे टीवी कार्यक्रम याद आने लगे। कोई कैसे भूल सकता है जसपाल भट्टी के उन तीखे व्यंग्य को जो वो सरकार, नेताओं, अधिकारियों, व्यापारियों और गल चुके सिस्टम पर करते थे। फिर वो ‘हमारे देश में पीएचडी कैसे होती है’ बताना हो, या तब के सरकारी दूरदर्शन में सीरियल कैसे पास होते है? सिस्टम की हर खामी पर भट्टी की नजर गई और एक बेहद चुभता, लेकिन शालीन भाषा में व्यंग्य सामने आया। जसपाल भट्टी ने व्यंग्य के अपने करियर की शुरुआत अखबारों में कॉर्टूनिस्ट के तौर पर की थी और शायद इसीलिए जसपाल भट्टी ने मशहूर कॉर्टूनिस्ट आर.के. लक्ष्मण की तर्ज पर सिर्फ और सिर्फ आम आदमी को अहमियत दी। उन्होंने व्यवस्था में मौजूद हर उस शख्स को अपने व्यंग्य का निशाना, जो आम आदमी की आम जिंदगी में नासूर की तरह दर्द दे रहा था। इस तरह कई मायनों में जसपाल भट्टी हिन्दी में व्यंग्य के पुरोधा हरिशंकर परसाई के टीवी संस्करण बन चुके थे।

जसपाल भट्टी का फ्लॉप शो कार्यक्रम टीवी की टीआरपी पर खरा उतरने वाला एक सुपरहिट प्रोग्राम था। फ्लॉप शो का हर एपिसोड हमारे सिस्टम के किसी भ्रष्ट्राचार, नाकारापन, बेईमानी के नासूर को उघाड़कर सामने रख देता था। याद कीजिए फ्लॉप शो का वो एपिसोड जिसमें भट्टी ने देश में कैसे पीएचडी की जाती है और कैसे कॉलेज की मोटी तनख्वाह वाली लेक्चरशिप मिलती है, इस पर व्यंग्य किया था। भट्टी ने बताया कि कैसे कॉलेज या लाइब्रेरी के बजाय सुबह-सुबह अपने पीएचडी गाइड के घर सब्जी और दूध लेकर जाना जरूरी होता है? कैसे पढ़ाई के बदले अपने प्रोफेसर के घर के काम में ज्यादा दिलचस्पी लेनी होती है? कैसे शादीशुदा होने पर भी रिसर्चर अपने गाइड की बदसूरत, अनपढ़ साली से शादी की बात को ना नहीं करता, जब तक उसकी पीएचडी नहीं हो जाती, और फिर पीएचडी हो जाने पर बताता है कि वो तो शादीशुदा, बाल-बच्चे वाला है। जब गाइड प्रोफेसर बने जसपाल भट्टी उससे पूछते है कि उसने ये पहले क्यों नहीं बताया, तो उसका जवाब होता है कि यदि पहले बता देता सर तो क्या आप मेरी पीएचडी होने देते? एपिसोड के अंत में किसी फिल्मी गाने पर बनी पैरोडी फ्लॉप शो का आखिरी सॉलिड पंच होता था। जैसे इस एपिसोड में रिसर्चर स्टूडेंट अपनी लैब में गाता है- जो तुमको हो पसंद वही बात कहेंगे, तुम बीकर को जार कहो, जार कहेंगे। जसपाल भट्टी ने देश के एजुकेशन सिस्टम पर बहुत ही तीखा वार किया, ठीक वैसे ही जैसे दशकों पहले व्यंग्य के पुरोधा हरिशंकर परसाई अपने लेखों में करते थे। ऐसे में कहा जा सकता है कि कई मायनों में जसपाल भट्टी हिन्दी में व्यंग्य के पुरोधा हरिशंकर परसाई के टीवी संस्करण बन चुके थे।

जसपाल भट्टी ने समाज के हर तबके पर व्यंग्य किया। कैसे मैकेनिक ज्यादा कमाई के चक्कर में एक ग्राहक की नई-नवेली स्कूटर के पुर्जे-पुर्जे अलग कर देते है? कैसे एक मैकेनिक स्कूटर का बस प्लग साफ करने के बजाय नई स्कूटर में ढेरों नुक्स बताता है और स्कूटर का इंजन तक खोल डालता है। बाद में ग्राहक के नाराज हो जाने पर और पुलिस थाने जाने की धमकी देने पर भी बड़ी ठिठाई से जवाब देता है- साहब, गाड़ी खोलने के पैसे तो दो। एक दूसरे टीवी व्यंग्य में जसपाल भट्टी ने सरकारी दफ्तरों में फर्जी मेडिकल बिल बनाकर पैसा लेने की देशव्यापी बिमारी को उजागर किया था। जिसमें भट्टी खुद एक सरकारी कर्मचारी बनकर अपने बॉस से अपने कुत्ते का मेडिकल बिल पास करने की गुजारिश करते है। बॉस के मना करने पर बीवी का मेडिकल बिल आगे बढ़ा देते है। अच्छी खासी, भली चंगी बीबी को हार्ट पेशेंट बताते है और बॉस से कमेंट पर कि बीवियां तो अपने पतियों को हार्टपेशेंट बना देती है, दांत निपोरते दिखते है। बताते है कि कैसे वो चपरासी को रिश्वत देते है जिससे चपरासी भट्टी के मेडिकल बिल की फाइल सबसे ऊपर रखता है, जिससे बॉस की नजर सबसे पहले जसपाल भट्टी के बिलों पर जाए? अंत में जसपाल भट्टी की एक सेक्सी-सी सहयोगी भट्टी को एक एजेंट के बारे में बताती है जो सरकारी कर्मचारियों को दस फीसदी कमीशन की दर पर फर्जी मेडिकल बिल बनाकर देता है। कुछ ऐसे जसपाल भट्टी ने समाज के हर उस कोने को खंगाला, हर उस शख्स को निशाना बनाया, जो आम आदमी की आम जिंदगी के लिए नासूर साबित हो रहा था। शायद कई मायनों में जसपाल भट्टी हिन्दी में व्यंग्य के पुरोधा हरिशंकर परसाई के टीवी संस्करण बन चुके थे।

दरअसल जसपाल भट्टी ने उस वक्त व्यंग्य को टीवी पर लाने की कोशिश की, जब हास्य-व्यंग्य सिर्फ कवि सम्मेलनों का हिस्सा होता था। कुछ कविताएं होती थी, एक-दो हास्य कवि होते थे, जिन्हें शुरुआती दौर में भीड़ में मजमा लगाने के लिए बुलाया जाता था, क्योंकि वो दौर दार्शनिक कविताओं और गीतों का था। हरिशंकर परसाई ऐसे पहले साहित्यकार थे, जो व्यंग्यकार होते हुए भी कवि सम्मेलनों में बुलाए जाते थे, और खूब वाह-वाही लूटते थे। परसाईजी ने ‘जीप पर सवार इल्लियां’ लिखी, और दुनिया को बताया कि हमारे देश का कृषि विभाग और उसके अफसरॉन कैसे काम करते हैं। परसाईजी ने वैष्णव का होटल का धंधा करना हो या एक गरीब मास्टरजी की जिंदगी का सफर, सब पर बहुत ही संयत भाषा में तीखा व्यंग्य किया। जसपाल भट्टी भी परसाईजी की तरह भाषा की शालीनता को बरकरार रखने में कामयाब रहे और भट्टी के व्यंग्य भी परसाईजी जैसे तीखे रहे। बस जसपाल भट्टी ने हरिशंकर परसाई की विधा को एक कदम और आगे बढ़ाया। व्यंग्य को किताबों से टीवी के परदे पर ले आए। इस तरह जसपाल भट्टी ने शालीन लेकिन तीखे व्यंग्य की विधा को ना केवल जिलाए रखा, उसे खूब बढ़ाया। अस्सी के दशक के आखिरी में जसपाल भट्टी ने टीवी पर व्यंग्य की शुरुआत ‘उल्टा-पुलटा’ जैसे व्यंग्य के विडियो कैपसूल बनाकर की। बाद में भट्टी ‘फ्लॉप शो’ जैसा सुपरहिट सीरियल लेकर आए। जसपाल भट्टी ने हमें बताया कि हास्य सिर्फ फूहड़, भोंडा नहीं होता, वो साहित्यिक और आम आदमी से जुड़ा भी हो सकता है, बिलकुल व्यंग्य के पुरोघा हरिशंकर परसाई की तरह। ऐसे में कह सकते है कि ‘टीवी के हरिशंकर परसाई’ थे ‘उल्टा-पुल्टा’, ‘फ्लॉप शो’ जसपाल भट्टी।

एक भारतीय।

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पाठकों की राय | 25 Oct 2012


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