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एडिट पेज: अरे, नेताओं के ‘मोटा माल’ से ही तो आम जनता ‘दुबली’ हो रही है!

Updated Aug 28, 2012 at 09:50 am IST |

 

28 अगस्त 2012

 निमिष कुमार,

संपादक,

हिन्दी इन डॉट कॉम

 

मेरे फेसबुकिया फ्रेंड हैं बी. जे. पांडा। बी. जे. पांडा एक युवा सांसद हैं और उड़ीसा के एक लोकसभा क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करते हैं। हाल ही में उन्होंने बीबीसी में एक लेख लिखा कि आखिर मध्यम वर्ग को नेताओं से इतनी नफरत क्यों है? मन हुआ कि अपने फेसबुकिया फ्रेंड सांसद बी. जे. पांडा को बताएं कि आखिर इस देश का मध्यम वर्ग आप लोगों से इतनी नफरत क्यों करता है? बताना जरूरी था, क्योंकि दिल्ली के दस सालों में अनगिनत बार महादेव रोड पर कोने के उनके सरकारी बंगले के सामने से गुजरा हूं। इससे पहले कि मैं उन्हें जवाब देता, बीजेपी नेता और लोकसभा में विपक्ष की नेता सुषमा स्वराज ने बता दिया कि आखिर इस देश का मध्यम वर्ग क्यों नेताओं से इतना चिढ़ता है। सुषमा स्वराज ने खुलेआम कहा कि कोयला घोटाले में कांग्रेस को ‘मोटा माल’ मिला है। इतना ही नहीं सुषमा स्वराज ने एक प्रश्न के उत्तर में ये तक कह डाला कि प्रधानमंत्री ने अपनी पार्टी को ‘मोटा माल’ दिलाने के लिए ये सब किया है। बस इसके साथ ही बाकी सब थम गया। हर कोई अब उस ‘मोटे माल’ की बात कर रहा है। हर न्यूज चैनल अब ‘मोटे माल’ को लेकर सरकार और विपक्ष की राजनीति की कुश्ती की लाइव प्रसारण कर रहा है। हर न्यूज पोर्टल ‘मोटा माल’ पर खबरें चला रहा हैं। और तो और, जिससे अब देश ही नहीं दुनियाभर की सरकारें डरने लगी हैं, वो सोशल वेबसाइट्स भी ‘मोटे माल’ पर आम आदमी के कमेंट्स से भरने लगी हैं। इंतजार कीजिए, अब अखबारों की सुर्खियों में भी ‘मोटा माल’ होगा। ‘मोटे माल’ पर आपको कॉर्टून देखने को मिलेंगे। मतलब हर जगह अब ‘मोटे माल’ की चर्चा होगी। हो भी क्यों नहीं, क्योंकि नेताओं के ‘मोटा माल’ के कारण ही तो आम जनता ‘दुबली’ है!  

मीडिया को लेकर सुषमा स्वराज का सेंस बहुत शानदार है। ‘फील गुड’, ‘इंडिया शाइनिंग’ के दिन याद आते हैं, जब सुषमा स्वराज की राजनीति को करीब से जानने का मौका मिला। ये वही सुषमा स्वराज हैं, जिन्होंने कर्नाटक के बेल्लारी में लोकसभा चुनाव के दौरान कन्नड सीखकर कांग्रेस की नाक में दम कर दिया था। सामने कांग्रेस की सोनिया गांधी थीं, जो बाद में चुनाव जीतीं भी, लेकिन सुनने लोग सुषमा स्वराज को आते थे। हिंदुस्तानी साड़ी, बड़ा-सा टीका वाली ‘सुषमा अम्मा’, महिलाओं में हिट हो गई थीं। वही ‘सुषमा अम्मा’ ने आज किया, और ‘मोटा माल’ कहकर कोयला घोटाले को लेकर चल रही सारी राजनैतिक झूमा-मस्ती को आम आदमी के करीब ला दिया। एक शब्द और कोयला घोटाले को लेकर हो रही सरकार और विपक्ष की लड़ाई में अब हिंदुस्तान का आम आदमी आ गया, क्योंकि बात ‘मोटा माल’ कमाने की थी। हो भी क्यों नहीं, क्योंकि नेताओं के इसी ‘मोटे माल’ के कारण तो आम जनता दुबली होती जा रही है?

दरअसल भारत का मध्यम वर्ग सारी जिंदगी ‘मोटा माल’ कमाने के चक्कर में ही पीसता रहता है। ऐसा पहले नहीं था। आजादी और आजादी के कई दशक तक इस देश में मध्यम वर्ग नाम की चिड़िया कम ही दिखाई देती थी। ये तो भला हो कोयला घोटाले को लेकर आरोप झेल रहे प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह का, जिन्होंने नब्बे के दशक में पीवी नरसिम्हा राव सरकार में वित्तमंत्री रहते हुए देश की आर्थिक सीमाएं खोल दी और अगले कुछ ही साल में देश में हर जगह मिडिल क्लास दिखाई देने लगा। दरअसल ये मिडिल क्लास उपभोक्तावाद की देन था, जिसे मोबाइल फोन, एलसीडी टीवी, मोड्यूलर किचन, वेल फर्नीशड् फ्लैट, शानदार कार और विदेश यात्राओं का चस्का लगाया गया। मां के हाथों की रोटियां गांव में ही रह गई और ‘मॉडर्न कमाऊ वाइफ’ के हाथों की ‘दो मिनट की मैगी’ लंच और डिनर हो गई। बच्चे अब सरकारी नहीं, पांच सितारा टाइप इंटरनेशनल स्कूल में जाने लगे। छींक भी आने पर सात सितारा अस्पताल जाना स्टेट्स सिंबल हो गया। ऐसे वक्त में मध्यम वर्ग को ‘मोटा माल’ कमाने की जरूरत महसूस होने लगी, और ‘मोटा माल’ मध्यम वर्ग की रोजाना की शब्दावली में आ गया। लेकिन सांसद बी.जे. पांडा जी, जब मध्यम वर्ग वो ‘मोटा माल’ नहीं कमा पाया और अपने नेताओं को साल-दर-साल ‘मोटा माल’ छापते देखा तो नेताओं से नफरत करने लगा। क्यों ना करें, अरे, नेताओं के ‘मोटा माल’ के कारण ही तो आम जनता ‘दुबली’ है!  

सुना है ये सारा कोयला घोटाला कुछ एक करोड़ छियासी लाख करोड़ रुपयों का है। टू-जी स्पेक्ट्रम घोटाला कोई पौने दो लाख करोड़ रुपये का था। कई और भी घोटाले पिछले १० साल में सामने आए हैं। ये रकम कितनी होती है, इसका अंदाजा हमारा मध्यम वर्ग नहीं लगा पाता। दिनभर किसी कॉर्पोरेट हाउस के ऑफिस में हाड़तो़ड़ मेहनत करने के बाद भी मियां-बीबी ‘मोटा माल’ नहीं कमा पाते, जिसका सपना वो देखते हैं। मोटे पैकेज वाले लड़के और उनके मां-बाप इस जुगाड़ में रहते है कि कैसे किसी ‘मोटे माल’ वाली लड़की से बेटे की शादी की जाए? सरकारी अधिकारी इस जुगाड़ में रहते है कि कैसे ऐसी पोस्टिंग मिले जिससे ‘मोटा माल’ कमाया जा सके? ठेकेदार इस जुगाड़ में रहते है कि कैसे वो ठेका मिले जिससे ‘मोटा माल’ छापा जाए? मतलब साफ है, हर कोई ‘मोटा माल’ छापने के जुगाड़ में है, बस बात मौका मिलने की है। और विपक्ष का यही आरोप है कि यूपीए सरकार को मौका मिला, तो उन्होंने ‘मोटा माल’ छाप दिया। कहा कि देश की दुबली होती आम जनता को बिजली देनी है, इसीलिए कोयला ब्लॉक्स के आवंटन में थोड़ा झोल-झाल करना होगा। अब विपक्ष चिल्ला रहा है कि पीएम ने अपनी पार्टी कांग्रेस को ‘मोटा माल’ कमा कर दिया। ऐसा ही टूजी स्प्रेक्ट्रम घोटाले के वक्त हुआ था। हर कोई पौने दो लाख करोड़ रुपये के ‘मोटे माल’ की चर्चा में व्यस्त हो गया था। सुनते है कि कोयला घोटाला तो उसका भी बाप निकला। आरोप है कि इसमें तो अब तक के हुए सभी घोटालों से ज्यादा ‘मोटा माल’ कमाया गया। आरोप-प्रत्यारोप कुछ भी हो, लेकिन इतना जरुर है कि घोटालों के ‘मोटे माल’ का यदि आम जनता के कल्याण के लिए उपयोग होता तो हमारे देश की आम जनता ‘दुबली’ नहीं रहती।

दिल्ली के दिनों में एक बार सांसदों के फ्लैट्स वाले नार्थ एवेन्यू में कई सांसदों की बहस चल रही थी। एक बुजुर्ग सांसद नाराज हो रहे थे। मामला था पॉर्लियामेंट स्टैंडिंग कमेटी की बैठक का। जब उस बुजुर्ग सांसद ने एक कुछ ही करोड़ के घोटाले की ओर इशारा किया, तो मीटिंग में मौजूद मंत्रालय के एक आला अफसर ने सादर निवेदन किया कि सांसद महोदय क्यों नहीं हम बड़े घोटालों पर बहस करें। फालतू में छोटी गड़बड़ियों पर बहस कर क्यों अपना वक्त ज़ाया करें। मतलब साफ है कि सरकार में मोटा माल की अहमियत बहुत पहले से है। अब देखिए ना, मोटा माल कमाने के चक्कर ने बिल्डर्स ने हमारे शहरों और कस्बों की फिज़ा बिगाड़ दी। जहां देखें, कांक्रीट के जंगल बना डाले। मालूम नहीं वो क्या जुगाड़ था कि होम लोन कभी छह फीसदी के आस-पास आ गया था, जिसका सीधा फायदा बिल्डर्स ने उठाया और मोटा माल कमाया। शायद उस मोटे माल का कुछ मोटा हिस्सा किसी मंत्री-अधिकारी को भी पहुंचाया गया होगा। देश के गांवों को जिला मुख्यालय से जोड़ने वाली सड़कें और पुल हो या गांवों-कस्बों में बनने वाली डिस्पेंसरियां, गरीबों के लिए दवाइयां हों या राशन, हर जगह सत्ता से दलाल ‘मोटा माल’ कमाने के चक्कर में रहते हैं, और आम आदमी उस मोटे माल कमाने की होड़ का शिकार होता है। क्योंकि पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की मानें तो केंद्र सरकार से चले एक रुपये में से मोटा हिस्सा तो बीच में ही गायब हो जाता है। अरे, नेताओं के ‘मोटा माल’ से ही तो आम जनता ‘दुबली’ है!  

दरअसल आम आदमी के मन में नेताओं को लेकर गुस्सा किसी से छुपा नहीं है। आम आदमी की मानें तो राजनीति अब देश में सबसे प्रोफिटेबल बिजनेस होता जा रहा है। एक अदना-सा नेता एक दिन कोई चुनाव जीतता है और देखते ही देखते कुछ साल में वो करोड़ों-अरबों में खेलने लगता है। यदि वो राजनीति में जम गया तो फिर तो वो अकूत संपत्ति का मालिक हो जाता है। इतनी अकूत संपत्ति की आम आदमी समझ ही नहीं पाएं। घोटालों की रकम राजनैतिक दलों के लिए भले ही एक और नंबर भर हो, लेकिन देश के हजारों-लाखों-करोड़ों लोगों के लिए वो जिंदगी का हिस्सा होता है। एक खुशहाल वर्तमान होता है, एक खूबसूरत भविष्य होता है। मान लिजिए यदि वो कोयला आवंटन वाकई में बिजली बनाने में उपयोग होता, तो क्या सरकारों का 2012 तक देश के हर गांव को बिजली देने का बरसों का लक्ष्य पूरा नहीं हो जाता। यदि राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन से जुड़ा करोड़ों रुपये का घोटाला नहीं होता, तो देश के गांव-गांव, शहर-शहर में आम आदमी को सस्ते दरों में चिकित्सा सुविधा मिली होती। दरअसल घोटाले संसद में बहस के पन्नों या सरकारी किताबों में दफन नहीं होते, वो महंगाई, काले धन, बेकारी, वर्ग-असमानता, जन-असंतोष जैसे भूत बनकर हमारी-आपकी जिंदगी में चौबीसों घंटे मौजूद रहते हैं। अरे, नेताओं के ‘मोटा माल’ से ही तो आम जनता ‘दुबली’ है!  
 
अब कुछ आम लोगों के सवाल। ऐसा क्यों होता है कि जरा-सा शोर होने पर संसद के सदन स्थगित कर दिए जाते हैं? पहले तो ऐसा नहीं होता था। हाल ही में ऐसी खबरें आई थी कि सरकार के एक मंत्री सदन अध्यक्ष की कुर्सी पर आसीन व्यक्ति के कान मं  कह रहे हैं कि सदन स्थगित कर दें। एक राजनैतिक पार्टी कहती है कि दूसरी राजनैतिक पार्टी सदन नहीं चलने दे रही, तो क्या सरकार में शामिल राजनैतिक पार्टी वाकई में संसद को चलाए रखना चाहती है? पहले जैसा क्यों नहीं सदन चलने देते, जिसे चिल्लाना है वो चिल्लाएं, जिसे वॉक-आउट करना है, वो करे, और देश के तमाम मतदाताओं और नागरिकों को ये देखने को तो मिले कि हमारी संसद में क्या हो रहा है और कौन क्या कर रहा है? वैसे भी करीब पौने दो लाख करोड़ रुपये से ज्यादा के कोयला घोटाले की जनता के पैसों की रकम से एक दिन संसद चलने से खर्च रकम से कहीं ज्यादा होती है, फिर आम जनता के उन पैसों का हिसाब कौन मांगेगा? आम आदमी को ये कौन बताएगा कि सदन स्थगित करने के क्या नियम हैं? क्या इस देश का आम आदमी किसी व्यक्ति या पार्टी की सनक पर चलेगा, कि वो जब चाहे संसद चलाए, जब चाहे संसद के सदनों को स्थगित कर दें? देश के आम आदमी को इस बात से मतलब नहीं कि सदन कौन चलने दे रहा है और कौन नहीं, वो तो बस चाहता है कि ये देश अच्छे से चले। ‘मोटा माल’ कमाने वाले जेल की सलाखों के पीछे जाएं, और आम जनता का पैसा आम जनता के लिए खर्च हो। क्योंकि अरे, नेताओं के ‘मोटा माल’ से ही तो आम जनता ‘दुबली’ है!  

एक भारतीय। 

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पाठकों की राय | 28 Aug 2012


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