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लेख: आखिर गरीबों को मोबाइल फोन देने के पीछे राजनीति क्या है?

Updated Aug 11, 2012 at 12:21 pm IST |

 

11 अगस्त 2012

 उमेश चतुर्वेदी


 

 

कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी को अहम जिम्मेदारी देने की मांग लगातार बढ़ती जा रही है। इसका मतलब भी साफ है कि अगले चुनाव राहुल गांधी के नाम पर ही लड़े जाएंगे। इस बीच प्रियंका गांधी को रायबरेली की जनता की फरियाद सुनने की जिम्मेदारी भी दे दी गई है। राजनीति की दुनिया में वोट आकर्षित करने वाली करिश्माई नेता की छवि प्रियंका में देखने वाले कांग्रेसियों के लिए यह जिम्मेदारी राहत की बात हो सकती है। उन्हें लगता है कि प्रियंका को इसी बहाने राजनीति में लाने की कोशिश शुरू हो गई है। ऐसे में होना तो यह चाहिए था कि कांग्रेसी भावी जीत को लेकर निश्चिंत रहते। लेकिन राहुल गांधी को लेकर अतीत में दिखी जनता की ठंडी प्रतिक्रिया लगता है उन्हें आश्वस्त नहीं रहने दे रही है। इसकी वजह बनी है लगातार बढ़ती महंगाई। अर्थव्यस्था को पटरी पर लाने की कोशिशों की मिट्टी पलीद कर रही है औद्योगिक क्षेत्र से आ रही खराब खबरें। मई और जून में लगातार औद्योगिक उत्पादन में गिरावट दर्ज की गई है। मई में यह गिरावट जहां 2.4 फीसदी थी, वहीं जून में यह और ज्यादा यानी 1.8 फीसदी हो गई। ऐसे में जनता का भरोसा अगर डिग जाए तो हैरत भी नहीं होनी चाहिए। महंगाई की मार से जूझ रही जनता और लगातार घटते औद्योगिक उत्पादन के चलते लगता है कांग्रेस को अगले चुनाव में सिर्फ मुद्दों के दम पर बाजी मारने की उम्मीद कमजोर होती जा रही है। देश के साठ लाख बीपीएल परिवारों को मोबाइल फोन और उन्हें हर महीने 200 रुपए का टाक टाइम देने के प्रस्ताव को आशंकित कांग्रेस की वोट खींचू कोशिश के तौर पर ही देखा जा रहा है।

वैसे इसे लेकर खंडन और उसे मंजूर करने का खेल भी खूब हुआ है। इसे देखकर कहा जा सकता है कि आर्थिक मोर्चे पर लगातार पिट रहे मौजूदा राजनीतिक तंत्र ने सच बोलने और उसे नकारने के बीच बारीक रेखा खींचने और उसके ही सहारे अपनी रणनीति बनाने में कामयाबी हासिल कर ली है। गरीबी रेखा के नीचे गुजर-बसर कर रहे साठ लाख परिवारों को मोबाइल फोन देने की योजना का पहले खुलासा और फिर उससे सरकार का इनकार राजनीतिक तंत्र की इस कामयाबी को ही साबित करता है। दिलचस्प है कि मीडिया में खबरें उछलने के बाद सरकार अपनी ऐसी किसी योजना को ही सिरे से नकारती रही , लेकिन योजना आयोग के उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह अहलूवालिया ऐसी योजना की तस्दीक करते रहे। अहलूवालिया ने साफ कहा कि उनके सामने ऐसी योजना आई है और उसे लागू करने - ना करने को लेकर योजना आयोग में विचार चल रहा है। सरकार के इनकार और अहलूवालिया के स्वीकार से एक बात साफ है कि या तो सरकार सच बोल रही है या फिर योजना आयोग के उपाध्यक्ष। इसका दूसरा पहलू यह भी है कि कोई न कोई पक्ष हकीकत को बयान नहीं कर रहा है, बल्कि झूठ बोल रहा है। लेकिन एक बात साफ है कि सरकार बीपीएल परिवारों को मोबाइल फोन और दो सौ रूपए महीने का टाक टाइम वहन करने की तैयारी में है। आर्थिक तंगी के नाम पर पेट्रोल और डीजल के साथ ही रसोई गैस की कीमतों में आग लगाने की तैयारी में जुटी जो सरकार हाथ खड़े कर रही हो, वही सरकार अगर साठ लाख मोबाइल बांटने पर करीब साठ लाख हजार और उन्हें एक अरब बीस करोड़ रूपए सिर्फ टाक टाइम देने के लिए खर्च करने को तैयार हो तो सवाल उठेंगे ही। सवाल यह उठेगा कि सरकार का आर्थिक परेशानी का रोना या तो गलता है या फिर वह जनता को लुभाने के लिए ऐसी कोशिशें कर रही है। सवाल यह कि आखिर जिस सब्सिडी के जरिए अर्थव्यवस्था को गति मिलती हो, उसे खत्म करके ऐसे मद में खर्च बढ़ाने की जरूरत क्यों पड़ रही है, जिसका कोई उत्पादक नतीजा ना हो। सवाल तो यह भी है कि पैसे की कमी का रोना रोने वाली सरकार आखिर इतनी बड़ी रकम कहां से जुटाएगी। सवाल यह भी है कि आज भोजन, कपड़ा और छत उपलब्ध कराना ज्यादा जरूरी है या मोबाइल। सरकार ने शिक्षा के अधिकार को भी मूल अधिकार में शामिल कर दिया है। लेकिन पैसे की कमी के चलते अब तक इसे पूरी तरह से लागू तक नहीं किया जा सका है। लेकिन वह गरीबी रेखा से नीचे जिंदगी गुजारने वाले परिवारों को मोबाइल फोन देने के लिए रकम जुटाने को तैयार हो गई है। जो सरकार पैसे की तंगी के बहाने खाद्य निगम के गोदामों में अनाज की सही ढंग से रखरखाव नहीं कर पा रही और पैसे की ही कमी के चलते अपने ही गोदामों में सड़ रहे अनाज को भूखों तक नहीं पहुंचा पा रही, वही सरकार मोबाइल बांटने जैसे लोकप्रिय कदम उठाएगी तो उसकी नीयत पर विश्वास करना आसान नहीं होगा।

अभी हाल ही में नेशनल सैंपल सर्वे की रिपोर्ट आई है। जिसने डरावने नतीजे दिए हैं। इस रिपोर्ट के मुताबिक देश में आठ करोड़ तैंतीस लाख लोग ऐसे हैं, जिन्हें रोजाना महज सत्रह रूपए पर गुजारा करना पड़ रहा है। आज की महंगाई के दौर में इतनी कम रकम पर गुजारा करना कैसे संभव हो पाएगा। ऐसे में अव्वल तो होना यह चाहिए कि तकरीबन फाकामस्ती में गुजारा करने को मजूबर देश के इन करीब साढ़े आठ करोड़ लोगों की हालत सुधारी जाती। होना तो यह चाहिए कि बीपीएल परिवारों को उनकी जरूरत के मुताबिक अनाज और दूसरी बुनियादी जरूरतें मुहैया करायी जातीं। खाद्य सुरक्षा का दायरा बढ़ाया जाता। ताकि भूख और कुपोषण से होने वाली मौतों को टाला जाता। लेकिन सरकार का इसकी बजाय लोकलुभावन कामों पर ज्यादा ध्यान है।

ध्यान रखने की बात यह है कि पेट्रोल, डीजल या खाद पर सब्सिडी खेती-किसानी के लिए राहत बनकर आती है तो इसके जरिए सामान्य महंगाई पर लगाम लगती है। उससे उत्पादकता में बढ़ोत्तरी भी होती है। फिर अर्थव्यवस्था को गति भी मिलती है। क्या सरकार मोबाइल बांटने की अपनी योजना के साथ ऐसा दावा कर सकती है। हकीकत तो यह है कि मोबाइल बांटकर उत्पादकता में कोई बढ़ोत्तरी नहीं की जा सकती। सवाल यह भी है कि क्या सरकार इन परिवारों को लगातार दो सौ रूपए महीने का टाक टाइम मुहैया कराती रहेगी। सवाल यह भी है कि क्या इसी बहाने सरकार टेलीकम्युनिकेशन कंपनियों को राहत पहुंचाने की तैयारी में हैं। वैसे यहां यह बता देना जरूर है कि संचार क्षेत्र घाटे में भी नहीं है। इन सवालों के जवाब जब मिलेंगे-तब मिलेंगे। लेकिन एक बात तय है कि कि इस योजना का मकसद सिर्फ राजनीतिक फायदा उठाना है। अगर विपक्ष सरकार पर इस बहाने वोट बटोरू राजनीति करने का आरोप लगाता है तो उस पर भरोसा ना करने की कोई वजह भी नजर नहीं आती। भारी विरोध के चलते सरकार भले ही इस योजना को टालती नजर आ रही हो, लेकिन यह तय है कि देर-सवेर अपने राजनीतिक फायदे के लिए इसका इस्तेमाल जरूर करेगी। यह बात और है कि ऐसे टोटके भी कई बार राजनीतिक कामयाबी की गारंटी नहीं होते।

( देश के नामी अखबरों, टीवी न्यूज़ चैनलों में संपादकीय जिम्मेदारियां संभालने वाले लेखक ने हर मुद्दे पर लिखा। अखबारों की खाक छानी और आम आदमी की देसी परेशानियों पर लिखा, तो न्यूज़ चैनलों में रहकर मुद्दों को गति और धार दी। दिल्ली में रहते है लेकिन देश-दुनिया के मुद्दों पर नजर रखते हुए कलम चलाते रहतें हैं।)



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