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एडिट पेज: बताइये, हंसें या रोएं, कि 15 अगस्त को 65 साल पहले हम आजाद हुए थे?

Updated Aug 15, 2012 at 08:21 am IST |

 

15 अगस्त 2012

 निमिष कुमार,

संपादक,

हिन्दी इन डॉट कॉम

मुम्बई। हम एक बार फिर 15 अगस्त मना रहे हैं। एक बार फिर हमारे दिलों में देशभक्ति की भावना हिलोरें मारने लगेगी। भले ही एक दिन के लिए। फिर तो हम ‘बिजी’ हो जाएंगे ‘माल छापने’ में। कैसे भी पैसा कमाने में। टैक्स चोरी करने में। ज़मीन के गोरखधंधे में। बेटी के लिए एक उपरी कमाई वाला सरकारी नौकरी करने वाला लड़का ढूंढने में। बेटे के लिए एक सुशील, सुंदर, गोरी, पढ़ी-लिखी, अच्छे घर की लड़की ढूंढने में, जो साथ में अच्छा-खासा दहेज ला सके, जिसका बाप हमारे बेटे का बिजनेस जमा सके, जो ऐसा हो कि हमारी भी समाज में, धंधे में ‘थोड़ी-बहुत’ मदद हो जाए। जो कमाएं भी, पोते ही पोते दे, पोतियां नहीं, और दिन-भर हाड़-तोड़ मेहनत के बाद, शाम को ‘जी मम्मीजी’, ‘जी पापाजी’ कहते हुए चाय-पानी से खाना बनाने, खिलाने से लेकर सारा किचन,बर्तन साफ करें। और हम दिन भर बच्चों के ‘कहां चले गए सब?’, ‘घर में तो जैसे पैर टिकते ही नहीं’ की तर्ज पर गरियाते और टीवी पर कोई देशभक्ति की फिल्म देखकर दोपहर बिताएंगे। शाम को आस-पड़ोस के वर्माजी, शर्माजी के साथ ‘इस देश का क्या होगा साहब?’, ‘अरे, ये सारे नेता चोर हैं’ की राग पर शाम की चाय के साथ थोड़ी बहुत बतकही करेंगे, और रात का मस्त खाना खाकर सो जाएंगे, ये सोचते हुए कि यार, आज अच्छा हुआ छुट्टी थी। क्योंकि 15 अगस्त को 65 साल पहले हम आजाद हुए थे? 

15 अगस्त मनाने के लिए सारे युवा लड़के-लड़कियां फेसबुक, ट्विटर जैसी सोशल मीडिया साइट्स पर अपनी वर्चुल दुनिया के दोस्तों को ‘हैप्पी इंडेपेन्डेंस डे’ विश करेंगे। सुबह से अजगर की तरह बिस्तर पर पड़े-पड़े टीवी पर दिल्ली की परेड देखते –देखते बिना नहाएं, ब्रश करे दोपहर कर देंगे।  क्योंकि 14 अगस्त की रात की दारू पार्टी का खुमार उतरा नहीं होगा। दोस्तों ने दारु का इंतजाम पहले ही कर दिया था, क्योंकि सबकों मालूम होता है कि 15 अगस्त को ड्रॉय डे होता है। इसीलिए आजादी के इस पर्व की एक रात पहले ही कोटा पूरा कर लिया जाता है। इंतजाम करना पड़ता है। यदि मां बाजार से कुछ लाने को कहेगी तो कहेंगे- कम ऑन मॉम, आज छुट्टी है। सारा दिन गर्लफ्रेंडों को ‘मामू बनाने’ और दोस्तों के साथ क्रिकेट खेलने में बिताएंगे। क्योंकि 15 अगस्त को 65 साल पहले हम आजाद हुए थे?

बच्चों को कैसे बताएंगे कि आज हम आजाद हुए थे? क्योंकि अब तो कई स्कूल 14 अगस्त को ही अपने-अपने स्कूलों में तिरंगा फहरा देते है,  ‘अरे, 15 अगस्त की छु्ट्टी मैडम अपने हसबैंड और बच्चों के साथ तो स्पैंड करेंगी ना? वॉट्स रांग, इफ एक दिन पहले ही इंडीपेंडेंट डे सेलिब्रेट कर दिया? आफ्टर ऑल बच्चों को इस दिन की इम्पॉटेंस समझ तो आई ना? देट्स ऑल’ जुमले के साथ। तब बीबी से नजरे छुपाकर, आंखों के किसी कोने में  आंसू भर लेंगे। याद करेंगे कैसे उन दिनों 15 अगस्त किसी उत्सव से कम नहीं होता था। माएं अपने बच्चों की स्कूल यूनिफार्म धोकर चकाचक कर देती थीं। जूते-मोजे तैयार किए जाते थे। 15 अगस्त की कार्यक्रम की एक दिन पहले ही स्कूल में रिर्हसल होती थी। और 15 अगस्त का दिन तो सुबह से ही आजादी-मय हो जाता था। आलस से आजादी। रोज की तरह मां-बाप को उठाने के लिए बार-बार टोकना नहीं पड़ता था। राकेट की फुर्ती से सारे काम निपटाकर स्कूल जाने की जल्दी होती थी। प्रभात फेरी हो या ‘विजयी विश्व तिरंगा प्यारा’ या ‘सारे जहां से अच्छा हिंदोस्तां हमारा’, हर गीत संवेदगान में गूंज उठता था। वो स्कूल की बूंदी, लड्डू या दूसरी मिठाई की मिठास, न्यूयार्क या लंदन के इंडिया स्टोर पर मिलने वाली सौ डॉलर किलों की मिठाई से भी बेहतर होती थी। दूरदर्शन पर शाम की आजादी की फिल्म, जो अधिकतर मनोज कुमार की होती थी, उपकार, शहीद, पूरब और पश्चिम, क्रांति जैसी कोई फिल्म। बंदनवारों से सजा स्कूल, लाइनों में खड़े बच्चें, ‘भारत माता की जय’, ‘वंदे मातरम्’ के नारे। कैसे बताएंगे आज बच्चों को कि तुम्हारा ‘इंडीपेंडेंस डे’ कभी हमारा ऐसा ‘१५ अगस्त’ होता था? क्योंकि 15 अगस्त को 65 साल पहले हम आजाद हुए थे?

हम इसका हिसाब नहीं लगा पाएं कि आजादी के इन 65 साल में हमने क्या खोया, क्या पाया? क्योंकि जो खोया वो शायद हमारे दिलों की मासूमियत थी। मन का झरने के जल जैसा साफ होना था। निस्वार्थ रिश्तों की डोर में बंधा एक ऐसा हिंदुस्तानी समाज था, जहां खुशी बांटी जाती थी, और गम साथ खाए जाते थे। आजादी के 65 साल में हमने वो सब खोया जो पैसों के तराजू में तोला नहीं जा सकता। वो सब पाया, जो मन की खुशी खरीद नहीं सकता। दरअसल हर आजादी के पर्व पर हम इस गणित में उलझकर रह गए कि हमारे देश ने क्या खोया, क्या पाया? देश ने तरक्की की कितनी मंजिलें पाईं? अपने कितनी नई मिसाइलें बनाईं, कितने नए टैंक सीमा पर तैनात कर दिए? लेकिन हम ‘एक भारतीय आम आदमी की जिंदगी’ के आजादी के 65 साल में खोए-पाए का हिसाब नहीं लगा पाएं। नहीं बता पाएं कि एक आम आदमी ने इन 65 साल में कितना खोया, कितना पाया? क्या खोया, जो खोया नहीं जाना था? वो क्या पाया, जो शायद हम कभी पाना नहीं चाहते थे?

दरअसल आजादी हमें ऐसे वक्त मिली जब पूरी दुनिया दो विश्वयुद्धों के जख्मों को सहला रही थी। महाशक्ति कहे जाने वाले ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी, जापान, इटली जैसे देश लगभग बरबाद हो चुके थे, और दुनिया को जल्दी ही एक नया थानेदार मिलने वाला था, जिसका नाम था- अमेरिका। हम पहले-पहल आजाद होने वाले मुल्कों में थे, सो ना तो कोई ऐसा था जो मां-बाप बन पाता ना कोई ऐसा साथी था, जो साथ खड़ा हो पाता। नेहरु ने रुसी पैसे और तकनीक के सहारे ‘आधुनिक भारत के मंदिर’ कहे जाने वाले कल-कारखानें खड़े किए। जो मिला उसे नौकरी में झोंका गया। देश में ना इंजीनियर्स थे, ना बेहतर प्रबंधक। आजादी के पचास साल तक तो हम चार-पांच आईआईटी से काम चलाते रहे। पहला प्रबंधन संस्थान आईआईएम आजादी मिलने के दो दशक के करीब बन पाया। लेकिन नेहरू के वो ‘आधुनिक भारत के मंदिर’ जल्दी ही ओवर स्टॉफ, यूनियनबाजी, सरकारी पैसे के बेहिसाब खर्च की मिसाल बन गए, और भ्रष्ट्र अधिकारियों के बीच इन पीएसयू को ‘भ्रष्टाचार की कामधेनु’ कहा जाने लगा।
 
पूरा 70 और 80 का दशक युवा के इस आक्रोश से भरा रहा। जब सरकारी नौकरियों के स्त्रोत सूखे, तो देश के युवा ने बेरोजगारी देखी, बेगारी देखी, लाचारी देखी। जेपी की क्रांति हो या अमिताभ बच्चन का रुपहले पर्दे पर यंग एंग्री मैन का अवतार, दरअसल ये उस वक्त के युवा का गुस्सा था, जो कभी सड़कों पर, तो कभी सिनेमा हाल में ‘ये पुलिस स्टेशन है तुम्हारे बाप का घर नहीं’ जैसे अमिताभ बच्चन के डॉयलॉग पर बजने वाली सीटियों में दिखा। दरअसल नेहरु के उन ‘आधुनिक भारत के मंदिरों’ को चलाए रखने के लिए ‘लाइसेंस-परमिट-कोटा राज’ आया, और साथ में भारतीय बाबुओं के हाथ लगा एक जादुई चिराग- कि कैसे फाइलों को अटकाकर पैसा कमाया जाता है? स्वाभाविक था कि निजी क्षेत्र में ना तो उद्योग-धंधे लगे, ना ही सेवा क्षेत्र में कोई विस्तार हुआ। ये वो  समय था जब युवा के पास विकल्प ही नहीं थे। या तो ऐन-केन तरीके से सरकारी नौकरी पाए, या किसी दुकान पर काम करे। ऐसे वक्त में बताइएं हंसे या रोएं क्योंकि 15 अगस्त को 65 साल पहले हम आजाद हुए थे?
 
90 के दशक में देश ने अपनी आर्थिक सीमाएं खोली और हमने वो देखा, जो पीढ़ियों ने नहीं देखा था। हमने उपभोक्तावाद के बारे में सुना, उसे देखा और उसे जीने लगे। कब ‘मैगी के दो मिनट’ हमारी जिंदगी का हिस्सा बन गए, हमें मालूम ही नहीं चला। अब हर रविवार मोहल्ले के किसी घर में रामायण या महाभारत देखने के लिए भीड़ लगनी बंद हो गई, क्योंकि अब घर-घर में रंगीन टीवी आ गए, भले ही किश्तों पर। किश्तों पर हमने फ्रिज खरीदे और मटकों को रिता छोड़ दिया। मोहल्ले के किसी एक-आध घर में बजने वाली वो काले, घिर्री वाले फोन की तीखी घंटी अब सुनाई देना बंद हो गई, साथ ही बंद हो गई, चाची, मौसी या आंटी की वो तेज आवाज- ‘अरे पप्पू, मम्मी को बोल, मौसी का फोन आया है’, क्योंकि अब घर-घर में टच बटन फोन थे, वो भी एसटीडी लाइन के साथ। ट्रंककॉल बुक कराने से चला वो सफर, काले फोन और फिर एसटीडी-पीसीओ के चार अलग-अलग कॉल स्लॉट्स से होता हुआ, मोबाइल फोन तक कब आ पहुंचा हमें पता ही नहीं चला। राशन की दुकान पर लगने वाली शक्कर, चावल, केरोसीन की लाइन छोटी होती गई और मॉल में भीड़ बढ़ती रही। किराने वाला लालाजी की खुशी अब पेशानी पर छाए रहने वाली चिंता की लकीरों में बदल गई और वॉलमार्ट जैसे विदेशी सौदागरों की बैलेंस शीट कहने लगी- दिस ईयर अगेन वी गेट ए जम्प इन अवर प्रॉफिट। बताइए हंसें या रोएं कि 15 अगस्त को 65 साल पहले हम आजाद हुए थे?

आजादी के साठ बाद समाजवादी विश्व सौदागरों की दुनिया में तब्दील हो गया। वैश्विक मंदी की मार हर तरफ दिखाई देने लगी। मैनेजमेंट कहने लगा- वी आर गोइंग थ्रू इन ए वेरी टर्बुलेंट पाथ ऑफ ग्लोबल इकॉनामिक स्लो डॉउन। मतलब साफ था- हर कंपनी मुनाफे को बनाए रखने की चिंता में पैकेजों पर वार कर रही थी। वहीं पैकेज, जो इन दो दशकों में कब बाबा की ‘पगार’ से बेटे का ‘पैकेज’ बन गए, मालूम ही नहीं चला। कब मैट्रिक, बीए पास मां-बाप भी दूसरों के सामने इठलाते हुए कहने लगे थे- भाई साहब, अब तो बोन्टू का पैकेज छह लाख का हो गया है, फिर लड़की भी तो उसी लेवल की चाहिए ना? अब लड़कों की शादियां मां-बाप नहीं उनके पैकेज करवा रहे थे। जितना आकर्षक लड़के का पैकेज, उतनी आकर्षक लड़की, दहेज और उसका परिवार। लड़कों के लिए संस्कार, नैतिकता, परिवारिक मूल्य जैसी तमाम बातें दकियानुसी करार दी गई। लड़के की हर बुराई के लिए पैकेज का कवच समाज में मजबूत होता दिखा। ‘अरे ड्रिंक करता है,सिगरेट पीता है तो क्या? इतने पैकेज  की नौकरी में ये सब करना पड़ता है। कितनी कॉर्पोरेट मीटिंग होती है, पता भी है?’। लेकिन वहीं पैकेज आजादी के 65 साल आते-आते सूखने लगे। अब लड़के ही नहीं लड़कों के मां-बाप भी पढ़ी-लिखी और ‘कमाऊ’ लड़की ढूंढने लगे। बहुएं टाइट जींस पहनकर ऑफिस जाने लगी, देर रात तक ऑफिस पॉर्टी में बिजी रहने लगी, और बूढ़े मां-बाप के बोन्टू को लेकर किसी महानगर के किसी छोटे से स्टूडियों अपार्टमेंट में रहने लगी, जहां बूढ़े सास-ससुर के लिए कोई जगह नहीं थी, और ऐसे में वो बूढ़े मां-बाप उसी पुराने घर में, पुराने कुर्ते-पजामें में, पुरानी साड़ी में दिखे, जैसा उनका बोन्टू किसी ‘अच्छे पैकेज’ की तलाश में छोड़ गया था। बताइएं हंसे या रोएं कि 15 अगस्त को 65 साल पहले हम आजाद हुए थे?

दरअसल आजादी  के इन 65 सालों में हमने सरकारी अस्पतालों को खुद बिगाड़ा। अपने डॉक्टर बेटे-बेटियों को गांवों की सरकारी डिस्पेंसरी में ‘मरने-खपने’ से बचने की सलाह दी और महानगरों के पांच सितारा जैसे अस्पतालों में जॉब करने पर जोर डाला। उन्हीं निजी अस्पतालों ने हमारे बीमार और कभी-कभी मुर्दा शरीर को बीमार बताकर हम से लाखों ऐंठे। मेडिकल बीमा पॉलिसी जैसे पासपोर्ट जैसी जरुरत बन गई।

हमने ही इन आजादी के इन 65 साल में सरकारी स्कूलों और उनके शिक्षकों को दोयम दर्जे का बताया। वहीं स्कूल्स जिनसे कभी पढ़-लिखकर हमारे मां-बाप ने हमें अफसर जैसी नौकरियां पाने के काबिल बनाया था, अब हमें म्युनिसिपॉलिटी के स्कूल लगने लगे। हमने निजी पब्लिक स्कूलों की ओर रुख किया, इसीलिए नहीं कि हमें अपने बच्चों की चिंता थी, इसीलिए कि हम अपने पड़ोसियों और रिश्तेदारों पर रोब जमाना चाहते थे। फिर भले ही हाईस्कूल तक आते-आते हमारे बच्चे बीयर और सिगरेट टेस्ट करने लगे। ‘वो’ एक्सपीरियेंस ले चुके हो और हम लगातार स्कूल की फीस के प्रेशर से हार्ट पेंशेंट बन जाएं।

हमने ही आजादी के इन 65 साल में अपने गांवों, कस्बों, शहरों की डगर पर स्वरोजगार या कुछ बेहतर करने की जगह महानगरों में नौकरी करनी शुरू कर दी। सिर्फ इसीलिए कि हम या मां-बाप ये कह सके कि ‘अरे! हमारा बेटा या दामाद फलां फलां शहर में, फलां-फलां कंपनी में जॉब करता है’। हालात इतने बिगड़े कि अपने घरों के धंधे छोड़, महानगरों में चंद हजार रुपये की नौकरी पाने की चाह रखने वाले युवाओं की भीड़ बढ़ने लगी। हमारे महानगर, इंसानों का समंदर बनते गए, जहां ना रहने को जगह बची, ना पीने को पानी, ना लेने को सांस और तो और, एक बार जी-भरकर देख लेने को मुठ्ठी भर आसमां। लेकिन गांवों में खेत खाली हो गए। कस्बों में छोटे-मोटे धंधे बंद होने लगे। कल तक अपने खेतों में कई बैलगाड़ियां भर सब्जी उगाने वाला भोलाराम, रामप्रसाद अब महानगर की किसी मल्टी में सिक्योरिटी गार्ड हो गया और पाव भर सब्जी लेने के लिए चार बार सोचने लगा। सरकार गांवों और कस्बों को आत्मनिर्भर नहीं बना सकी और शहरों की और पलायन एक मजबूरी बन गया। बताइएं हंसे या रोएं कि 15 अगस्त को 65 साल पहले हम आजाद हुए थे?

अब डॉयबीटीज़, ब्लड प्रेशर, हार्ट प्रॉब्लम, हाइपर टेंशन जैसी बीमारियां हमारे जीवन और शरीर का हिस्सा हो चुकी हैं। सर के बाल सफेद होने के लिए हमारे बूढ़े होने की राह नहीं देखते। अब भरे-पूरे बदन की होने के लिए लड़कियों को शादी या बच्चे होने का इंतजार नहीं करना पड़ता। वो तो बीयर,वोदका और ब्वॉयफ्रैंड्स के साथ नाइट आउट के चलते पहले ही हो जाता है। लड़कों के चेहरे कॉलेज पूरा होने तक शराब की पॉर्टियों के चलते भारी लगने लगते हैं। इंटरनेट, मोबाइल, एमएमएस के चलते बच्चे उम्र से पहले जवान होने लगे, और जवान, नौकरी-धंधों के प्रेशर में बूढ़े। बताइएं हंसे या रोएं कि 15 अगस्त को 65 साल पहले हम आजाद हुए थे?

हर 15 अगस्त को हम याद करते है कि हमने आजादी के कितने साल पूरे किए। हर 15 अगस्त को हम तिरंगा अपने कार या घर के टेबल पर लगाकर रस्म अदाईगी करते हैं। और फिर पूरे साल वही सब करते है, जो हम आजादी के 65 सालों में करते आए हैं। दरअसल हम आजादी के 65 साल बाद भी हम आजाद नहीं हो पाए कई बातों से। क्या हम अपने स्वार्थ से आजाद हो पाएं? क्या हम ‘पहले मैं, फिर मेरा परिवार, फिर मेरा जातिवाला समाज’ की भावना से ऊपर उठ पाएं? क्या हम ‘देश के बारे में सोचना मेरा काम नहीं’ के जुमले से आजाद हो पाएं? ऐसे कई सवाल, जो हर 15 अगस्त पर हमारे सामने आएंगे, जिनके जवाब शायद हम ढूंढ नहीं पाएं मौत से पहले। बताइए, हंसे या रोएं कि 15अगस्त को 65 साल पहले हम आजाद हुए थे?


एक भारतीय। 

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10 में से 3 वोट मिले

पाठकों की राय | 15 Aug 2012

Aug 16, 2012

आज़ादी की खुशी जो नही मनाना चाहते वो आज़ादी की कीमत ही नही जानते .

prashant kumar dubey katni

Aug 15, 2012

निमिष कुमार जी, सुंदर और सुम्वेदनशील लेख के लिए, बधाई. आपका लेख वस्विकता की आँखो में आँखें डाल उसका साख़्शत्कार करता है.

DR. GAMBHIR NEW DELHI

Aug 15, 2012

वेरी गुड क्या सही खाखा खिचा है युवा पीढ़ी का,

anil kumar raipur


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