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भोपाल गैस त्रासदी के 28 साल

Updated Dec 03, 2012 at 12:11 pm IST |

 

03 दिसम्बर 2012
आईबीएन-7

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भोपाल। डेढ़ साल पहले भोपाल गैस त्रासदी मामले में अदालत का फैसला आने के बाद केन्द्र और मध्य प्रदेश की सरकार ने वादा किया कि किडनी और कैंसर के गंभीर मरीजों को दो-दो लाख रुपये मिलेंगे। मगर त्रासदी के 28 साल बाद भी हजारों मरीज मुआवजे से महरूम हैं। आपको बता दें कि 3 दिसंबर 1984 को भोपाल यूनियन कार्बाइड फैक्ट्री से जहरीली गैस निकलने से 15 हजार से ज्यादा लोगों की मौत हुई थी, जबकि हजारों लोग गंभीर बीमारियों की चपेट में आ गए।

भोपाल की नगर निगम कॉलोनी में रहने वाली साबरा बी गैस हादसे के बाद से ही किडनी की बीमारी से परेशान हैं। अब नौबत ये आ गई है कि हफ्ते में दो मर्तबा डायलिसिस होती है। भोपाल मेमोरियल अस्पताल में इनका इलाज चल रहा है। डॉक्टरों के मुताबिक साबिरा बी को ईएसआरडी यानि टोटल रीनल फेल्योर की बीमारी है। मगर कल्याण आयुक्त ने उन्हें टोटल रीनल फेल्योर में मिलने वाली मदद देने से साफ मना कर दिया है। राजेन्द्र नगर में रहने वाली शशिकला सिंह के पति अजय की मौत बारह साल पहले कैंसर से हुई। डेढ़ साल पहले हुए सरकार के ऐलान ने शशिकला के मन में मदद की उम्मीद जगा दी थी। लेकिन शशिकला को भी कोरा वादा मिला है।

गैस पीड़ित साबरा बी के मुताबिक डायलिसिस होता है। इससे कमजोरी होती है। किडनी की परेशानी है। चल फिर नहीं पाती। उन्होंने दो लाख का आवेदन निरस्त कर दिया। गैस पीड़ित शशिकला सिंह के मुताबिक ब्लड कैंसर से मौत हो गई तो पर्ची आई थी मेरे पास हम लोग कागज़ लेकर गये मगर कुछ हुआ नहीं, कुछ मिला नहीं अभी तक।

केन्द्र सरकार का ऐलान होने के बाद जैसे ही वेलफेयर कमिश्नर ने मुआवज़ा देने के लिए सूची मांगी तो भोपाल में 12,700 से ज्यादा गैस पीड़ितों ने कैंसर औऱ किडनी की बीमारी के मुआवज़े की अर्जी लगाई। लेकिन इसमें से मुआवज़े के लिए मंज़ूर हुये सिर्फ चार हज़ार मामले। गैस पीड़ित संगठनों का आरोप है कि सरकार मनमाने तरीके से मामलों को खारिज़ कर रही है।

भोपाल गैस पीड़ित महिला उद्योग संगठन संयोजक अब्दुल जब्बार के मुताबिक..

उस सबके बाद यहां जो मेडिकल एक्सपर्ट की टीम बनी उसने मनमाने डंग से नॉर्मस तय कर लिये। जो टोटल रीनल फेलुयर होगा तो ही उसे किडनी का केस कहेंगे। कैंसर में इस इस प्रकार का केस होगा तो ही हम कहेंगे। नतीजतन 12,700 में से 8,000 को मुआवज़ा नहीं मिला।

सरकार के मुताबिक कैंसर औऱ किडनी के मरीज तय करने का काम विशेषज्ञों की कमेटी को दिया गया है। जितना बजट है उसमें जरूरतमंदों की ही मदद की जा सकती है। गैस राहत मंत्री बाबूलाल गौर के मुताबिक आप दीजिये हम परीक्षण कराते हैं। लेकिन तथ्य होना चाहिए। मैं कह दूं कि बाबूलाल गौर ही गैस पीड़ित हैं। मैं कह दूं कि किडनी खराब हैं। जांच करवाएंगे आपकी। किडनी खराब नहीं तो आपको कैसे पांच लाख दे दें। जनता का पैसा है।

भोपाल गैस त्रासदी। दुनिया के सबसे खतरनाक औद्योगिक हादसे की अट्ठाईसवीं बरसी भी आ गई लेकिन इलाज औऱ मुआवजे की जो शिकायतें पहले साल हुईं थीं वो आज भी बरकरार है। भोपाल का पुराना शहर गवाह है कि केन्द्र औऱ राज्य सरकार ने इस शहर के लोगों के साथ इंसाफ़ नहीं किया है।

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