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एडिट पेज: अजीत पवार के इस्तीफे के मायने?

Updated Sep 29, 2012 at 13:37 pm IST |

 

29 सितम्बर 2012

 निमिष कुमार,

संपादक,

हिन्दी इन डॉट कॉम


महाराष्ट्र के अब तक उप-मुख्यमंत्री रहे एनसीपी के कद्दावर नेता, शरद पवार के भतीजे अजीत ‘दादा’ पवार का इस्तीफा एनसीपी सुप्रीमों शरद पवार ने स्वीकार कर लिया है। और अजीत पवार के इस्तीफे के साथ ही महाराष्ट्र में राजनीति की एक नई इबारत लिखने की तैयारी हो चुकी है। एनसीपी सुप्रीमो शरद पवार के इस बयान के साथ, कि वो राज्य के मुखिया माने मुख्यमंत्री पृथ्वीराज चव्हाण से अपने भतीजे और डिप्टी सीएम रहे अजीत पवार का इस्तीफा मंजूर करने के लिए कहेंगे, अजीत पवार के लिए आने वाले दिनों में हालात बदलते दिख सकते हैं। पृथ्वीराज चव्हाण के अजीत पवार का इस्तीफा स्वीकारते ही अजीत पवार महाराष्ट्र के उप-मुख्यमंत्री नहीं रहेंगे। वैसे एनसीपी का कहना है कि वो विधानसभा में एनसीपी के विधायक दल के नेता बने रहेंगे। लेकिन जो विधायी या संसदीय जानकारी रखते है वो ये जानते है कि विधानसभा में गठबंधन सरकार के किसी सहयोगी दल का नेता होना सरकारी तौर पर कोई पॉवरफुल पोस्ट नहीं होती। इस इस्तीफे के साथ ही प्रोटोकॉल के तहत महाराष्ट्र में अजीत पवार काफी नीचे आ जाएंगे। कभी गर्वनर, मुख्यमंत्री, विधानसभा में विपक्ष के नेता बीजेपी के एकनाथ खडसे के साथ प्रोटोकॉल की कतार में खड़े रहने वाले अजीत पवार अब उस प्रोटोकॉल कतार का हिस्सा नहीं होंगे। सरकारी तौर पर अब अजीत पवार बस एक विधायक होंगे, मानें उनके समर्थन में नारे लगाने वाले और इस्तीफा देने वाले उन 19 मंत्रियों से भी कम पॉवरफुल। अब जब डिप्टी सीएम नहीं होंगे, तो राज्य की तमाम सहकारी बैंकों के बोर्डों में बैठे अपने समर्थकों के लिए कितने मददगार होंगे, ये भी वो सभी समर्थक सोचने लगें होंगे। अब स्थानीय निकाय चुनावों में जबरदस्त सफलता हासिल कर राज्य के कई निकायों में अपने समर्थकों को पार्षद, महापौर और निकाय की सत्ता में पहुंचाने वाले अजीत पवार उनके इन समर्थकों के कितने तारणहार बन पाएंगे, इस पर भी आगे कई बातें दिखाई देती मिल सकती हैं। एक आम आदमी की भाषा में कहें तो अब अजीत पवार को शायद उप-मुख्यमंत्री का बंगला, गाड़ी, ऑफिस, स्टॉफ सहित तमाम लाव-लश्कर छोड़ना होगा, जो अजीत पवार जैसे महत्वाकांक्षी नेता के लिए इतना आसान नहीं होगा।

अजीत पवार के इस्तीफे के बाद अब महाराष्ट्र में कांग्रेस-एनसीपी गठबंधन सरकार में मुख्यमंत्री पृथ्वीराज चव्हाण एकमात्र पॉवर सेंटर हो जाएंगे। दरअसल ये सारी लड़ाई इसी बात को लेकर मची थी। अजीत पवार राज्य की गठबंधन सरकार में मुख्यमंत्री के बराबर और कभी-कभी उनसे भी ज्यादा पॉवरफुल पॉवर सेंटर माने जाने लगे थे। कहा तो ये भी जाता है कि ये अजीत पवार ही थे जिन्होंने उप-मुख्यमंत्री बनने के लिए सरकार बनने के दौरान पार्टी विधायक दल में अपनी ताकत दिखाई थी। उनके तमाम समर्थक विधायकों ने एनसीपी आलाकमान को घेरा था और इस बात के लिए दबाव बनाया था कि अजीत पवार को ही उप-मुख्यमंत्री बनाया जाए, और अजीत पवार बने भी। लेकिन उसी के साथ ही वो जरुरत कांग्रेस के राजनैतिक रणनीतिकारों की आखों में खटक गए होंगे। कांग्रेस को रणनीतिकारों को ये अहसास हो गया था कि आगे आने वाले समय में अजीत पवार ही महाराष्ट्र में एनसीपी के सबसे मजबूत नेता हो सकते है, और ऐसे में कांग्रेस को ये डर भी था कि आने वाले चुनावों में बेहतर सफलता मिलने पर अजीत पवार मुख्यमंत्री बनने की जोर-अजमाइश करेंगे। जमीनी स्तर पर कांग्रेस की जगह एनसीपी को मजबूत करते जाएंगे और ऐसे में एक दिन महाराष्ट्र जैसा राजनैतिक रुप से महत्वपूर्ण राज्य उनके हाथ से निकल भी सकता है, ठीक वैसे ही जैसे बिहार, तमिलनाडु, आंध्रप्रदेश, बंगाल, जम्मू-कश्मीर आदि राज्य कांग्रेस के हाथ से निकलकर रीजनल पार्टियों के हाथों में चले गए, और कांग्रेस को उनका सहयोगी बनकर संतोष कर पड़ा, और इसके संकेत सरकार बनने के बाद महाराष्ट्र में हुए स्थानीय चुनावों के नतीजों में दिखे। एनसीपी का प्रदर्शन कांग्रेस से कहीं बेहतर हुआ। स्थानीय निकायों में एनसीपी के, और यूं कहें तो अजीत दादा पवार के समर्थकों का कब्जा बढ़ता गया। इसीलिए कांग्रेस ने एनसीपी को भी ठिकाने लगाने की कोशिश शुरु कर दी, जैसे बिहार में लालू की आरजेडी या तमिलनाडु में डीएमके को किनारे लगाया और राजनैतिक रुप से कमजोर कर दिया।

एनसीपी या यूं कहें तो अजीत पवार को राजनैतिक रुप से कमजोर करने के लिए सबसे पहले महाराष्ट्र की सहकारी बैंकों में फैली अनियमितताओं को निशाना बनाया। सहकारी बैंकों पर शिकंजा कसा तो एनसीपी के हजारों जमीनी कार्यकर्ता और नेता परेशान हुए। क्योंकि राज्य के अधिकांश सहकारी बैंकों में एनसीपी का ही कब्जा रहा है। अजीत पवार के इस्तीफे के पीछे भी यहीं वजह बताई जा रही है कि अजीत पवार छह सहकारी बैंकों को बेल-आउट पैकेज देने में मुख्यमंत्री के देरी करने से नाराज थे। इसके बाद उन तमाम मलाईदार मंत्रालयों या विभागों पर निशाना साधा, जहां पर एनसीपी की पकड़ थी। सिंचाई घोटाले को लेकर श्वेत पत्र लाने की बात दरअसल एनसीपी या यूं कहें तो अजीत पवार को घेरने की एक कोशिश भी कही जा रही है। श्वेत पत्र लाने या सिंचाई घोटाले को सार्वजनिक करने से, मीडिया में आने से अब वो तमाम ठेकेदार जिन्हें सिंचाई विभाग के ठेके मिले, परेशान तो जरुर हो गए होंगे। सबकों यही डर सता रहा होगा कि कहीं 72 हजार करोड़ की रकम की जांच को लेकर एसआईटी या अदालत की निगरानी में कोई जांच शुरु हुई, तो सबके लेने के देने पड़ जाएंगे। और ऐसे मुश्किल समय में अजीत दादा पवार के डिप्टी सीएम नहीं होने से कई लोग विदाउट गॉडफादर वाली स्थिती में हो जाएंगे। इतना ही नहीं, अजीत पवार के डिप्टी सीएम नहीं होने से या एनसीपी का गठबंधन सरकार में पॉवर सेंटर खत्म होने से एनसीपी कार्यकर्ताओं का हौसला भी टूटेगा।
अब अजीत दादा पवार महाराष्ट्र में एनसीपी के पोस्टर बॉय नहीं रहेंगे। ‘अजीत दादा है तो फिर क्या चिंता’ वाला आत्मविश्वास भी अब एनसीपी कार्यकर्ताओं में शायद ही रहे। एनसीपी को अब नए कार्यकर्ता या मतदाता मिलने में मुश्किल हो सकती है, क्योंकि अब लोगों के सामने ये लालच नहीं रहेगा कि यदि अजीत दादा पवार अगले चुनाव के बाद सीएम बन गए तो अपनी भी चांदी हो जाएगी। ये राजनीति का एक कड़वा सच है। जब पार्टी या नेता के कल कुछ बनने के चांस नहीं होते, तो अच्छे से अच्छे और सगे से सगे भी किनारा कर लेते हैं।

ऐसा नहीं था कि सिर्फ कांग्रेस ही अजीत पवार के सरकार और राज्य में पॉवरफुल होने से परेशान थी, भुजबल या और भी कई कद्दावर एनसीपी नेता अजीत पवार के उप-मुख्यमंत्री बनने से परेशान थे। एनसीपी आलाकमान ये माने या ना माने, लेकिन पार्टी रैंक में ये बात घर करने लगी थी कि एनसीपी भी अब भाई-भतीजावाद की राह पर चल पड़ी है, और एनसीपी में सारा पॉवर अब शरद पवार, शरद पवार की बेटी सुप्रिया सुले, शरद पवार के भतीजे अजीत पवार या नजदीकियों के बीच ही बंटने लगा है। इसने पार्टी के अंदर ही अजीत पवार के राजनैतिक दुश्मन तैयार होने लगे थे, और इस थ्योरी पर भरोसा ना करने का कोई कारण नहीं दिखता। वैसे भी उप-मुख्यमंत्री बनने के बाद भी अजीत पवार के आम व्यवहार में कोई बदलाव नहीं देखा गया। ना तो अजीत पवार पीपुल फ्रेंडली हुए, ना मीडिया फ्रेंडली। अजीत पवार का व्यवहार ‘आई एम द बॉस’ स्टाइल का ही रहा। और इसने उनके दोस्त कम, दुश्मन ज्यादा पैदा किए। उप-मुख्यमंत्री बनने के बाद अजीत ‘दादा’ पवार की जय-जयकार करने वालों की भीड़ बढ़ती गई और बहुतों ने अजीत दादा पवार का हाथ पकड़कर छोटी-मोटी राजनीति की और सत्ता का सुख भोगा। हां, बीजेपी नेता सुषमा स्वराज की भाषा में कहें तो ‘माल’ भी कमाया होगा। लेकिन अब शायद छोटी-मोटी राजनीति करने वाले ये तमाम छुटभैये नेता नया गॉडफादर ढूंढने लगें। क्योंकि कहा भी जाता है राजनीति ईमान-धरम से नहीं राजनीति की तरह की जाती है। ऐसे में हर छोटा-मोटा नेता अपना भविष्य बेहतर करने के लिए कल के किसी पॉवर सेंटर की तलाश में जुट जाएगा।

अजीत पवार के इस्तीफे से एनसीपी के अंदर पवार बनाम पवार की लड़ाई को लेकर भी सवाल उठने लगे हैं, जो स्वाभाविक है। अजीत पवार का खुद उप-मुख्यमंत्री बनने के लिए शक्ति प्रदर्शन करवाना, पार्टी के राज्य मामलों में अजीत पवार का ‘दादागिरी’, गठबंधन सरकार में अजीत पवार की ठसक जैसी बातों ने जरुर ही पार्टी सुप्रीमों शरद पवार को चिंता में डाला होगा। वरना ऐसा क्यों होता कि शरद पवार की बेटी सुप्रिया सुले खुद को केंद्रीय राजनीति में व्यस्त करती और राज्य के सभी मामलों की कमान अजीत पवार के हाथ में होती। एक राजनेता के रुप में शरद पवार ने यदि ये सोचा, तो कोई गलत नहीं किया कि जिस तरह से अजीत पवार महाराष्ट्र में गठबंधन सरकार और पार्टी में मजबूत हो रहे थे, एक दिन ऐसा भी आ सकता था कि अजीत पवार पूरी पार्टी हाईजैक करने की पोजीशन में आ जाते। ऐसा ना हो, इसीलिए ही एनसीपी की महिला विंग बनाई गई और सुप्रिया सुले उसमें सक्रिय हुई। ये खबर आना कि इस्तीफा देने के कई दिन बाद जब शरद पवार ने शुक्रवार को मुंबई में एनसीपी की बैठक ली, तब शरद पवार और अजीत पवार मिले थे, ये तथ्य चौंकाने वाला है। उस बैठक में सुप्रिया सुले भी मौजूद थी, जो ना तो महाराष्ट्र में एनसीपी विधायक है ना ही राज्य की राजनीति में हस्तक्षेप करती हैं। बैठक के बाद शरद पवार का सिर्फ अजीत पवार का इस्तीफा स्वीकारना और अजीत पवार के समर्थन में इस्तीफा देने वाले 19 मंत्रियों का इस्तीफा नहीं मंजूर करना, भी कई संकेत देता है। वैसे भी शरद पवार महाराष्ट्र राजनीति की एक मजबूत खिलाड़ी शिवसेना के सुप्रीमो बाल ठाकरे के काफी अच्छे दोस्त माने जातें हैं, और बाल ठाकरे भी अपनी पार्टी में कुछ साल पहले भतीजे राज ठाकरे बनाम पुत्र उद्धव ठाकरे वाली स्थिती से गुजर चुके हैं। हो सकता है शरद पवार ने महाराष्ट्र की राजनीति के उस वाकये से कुछ समझा होगा।

अब देखना होगा कि महाराष्ट्र की राजनीति अजीत दादा पवार के इस्तीफे के बाद किस करवट बैठती है? क्या शरद पवार की बेटी सुप्रिया सुले अब महाराष्ट्र की राजनीति में ज्यादा सक्रिय होंगी? क्या भुजबल, आर आर पाटील, जयंत पाटील सहित तारिक अनवर, डी पी त्रिपाठी, प्रफुल्ल पटेल जैसे नेता अब अजीत पवार की एक बार फिर पॉवरफुल वापसी होने देंगे? क्या अजीत पवार के साथ इस्तीफा देने वाले 19 मंत्री और तमाम विधायक छह महीने या एक साल बाद भी अजीत पवार को लेकर इतने ही वफादार होंगे? क्या कांग्रेस आलाकमान के भेजे पृथ्वीराज चव्हाण ने जिस तरह अजीत पवार जैसे कद्दावर नेता को किनारे किया, चव्हाण के राज्य में विरोध कर रहे नेता भी डरेंगे? ऐसे कई कयास अब अजीत पवार के इस्तीफे के बाद महाराष्ट्र की राजनीति को लेकर लगाए जाएंगे, और क्यों ना लगाए जाएं, आखिर अजीत दादा पवार के इस इस्तीफे के मायने भी तो कई हैं।

एक भारतीय।

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पाठकों की राय | 29 Sep 2012

Oct 01, 2012

good analysis. you are right. pawars' in trouble now. its waking call for ajit pawar, or he will be soon sidelined by sharad pawar for his daughter.

sv mohale pune

Sep 29, 2012

महारसट्र की राजनीति मैं ये पहले भी हो चुका है. शिवसेना मे भी तो राज ठककरे और उनके चाचा बाल ठककरे के साथ ऐसा ही हुआ था.

ram narayan tiwari mumbai

Sep 29, 2012

क्या पता कोन जानेमन

ilp mds


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