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एडिट पेज: आखिर सब ‘वॉलमार्ट’ जैसों से डरते क्यों हैं?

Updated Dec 08, 2012 at 14:25 pm IST |

 

08 दिसम्बर 2012

 निमिष कुमार,

संपादक,

हिन्दी इन डॉट कॉम

 

अब हम सड़क के किनारे लगी गन्ने की चरखी से गन्ने का रस नहीं पीते। डर इस बात का होता है कि कहीं इससे हमें हैजा, पेट का संक्रमण या कोई और बीमारी ना हो जाए। डर इस बात का भी होता है कि कहीं किसी जानने वाले ने देख लिया तो इज्जत का, शान का बट्टा बैठ जाएगा। युवा तो भूलकर भी ऐसे देसी पेय पदार्थों के आस-पास भी नहीं फटकते। यदि गर्लफ्रैंड या किसी लड़की ने देख लिया तो सोचेगी, ओ मॉय गॉड, ये कितना डाउन-मार्केट है। अब हम बाजार में लस्सी पीने में शरम करते हैं। ठंडाई अब हमारे लिए नशा करने वाली बात है। लाल कपड़े में लपटे मटके से जलजीरा पीना या किसी रेहड़ी पर नींबू पानी पीना अब अन-हेल्दी और डाउन-मार्केट हो चला है। अब हम शान से अपने घर के रेफ्रिजेटर में ‘एक के साथ एक फ्री’ वाली स्कीम पर खरीदी विदेशी ब्रांड की कोल्ड ड्रिंक की सवा दो लीटर की बोतलें रखते हैं। किसी मेहमान के आने पर पूछते है कोल्ड ड्रिंक्स या कॉफी? अब पहले की तरह ठंडा या गरम पूछने का रिवाज दफन हो गया है। पहले ठंडा मतलब मटके के पानी में बना जलजीरा या नींबू शरबत होता था, या होती थी लस्सी या नमकीन छाछ, वहीं गरम का मतलब होता था अदरक या इलायची की गरमा-गरम चाय। मालूम ही नहीं चला और कब हम बदल गए। हमारा खान-पान बदल गया। हमारी एक पूरी पीढ़ी बदल गई। ये सब यूं ही नहीं बदला। हमने शाहरुख, शाहिद, रनबीर से पेप्सी पीना सीखा, तो आमिर ने बताया ठंडा मतलब कोका-कोला। और हम सीख गए। ऐसे सीखे कि पुराना सारा सबक भूल गए। यहीं तो चाहती थी वो बहुराष्ट्रीय कोल्ड ड्रिंक कंपनियां। मालूम ही नहीं चला कि कब भैया कि छोटी-सी बेटी दूध की जगह कोक की ओर इशारा करने लगी, कब दीदी का बेटा दही नहीं पेप्सी का दीवाना हो गया? पता ही नहीं चला कब हमारी जिंदगी में ठंडा मतलब कोका-कोला हो गया?

पहले घर में सख्त ताकीद थी कि महीने के आखिरी हफ्ते में ही अगले महीने के राशन की लिस्ट बना ली जाए, जिससे महीना खत्म होते-होते अगले महीने का सारा सामान लेकर रख लिया जाए। वरना हर महीने के पहले हफ्ते में किराना दुकानों पर इतनी भीड़ होती कि सामान की लिस्ट पूरी होते-होते घंटों लग जाते। कारण साफ था, सबके अपने-अपने किराना वाले होते थे, जिसके यहां से राशन आता था। सभी अपने-अपने किराना वाले के लायल कस्मटर याने की वफादार ग्राहक होते थे। उस किराना दुकान के अलावा कहीं और से राशन नहीं लाया जाता था। हर किराना वाले के यहां उसके ऐसे लायल कस्टमर्स मानें वफादार परिवारों की पूरी सूची होती थी, क्योंकि इन परिवारों का उस किराना दुकानदार के यहां ‘उधारी खाता’ चलता था। अब हम अपनी कार को मॉल के पॉर्किंग एरिया में पॉर्क करते हैं और परिवार के साथ ट्राली लेकर एक से दूसरे, दूसरे से तीसरे सुपरमार्केट में घूमते हैं। अब शॉपिंग किस सुपरमार्केट में कौन-सा ऑफर है, इससे तय होती है। कौन-सा सुपरमार्केट आपको फ्री-होम डिलिवरी करता है, ये भी हम पता लगाते हैं। अब पहले के किराना दुकानदार या उसके नौकर जैसा कोई नहीं होता, जो आपकी लिस्ट देखकर आपके ब्रांड का सामान आपके थैले में रखता हो। अब आप ट्रॉली लेकर घूमते है और सामान चुनते हैं। ग्रॉसरी शॉपिंग के बाद सामान होम-डिलिवरी के लिए दिया जाता है और फिर मॉल के मल्टीप्लेक्स में ‘मूवी विद डिनर’ के साथ एक ‘वीकएंड’ स्पेंड किया जाता है। मूव्हीज़ मल्टी स्क्रीन थियेटर में देखी जाती है और डिनर किसी मैक-डी, डोमिनोज़ में। मालूम ही नहीं चला कब किराना दुकान से महीने भर का राशन लाने का वो सिलसिला वीकएंड शॉपिंग में बदल गया। ये सब यूं ही नहीं हुआ। अब किराने वाले की दुकान हमें गंदी लगने लगी। अब बोरो में रखे अनाज में हमें बैक्टेरियाज़ का खतरा दिखने लगा। अब हमें चमचमाते फर्श के लंबे-लंबे हॉल भाने लगे, जहां रैक्स के कॉरिडोर्स में करीने से सामान सजा होता है और हम उसे उठाकर अपनी ट्राली में डालते जाते हैं, लगातार-लगातार। एक सर्वे के मुताबिक मॉल के इन सुपरमार्केट्स से ग्रॉसरी शॉपिंग में हम लोग करीब एक तिहाई सामान ऐसा खरीद लाते है जिसकी हमें या तो उस वक्त ज्यादा जरुरत नहीं होती या हमने वो सामान खरीदने की योजना नहीं बनाई थी। मतलब साफ है, आप अपने खरीदारी के बजट का एक तिहाई ज्यादा खर्च करते हैं। यहीं है सुपरमार्केट की कमाई का राज। आप आजाद होते है अपनी मनमर्जी से सामान उलटने-पलटने के लिए। क्या ये आप-हम अपने पुराने किराना वाले की दुकान पर कर सकते थे? बस ऐसी ही सवालों ने कब हमारे कदम राशन लेने किराना वाले की दुकान से मोड़ दिए और हम अब मॉल्स के सुपरमार्केट्स में वीकएंड्स पर ग्रॉसरी शॉपिंग करने लगे।

अब बच्चे हल्दी का दूध नहीं बोनविटा, हॉर्लिक्स पीते हैं। अब वो पोहा, उपमा नहीं मैगी चाव से खाते हैं। अब सिर्फ फोन पर ऑर्डर देने से आधे घंटे के अंदर गरमागरम पिज्ज़ा या बर्गर आपके घर पर डिलिवर हो जाता है। अब हमारी वफादारी पारले बिस्किट, किस-मी टॉफी या पारले पॉपपिंस, हरे डब्बे वाला ग्लूकोज, रसना या रुह-अफज़ाग, डालडा वनस्पति घी, लक्स- हमाम- लाइफबॉय जैसे नहाने के साबुन या निरमा वॉशिंग पावडर, पॉन्ड्स टेल्कम पॉवर, वैसलीन, पैराशूट हेयर ऑयल, कछुआ छाप मच्छर अगरबत्ती जैसों को लेकर नहीं रही। अब हम बुश, अपट्रॉन, वेस्टर्न जैसी कंपनियों के पुराने ब्लैक एंड व्हाइट टीवी पर नहीं अपने बिग स्क्रीन वाले एलसीडी पर एक से एक रंग-बिरंगे एड देखते है और बच्चे और महिलाएं एड देखकर तय करते है कि इस ब्रैंड को भी ट्रॉय किया जाए या नहीं? यही मल्टीनेशनल कंपनियों की नीति होती है कि वो आपको अपने उत्पाद के बारे में लुभाए और परंपारिक उत्पादों के बदले हमें उनके उत्पादों को खरीदने के लिए राज़ी करें। सबकुछ बहुत धीरे-धीरे होता है। मल्टीनेशनल कंपनियों के उत्पाद हमारी ज़िंदगी में धीरे-धीरे समाते जाते है और एक दिन मैगी की तरह हमारे दो मिनट कब लेने लगते है हमें मालूम ही नहीं पड़ता।

दरअसल बदलती दुनिया के साथ वैश्विक बाजार की इन बड़ी कंपनियों की नीति हमें अपने उत्पाद बेचने की नहीं अपने उत्पादों को हमारी जिंदगी का हिस्सा बनाने की होती है। इसके लिए ये कंपनियां बरसों इंतजार करती हैं, मार्केटिंग करती है, एड देती हैं, हमारे दरवाजे-दरवाजे आती है और एक दिन हमारी जिंदगी का हिस्सा बन जाती है। इन कंपनियों का जोर इस बात पर नहीं होता कि हमारा उत्पाद कैसे बिके, इनकी कोशिश ये होती है कि कैसे उपभोक्ता हमारे उत्पाद का आदी हो। इतना ही नहीं ये कंपनियां अपने उत्पाद को हमारी जिंदगी में लाने के लिए पुराने उत्पादों को हमारी जिंदगी से निकाल बाहर करने की कोशिशों में भी गुरेज नहीं करती। सारा खेल एक बाजार पर नहीं उस बाजार के दिलो-दिमाग पर कब्जा करने का है। सारा खेल है ठंडा मतलब कोका-कोला का पाठ याद कराने का।

एक भारतीय।

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पाठकों की राय | 08 Dec 2012

Dec 11, 2012

निमिष भाई, बहुत सुंदर. अपने शहर के गोपालदास और कांति भाई याद आ गये. आजकल तो वैसे भी दुनिया आविष्कार आवश्यकता की जननीके सिद्धांत पर चल रही है. आज हम डरे या नही, ये वाल-मार्ट हमारे दुकानदारो के ताबूत मे अंतिम कील की तरह होगा/ पर फिर भी उपभोक्ता वाद के जमाने में हमारा अच्छा उपभोग किया जा रहा है, और हम सिर्फ़ भोक्ते रह जा रहे हैं.

Alok Tiwari Hyderabad

Dec 10, 2012

आप सही है निमिशजी. हमारे नेताओ को मालूम भी नही चलेगा और ये वालमार्ट जैसे कब हमारा सारा बिज़्नेस हड़प जाएँगे. सावधान रहने की ज़रूरत है. ऐसे ही लिखते रहे. आप की लेखनी मैं आम आदमी वाली बात होती है. बधाई.

vijay singh choudhari hisar

Dec 08, 2012

याद करने मे हर्ज़ नही है

ALOK PURANIK GHAZIABAD

Dec 08, 2012

ये सच है की ह्म सूपर मार्केट या माल के आदि हो चुके है और परिवर्तन के नये दौर मैं कदम रख चुके है. किंतु क्या यह सच नही की अगर वॉल मार्ट या टेस्को जैसी बड़ी कंपनिया नही आती तो कई भारतीय कंपनिया यही काम करती और हम उनके गुलाम हो जाते. आज हम देख ही रहे है की कई सी भारतीय कंपनियोने हमे लूटने में कोई कसर नही छोड़ी है. कम से कम बाहरी कंपनियो के डर से ये कंपनिया शायद इससे ज़्यादा हमे न लूट पाए और प्रॉडक्ट में भी विशेषताए मिले. सवाल मात्र परचूनिया व्यापारियोंके दुकानो केहित क़ी है जिसका जवाब शायद पॉलिसी बनाने वालोँके हाथ मैं हो. गिरीश -अहमदाबाद

girish ahmedabad

Dec 08, 2012

मुझे आज भी वो दिन याद आते है जब मैं छोटा था और 1 रुपये की कुल्फि ख़ाता था वो भी बड़े शान से,पर आज मैं उन डीनो के लिए तरस जाता हू,वो स्वाद वो मिठास आज मेरे लिए एक इतिहास बन चुका है,पर जब भी गाव जाता हू वाहा के खेतो मे लहलहाते चने तोड़कर कर . कितना मज़ा था उन दिनो मे, पर आज वो बात तो सिर्फ़ जेहन मे ही रह गई है,कितनी मीठी यादे है वो हमारा स्वदेशी खाना वो हमारा पहनावा वो मिट्टी की सुगंध........ पर आज ये सिर्फ़ और सिर्फ़ एक यादे ही बन गई है जो शायद हमे कभी दोबारा मिल नही सकती. आज पगडंडी भी दिखाई नही देती जहा हम दो पहिया वाहनो की दौड़ लगाया करते थे, वा रे विदेशी दुकान.. जंक फुड को आज हम खाने के तौर पे इस्तेमाल करते है वो भी सुबह और शाम.. दुनिया की तमाम बीमारियो का घर बना के बैठे है खुद को ही.....

gopalbagani Mumbai

Dec 08, 2012

लेखक ने अपनी बात बहुत ही अच्छे ढंग से रखी है और ये सच भी है !हम चाहे माने या ना माने, हम भी इसके आदी हो चुकें है और ये कड़वा सच है|बस छोटे शहरो मे थोड़ी सी पुरानी बात बची है, शायद अब वो भी ख़तम हो जाएगी. ! काश वो पुराने दिन फिर से आते, काश हम फिर गुप्ता जी की दुकान पर फिर पहले की तरह घंटो बात करते , सामान लेते वक्त! ना वो पहले वाली आत्मीयता रही , ना वो अब जमाना रहा

Rakesh Delhi

Dec 08, 2012

Great Article

harry gurgaon

Dec 08, 2012

Isse jyada likhne ke liye aur sunane ke liye bacha hi nahi . Dhanyvad bhartiya molik souch ke liye. Bhartiya log dikhave ke aadi ho chuke hain. Achhe ko swikar jarur krna chahiye lekin aankh mund kar nahi.

vinod joshi jaipur


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