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एडिट पेज: भूले नहीं भूलती भोपाल गैस त्रासदी की वो कहानियां!

Updated Dec 03, 2012 at 16:27 pm IST |

 

03 दिसम्बर 2012

 निमिष कुमार,

संपादक,

हिन्दी इन डॉट कॉम

 

02-03 दिसंबर, 1984, ये वो तारीख है जो देश के दिल में बसे मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल के लोगों को भूलाए नहीं भूलती। दुनिया के सबसे त्रासद औद्योगिक दुर्घटनाओं में से एक है- 1984 का भोपाल गैसकांड। रुस के चर्नोबिल का परमाणु संयंत्र हादसा हो या अमेरिका के तट पर ब्रिट्रिश पेट्रोलियम के कच्चे तेल के समुद्र में फैल जाना, या फिर भोपाल में मिथाइल आइसो साइनाड गैस का लीक होना और हजारों लोगों का मारा जाना, ये ऐसे हादसे है जिन्हें दुनिया में औद्योगिकीकरण के काले पन्नों के रुप में जाना जाता रहा है। एक पत्रकार के रुप में भोपाल गैस त्रासदी के पीड़ितों को कवर करना एक झकझोरने वाला अनुभव रहा है। याद आती है तीन दिसंबर, 1984 की सुबह, जब रेडियो के न्यूज बुलेटिन पर भोपाल गैसकांड की खबर सुनी थी। तीन दिसंबर की अलसुबह ही भोपाल से रिश्तेदार घर आए थे। उन दिनों ना तो टेलिविजन घर-घर में होता था, ना टीवी न्यूज चैनल किस चिड़िया का नाम होता है, हम देशवासियों को मालूम नहीं था। सो शहर के सरकारी टेलिफोन एक्सचेंज से भोपाल में अपने रिश्तेदारों की खोज-खबर के लिए ट्रंककॉल बुक किए गए। फोन पर जोर-जोर से चिल्लाकर जो आवाज सुनी (फिल्म ‘चुपके-चुपके’ का वो सीन याद है ना जिसमें इलाहाबाद से श्रीपद भैय्या से फोन पर कैसे बात करते है शर्मिला टैगोर के जीजाजी बने ओमप्रकाश), जो पता चला वो अब समझ आता है। भूले नहीं भूलती भोपाल गैसकांड की वो कहानियां।

भोपाल से आए रिश्तेदारों ने बताया कि रेल्वे स्टेशन पर ट्रेन का इंतजार करते हुए उन्होंने किसी गैस की तीखी गंध महसूस की थी। गैस की वो गंध ऐसी थी जो फैफड़ों को चीर दे। उनका कहना था कि यदि उस दिन ट्रेन लेट होती, तो शायद वो लोग अस्पताल पहुंच जाते क्योंकि उस वक्त ही उस गैस की गंध से सर चकराने लगा था। आंखों में जलन होने लगी थी। आखों से पानी आने लगा था। उन लोगों को लगा था कि शायद आस-पास के किसी घर या होटल में रसोई गैस लीक हुई है या स्टेशन से लगे बाजार में किसी फेब्रिकेशन यूनिट का गैस सिलिंडर फट गया होगा। उन लोगों के मुताबिक दिसंबर की रात के चलते ठंड थी और गैस की गंध समय के साथ तेज होती जा रही थी। उन लोगों ने बताया कि जब वो ट्रेन में बैठे और रेलगाड़ी भोपाल शहर को छोड़ बाहर निकली तो उन्होंने स्टेशन की हवा और चलती रेलगाड़ी में आ रही ताजी हवा में बहुत अंतर पाया था।

तीन दिसंबर की सुबह जब भोपाल में रिश्ते की नानी से ट्रंककॉल के जरिए बात हो पाई तो जो सुना वो दिल दहला देने वाला था। नानी ने बताया कि जब वो सुबह मंदिर जाने के लिए घर से निकली तो तेज हवा के झोंके से आई एक तीखी गंध ने उन्हें रोक दिया। उस गंध से उनका सर चकराने लगा था। उल्टी जैसा जी होने लगा था। आखों में जलन होने लगी थी और आंखों से पानी बहना शुरु हो गया था। आस-पास के इलाके में जानवर सड़कों पर मरे पड़े थे, क्या गाय-भैंस या कुत्ते, जानवरों की लाशें यहां-वहां पड़ी हुई थीं। तब ना तो अखबारों का इतना चलन था, ना घर-घर में चौबीस घंटे चलने वाले टीवी चैनल और उनकी ब्रेकिंग न्यूज़। ऐसे में सूचना का एकमात्र साधन था- आकाशवाणी का न्यूज बुलेटिन, जिस पर कई चिरपरिचित आवाजों में सारा देश खबरों से रुबरु होता था- फिर वो हिन्दी में गूंजती आवाज हो- ये आकाशवाणी है, अब आप देवकीनंदन पांडे से समाचार सुने, या फिर इंग्लिश न्यूज के लिए डिमेलो की आवाज। उन रेडियो न्यूज बुलेटिन से देश क्या भोपाल के लोगों ने जाना कि भोपाल के एक सिरे में बने यूनियन कार्बाइड कारखाने से गैस लीक हुई है। वो गैस जानलेवा है। बस इसके बाद लोगों ने गैस से बचाव के तरीके सुनना और उन पर अमल लाना शुरु कर दिया था। भोपाल में लोगों ने अपने घरों के खिड़की-दरवाजों को बंद कर दिया था। बंद खिड़की-दरवाजों से गैस ना आए इसलिए खिड़की-दरवाजों पर गीली चादरें, गिले कपड़े लगाए दिए गए। जब उससे भी बात नहीं बनी, तो लोगों ने रजाई-गद्दों को गीला कर दरवाजों, खिड़कियों से लगा कर रखा, जिससे शहर के वातावरण में फैली जहरीली गैस किसी भी तरह घर के अंदर ना आ पाए। मालूम चला कि हर किसी ने अपने मुंह पर गीले कपड़े लपेट लिए थे, जिससे बाहर वातावरण में घुली जहरीली गैस से खुद को बचाया जा सके। भोपाल के उन रिश्तेदारों के मुताबिक हर वक्त वो भगवान से यही दुआ मांगते रहे कि उनकी जान बच जाए। लेकिन भोपाल गैसकांड के निशान आज भी उस बूढ़ी नानी और उनके परिवारवालों के स्वास्थ्य पर साफ दिखते हैं। उस काली रात के बाद से वो बूढ़ी नानी फिर कभी पहले जैसे हलवा-पूरी नहीं बना सकी। फिर उस बूढ़ी नानी के परिजन जो उस काली रात भोपाल के घर में थे, खुद को पूरी तरह से स्वस्थ्य नहीं रख पाए।

भोपाल गैसकांड का जिक्र आता है तो इस्माइल भाई भी याद आते हैं। इस्माइल भाई उस वक्त जवान हुआ करते थे, और नौकरी या किसी काम से राजधानी भोपाल गए हुए थे। इस्माइल भाई ने जो बताया वो इंसानियत को दहला देने वाले वाकये थे। बकौल इस्माइल भाई भोपाल शहर एक कब्रिस्तान जा दिखाई देने लगा था। जिधर नजर डालो, वहां लाश ही लाश दिखाई दे रही थी। क्या मासूम बच्चे, क्या बूढ़े, हर कोई उस जहरीली मिथाइल आइसो-साइनाइड गैस की चपेट में आकर जान खो बैठा था। अपने स्कूली दिनों में एनसीसी कैडेट रहे इस्माइल भाई से भी ना रहा गया और वो जुट गए लोगों की सेवा में। इस्माइल भाई की मानें तो जब उन्हें लाशों के ढेर पर केरोसिन छिड़ककर जलाने को कहा गया तो उनकी रुह कांप गई। भोपाल के हमीदिया अस्पताल के बाहर हो या कारखाने के पास की गरीब बस्ती में, लाशों के ढेर के ढेर लगे हुए थे। एक दो नहीं हजारों लाशें। इतनी लाशें कि कफन तक कम पड़ रहे थे। ऐसे में क्या करते। सड़ती लाशों से और बीमारियां ना फैलें इसीलिए उन्हें जलाने का फैसला किया गया, और इस्माइल भाई जैसे कई युवा स्वयंसेवियों ने उन लाशों को जलाया। बकौल इस्माइल भाई- उस वक्त ऐसा लग रहा था मानों पूरा भोपाल शहर एक शमशान में तब्दील हो गया था।

भोपाल गैस त्रासदी के 25 साल एक पत्रकार के रुप में भोपाल में रहते हुए उस काली रात के पीड़ितों से मिलने या उन पर गुजरी मौत की उस रात के बारे में जानने को मिला। गैस पीड़ितों के लिए लड़ाई लड़ने वाले एक बुजुर्ग मुस्लिम शख्स से मुलाकात की योजना बनाई। आधा दिन पुराने भोपाल की गलियों में उनका घर ढूंढते हुए बीता, और जब उस गली में पहुंचा तो वहां बैठे कुछ बुजुर्गों ने एक टूटते, बिखरते घर की ओर इशारा किया। एक पुराना दरवाजा खटखटाया तो एक बूढ़ा, बदहाल इंसान मेरे सामने खड़ा था। बिना पलास्टर के उस ईटों से बने कमरे में एक टूटी चारपाई बस थी। उस बुजुर्ग ने तस्वीरें दिखाई, कागजात दिखाए और बयां कि उस काली रात की काली सच्चाई। कैसे उस रात कारखाने से रिस कर वो जहरीली मिथाइल आइसो साइनाइड याने एमआईसी पास की एक गरीब बस्ती में पसर गई। अपनी झोपड़ियों में खाना खाकर दिसंबर की ठंड में गुदड़ियों में दुबके लोगों को अंदाजा भी नहीं था कि कब नींद के बदले मौत ने उन्हें अपने आगोश में ले लिया। साल बीते, दशक बीते, देशी-विदेशी मीडिया के पत्रकार आए और स्टोरीज़ की, सरकारें आई और गईं, मंत्री-अफसरॉन के दौरे हुए और वादे किए गए, लेकिन 02-03 दिसंबर, 1984 के भोपाल गैसकांड के पीड़ितों की जिंदगी बद से बदतर होती गई।

मध्यप्रदेश के इंदौर शहर में म्युनिसिपल कॉर्पोरेशन चुनाव कवर करते हुए तत्कालीन जिलाधीश राकेश श्रीवास्तव ने एक बुजुर्ग रिटायर्ड आईएएस अधिकारी से मिलाया, जो चुनाव पर्यवेक्षक बनकर आए हुए थे। बातों का सिलसिला चला तो मालूम चला कि वो बुजुर्ग मोती सिंह हैं, भोपाल गैसकांड के वक्त भोपाल के कलेक्टर। तब मालूम चली एंडरसन, तत्कालीन मुख्यमंत्री अर्जुनसिंह और भोपाल शहर के उस वक्त के प्रशासनिक ढांचे की सच्चाई। बकौल मोती सिंह, भोपाल गैस हादसा एक ऐसा हादसा था जिसके बारे में किसी ने सोचा ना था। जाहिर है जब ऐसे मौत के तांडव की कल्पना भी ना कि हो तो तैयारी कैसे होती। सो वहीं हुआ। लेकिन भोपाल गैसकांड के वक्त की प्रशासनिक कार्रवाई को लेकर सवाल खड़े होते रहे। आखिर क्यों यूनियन कार्बाइड के चीफ वारेन एंडरसन को प्लेन से भोपाल से जाने दिया गया? क्या ये सच था कि भोपाल में जहरीली गैस रिसाव की खबर फैलते ही तमाम बड़े अधिकारी और मंत्री अपने परिवारों के साथ भोपाल छोड़ गए थे? क्या उस वक्त भोपाल में इतने बड़े हादसे को संभालने के लिए स्वास्थ्य विभाग के पास ना तो डॉक्टर थे, ना संसाधन और ना ट्रेनिंग? सवालों के सामने भोपाल गैस त्रासदी के वक्त कलेक्टर रहे मोती सिंह खामोश रहें, लेकिन हजारों लोगों को अपने सामने मरते देखना और कुछ ना कर पाने का अफसोस उन आंखों में साफ दिखाई देता रहा।

भोपाल गैस त्रासदी के 25 साल कवर करते हुए एक ऐसे समूह से मिला जिसे देश-दुनिया ने भूला दिया था। ना सरकार को उनकी चिंता थी, ना यूनियन कार्बाइड को। ये लोग थे यूनियन कार्बाइड में काम करने वाले अफसर। ये वो लोग थे, जो यूनियन कार्बाइड में मैनेजर या इंजीनियर जैसे पदों पर काम करते थे। लेकिन हादसे के बाद इन लोगों सरकार ने गैस पीड़ित नहीं माना। कारखाना बंद हुआ तो इन लोगों को फिर कहीं काम नहीं मिला। उन दो दर्जन अधिकारियों ने हादसे के २५ साल तक एक-दूसरे के दुख-दर्द बांटे। यूनियन कार्बाइड के उन अधिकारियों में से कोई फिर वैसी जिंदगी नहीं पा सका, जो कारखाना चलने के दिनों में थी। यूनियन कार्बाइड में इंजीनियर के तौर पर तब काम करने वाले गुप्ताजी हादसे के २५ सालों में कई धंधों में अपना हाथ अजमा चुके थे, लेकिन कहीं दिल को वो तसल्ली नहीं मिली जो नौकरी के उन दिनों में थी। बकौल गुप्ताजी उन दिनों यूनियन कार्बाइड जितनी तनख्वाह देता था, उतनी तो राज्य में अच्छे खासे आईएएस अधिकारी को नहीं मिलती थी, लेकिन हादसा हुआ और कंपनी प्रबंधन कारखाने को बंद कर चला गया। गुप्ताजी जैसे करीब दो दर्जन से ज्यादा लोग एकाएक बेरोजगार हो गए। अस्सी के दशक में देश में आज जैसा प्राइवेट क्षेत्र विकसित नहीं था। सरकारी कंपनियों में नौकरी की उम्र जा चुकी थी, ऐसे में उन लोगों के पास बेरोजगारी से लड़ने के अलावा कोई और चारा नहीं बचा था। ये बताते हुए गुप्ताजी की आंखों में आंसू आ गए कि एक वक्त हमारा परिवार, हमारे परिचित मेरे इंजीनियर होने और एक एमएनसी में मोटी तनख्वाह पर काम करने का उदाहरण दिया करते थे, वहीं समाज एकाएक हमारा दुश्मन-सा हो गया। जिस हादसे के जिम्मेदार वो दो दर्जन अधिकारी नहीं थे, उसकी सज़ा वो २५ साल से भोगते आ रहे हैं, क्योंकि यूनियन कार्बाइड का मैनेजमेंट तो कारखाना बंद करके जा चुका था। आज भी अपने बकाए पैसे के लिए मैनेजमेंट से अदालतों में लड़ते वो लोग 02-03 दिसंबर, 1984 की उस काली रात को अपनी जिंदगी की सबसे लंबी रात मानते है जिसका स्याह परदा आज तक लोगों की जिंदगी में छाया हुआ है।

एक भारतीय।

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