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एडिट पेज: आमिर, क्या हम अपने बूढ़े मां-बाप को रोज बस एक कॉल भी नहीं कर सकते?

Updated Jul 16, 2012 at 17:28 pm IST |

 

16 जुलाई 2012

 निमिष कुमार,

संपादक,

हिन्दी इन डॉट कॉम।



मेरा एक मित्र है। पिछले सात-आठ साल से देख रहा हूं, वो हर रोज दूर किसी शहर में रह रहे अपने मां-बाप को फोन करता है। उनमें बातें बड़ी मजेदार होती हैं- ‘आज ऑफिस के कैंटीन में बैंगन की सब्जी बनी थी’। ‘ओबामा को इस बार कड़ी टक्कर मिल रही है’। ‘मेरी गाड़ी का टायर कल पंचर हो गया था, इसीलिए ऑफिस से रूम पर देर से आया’। ‘ममता ने प्रणब दा को समर्थन देने से मना कर दिया’। ‘कामवाली परसों नहीं आएगी, उसकी लड़की का गौना है’। ‘सरकार ने कहा महंगाई और बढ़ेगी’। ‘मेरा बॉस काला है और ऊपर से काला शर्ट पहनकर आज आ गया’। ‘कई यूरोपीय देशों के आर्थिक हालात खराब है, स्पेन में तो रोज सैकड़ों घोड़ों को कत्ल किया जा रहा है’। वगैरह वगैरह। वैसे बात सही भी है। रोज-रोज आप बातें करोगे तो किन मुद्दों पर। मैंने कई बार उनकी बातें सुनीं। पूछा भी कि ये सब क्या है। उसका जवाब बड़ा संजीदा था – ‘यार, मां-बाप कोई भी हो, गरीब हो या अमीर, आलिम फाज़िल हो या बेपढ़े, मुंबई में हो या मांडवा गांव, वो मां-बाप ही होते हैं। और बूढ़े मां-बाप, बस अपने बच्चों की आवाज सुनना चाहते हैं। और मैं अपने मां-बाप की। बातें कुछ भी हों, लेकिन हम आपस में एक-दूसरे की आवाज से सब समाचार जान लेते हैं, बिना कुछ कहे’। क्या हम अपने बूढ़े मां-बाप को रोज बस एक कॉल भी नहीं कर सकते?  

अपने गांव, कस्बों, शहरों से दूर महानगरों में बेहतर जिंदगी, बेहतर नौकरी, बेहतर कॉर्पोरेट पद पाने की कोशिश में हम छोड़ आते हैं वो आंगन, जहां कभी हम पैदा हुए थे, पले-बढ़े थे। वो मां-बाप जो हमारी हर एक छींक पर चौंक जाते थे, और शरीर छूकर देखते थे कि मुन्ना को कहीं बुखार तो नहीं है। उन्हीं मां-बाप से दिन के 24 घंटों में सिर्फ पांच मिनट बतियाने के लिए हम लोगों के पास समय नहीं होता है। हर कोई बिजी है। किसी की लोकल, तो किसी की मेट्रो छूट रही है। लोग गर्लफ्रैन्ड, यार-दोस्तों, बिजनेस पार्टनर्स से तो घंटों बतियाते रहेंगे, लेकिन यदि दूर किसी शहर, गांव, कस्बे में आस लगाए बैठे उनके मां-बाप से बात करने की सलाह दो, तो जवाब मिलेगा- यार, समय कहां है। बस करता हूं। कुछ तो और ही बड़े वाले निकलते हैं। एक वकील साहब से मिला। किसी बात पर चर्चा हो रही थी कि दूर गांव में रहने वाली मां का फोन आया। युवा वकील साहब भड़क उठे। महीना भर से फोन नहीं किया तो क्या हुआ। भला-चंगा हूं। अब फोन ना आए तो समझ लेना, ‘नो न्यूज़, इज़ गुड न्यूज़’। क्या हम अपने बूढ़े मां-बाप को रोज बस एक कॉल भी नहीं कर सकते?  


बूढ़े मां-बाप को लेकर एक नैतिक कथा याद आती है। अपनी जवान पत्नी की मांसल देह पर बौराए जवान युवक ने अपने बूढ़े, बीमार, लाचार पिता को जिंदा दफन करने का फैसला किया। जिससे पत्नी की परेशानी कम हो और वो दिल-खोलकर बिना किसी हिचक अपनी जवान पत्नी से प्यार कर सके। युवक ने बूढ़े पिता को बैलगाड़ी में पटका और घर से दूर चल पड़ा। उसके साथ उसका छोटा मासूम बेटा भी था। जंगल में जाकर उसने गड्डा खोदना शुरू किया। जब युवक के मासूम बेटे ने पूछा तो उसने बताया कि तुम्हारे दादाजी अब बूढ़े हो चुके हैं। कोई काम नहीं करते। दिनभर खांसते रहते हैं। इसीलिए उन्हें जमीन में दफन कर रहे हैं। पिता की बात सुनकर वो मासूम विचलित हो गया। अब वो दादाजी की कहानियां नहीं सुन पाएगा। दादाजी के साथ रोज मंदिर नहीं जा पाएगा। अब कौन उसकी उंगली पकड़कर उसे रोज स्कूल बस तक छोड़ने और लेने आएगा। थोड़ी देर बात युवक ने देखा कि उसका मासूम बेटा एक लकड़ी से ज़मीन में गड्डा करने की कोशिश कर रहा है। हैरान पिता ने अपने बेटे से पूछा, तो उसने बड़ी मासूमियत से जवाब दिया- जब आप भी दादाजी जैसे हो जाएंगे तो मैं भी आपको ज़मीन में ऐसे ही सुला दूंगा। ये एक नैतिक कथा है, शायद हमारे आज के युवाओं ने नहीं पढ़ी या शायद भूल गए। वरना क्या हम अपने बूढ़े मां-बाप को रोज बस एक कॉल भी नहीं कर सकते?  


आमिर, दक्षिण भारत के उस गांव की कहानी पता चली। कैसे अपने बूढ़े मां-बाप से छुटकारा पाने के लिए उन लोगों ने एक घिनौनी प्रथा शुरू की। आश्चर्य इस बात का है कि ये लंबे समय से होता आ रहा है, तभी तो एक प्रथा का रूप ले लिया। लेकिन हमारा प्रशासन और पुलिस, सरकार और समाज, इस पूरे मामले में अभी तक चुप ही थे। हाल ही में मुंबई के रेल्वे स्टेशन पर एक बूढ़ी अम्मा के बारे में पता चला था। रोजाना लोकल में सफर करने वालों ने देखा कि एक बूढ़ी भिखारीन से दिखने वाली वृद्धा के रहने, खाने-पीने, पहनने में एक सभ्रांत परिवार की झलक दिख रही है। इतनी ही नहीं वो वृद्धा रोज अखबार पढ़ती देखी गई। जब ये खबर अखबारों और न्यूज चैनलों पर चली, तो उस वृद्धा को जानने वाले ढेरों लोग सामने आए। मालूम चला वो मुंबई के एक संभ्रांत बिजनेसमैन परिवार से थी। और उसके दो करोड़पति बेटे, कई पोते-पोतियां हैं। कुछ ऐसा ही वाकया दिल्ली में कुछ साल पहले मीडिया की सुर्खियों में आया था। एक बुजुर्ग दंपत्ति को फुटपाथ पर एक प्लाटिक की छत के नीचे ठिठुरते एक रिपोर्टर ने देखा। सूरत-शक्ल से वो भिखारी नहीं लग रहे थे। बाद में पता चला कि पास ही बिल्डिंग में उस बुजुर्ग दंपत्ति के चार बेटे अपने परिवारों के साथ रहते थे। जब सारा मामला न्यूज चैनलों और अखबारों की सुर्खियां बना, तो चारो बेटे-बहुएं सामने आए और सैकड़ों लोगों के सामने मांफी मांगी। लेकिन इससे पहले गुस्साए लोग उस बुजुर्ग दंपत्ति के बेटों और बहुओं की अच्छी तरह से पिटाई कर चुके थे।

ऐसा नहीं कि जो बुजुर्ग अपने ही बच्चों के द्वारा घर से निकाले नहीं गए, उनके हालात ठीक हैं। बुजुर्ग मां-बाप को समय पर खाना ना मिलना। या उनकी उम्र के मुताबिक उन्हें सही भोजन नहीं देना अब समाज में आम बात होती जा रही है। बुजुर्गों को घर के बाहर रखना या घर के समारोह में अलग-थलग किए जाना आम होता जा रहा है। ऐसे कई बुजुर्गों से मुलाकात हुई है, जो अपने बच्चों से बात करने को तरस जाते हैं। एक बार मेरे एक मित्र ने मुझे अपने गोद लिए माता-पिता के बारे में बताया। गोरे, ऊंचे शानदार उस लाचार बुजुर्ग दंपत्ति के बारे में पता चला कि पति पूर्व प्रधानमंत्री के खास अधिकारियों में से एक थे। पत्नी उस जमाने में ऑक्सफोर्ड ग्रैजुएट को मात देने वाला ज्ञान रखती थी। एक समय जो दंपत्ति इंदिरा गांधी जैसे पॉवरफूल प्राइम मिनिस्टर के घर में होने वाले हर समारोह में आमंत्रित होते थे। दो बेटे और एक बेटी थी। एक अमेरिका में, एक ब्रिटेन में और एक ऑस्ट्रेलिया जाकर बस गए थे। मालूम चला तीनों संतानों में से कभी साल-दो साल में किसी का फोन आ जाता है। वरना दोनों बुजुर्ग एक-दूसरे के कांपते हाथों का सहारा लेकर जिंदगी काट रहे थे। मेरा वो मित्र हर वीकेंड पर उनके घर जाता और ढेर-सारी बातें करता। क्योंकि उम्र के उस पड़ाव पर वो किसी से बात करने को भी तरस गए थे। इन घटनाओं को देखकर, सुनकर लगता है कि क्या हमारा समाज, हमारे युवा अपनी जिंदगी में इतने मस्त हो गए है कि हम अपने बूढ़े मां-बाप को रोज बस एक कॉल भी नहीं कर सकते?  


आमिर, दरअसल पढ़ाई के लिए अपने गांवों, कस्बों, शहरों से बाहर निकले बच्चे कभी वापस नहीं आ पाएं। जो एक बार नौकरी के लिए घर के बाहर बड़े महानगरों की ओर निकला, वो वापस नहीं लौटा। कॉलेजों में पढ़ने वाले युवा खुद को भले ही आधुनिक शिक्षा के धुंरधर साबित करने की कोशिश करें, लेकिन ये सच है कि जितना वक्त वो अपनी गर्लफ्रैंड या ब्वॉयफ्रैंड से बतियाने में गुजारते हैं, उसका एक परसेंट भी वो अपने मां-बाप से नहीं करते। इंटरनेट की दुनिया में बहनेवाली युवा पीढ़ी के पास कई बेतुके तर्क होते हैं। ‘मैनें अपने पैरेंट्स को फेसबुक अकाउंट बनाने को कहा है, उस पर चैट कर सकेंगे।’ ‘अब तो हम स्कॉईप पर ही बात कर सकते हैं।’। हर वीकेंड में ‘नाइट ऑउट’ के बहाने शराब की पॉर्टियों में धुत होने वाली युवा पीढ़ी के पास अपने मां-बाप से बात करने का वक्त नहीं है। महिलाएं बड़े गर्व से बताती है कि अपनी बेटी के लिए ऐसा लड़का देखा है जो शहर में अकेला रहता है। शादी के बाद हमारी बेटी और दामाद रहेंगे बस। बेटी राज करेगी। ऐसी फूहड़, बेढंगी बातें करते वक्त हम ये भूल जाते है कि यही बात आपके घर की बहुएं सोचने लगे तो?

आमिर, दरअसल हमने खुद अपने समाज की कब्र खोदी है। बाल-मन में पहले हम पैसे का बीज डालते हैं। अपने बच्चों की शादी का पैमाना उसकी योग्यता, काबिलियत या जिंदगी में कुछ कर गुजरने का जज़्बा नहीं, लड़के की सैलरी या लड़की का दहेज होता है। जिंदगी के हर मोड़ पर हमने पैसे को ज्यादा महत्व दिया, रिश्तों, संस्कारों, तहजीब को कम। हम पैसे के लिए हर बात पर समझौता करने को तैयार दिखे। कभी रिश्वत लेने वाले के यहां चाय तक नहीं पीने वाला समाज, अब काली कमाई के सौदागरों से लिपटा दिखता है। हमने अपने घरों में संस्कारों के पौधे नहीं लगाए। क्योंकि हम कैसे भी जल्द से जल्द पैसा कमाने के चक्कर में रहे। ऐसे में जिस समाज में हर दूसरे आदमी के जीवन का उद्देश्य ही बस पैसा कमाना रह गया हो, वहां किसी के पास परिवार के संस्कारों के पौधों को सींचने का वक्त कहां है। इतना भी नहीं कि हम अपने बूढ़े मां-बाप को रोज बस एक कॉल भी नहीं कर सकते?  


एक भारतीय

 

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पाठकों की राय | 16 Jul 2012

Jul 28, 2012

आर्टिकल पढ़ कर दिल भर आया| कुछ ऐसा ही फिल्म बागवान में दिखा| बहुत अच्छा आर्टिकल है

rakesh gurgaon

Jul 23, 2012

SUPERB ARTICLE!!!!!!!!!!!

MANMOHAN DELHI


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