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एडिट पेज: क्या अभिशप्त हैं मुंबई पुलिस के ‘एनकाउंटर स्पेशलिस्ट’?

Updated Feb 20, 2013 at 17:06 pm IST |

 

20 फरवरी 2013

 निमिष कुमार,

संपादक,

हिन्दी इन डॉट कॉम

 

सैमुएल अमोलिक, उम्र साठ साल को पार, तीखी मुछें, सर पर कम बाल, सख्त चेहरा। नाम और चेहरे से भले ही कुछ खास ना लगे, लेकिन इस नाम के आगे जुडे़ एक शब्द ने दिलोदिमाग में एक साथ ढेरों बातें ला दी। जब न्यूज चैनलों ने ब्रेकिंग न्यूज में चलाना शुरु कि मुंबई के नवी मुंबई इलाके में एक बिल्डर पर हुए जानलेवा हमले और उसकी मौत के पीछे पूर्व ‘एनकाउंटर स्पेशलिस्ट’ इमैनुएल अमोलिक का हाथ होने का पता चला है, तो दो दशक पूर्व एक हिन्दी अखबार की स्पेशल स्टोरी यकायक आखों के सामने आ गई। अपनी पत्रकारिता के उन शुरुआती दिनों की उस स्पेशल स्टोरी ने पहले पहल मुंबई और मुंबई के ‘एनकाउंटर स्पेशलिस्ट’ से रुबरु करवाया था। तीन चेहरे, प्रफुल्ल भोंसले, विजय सालसकर और प्रदीप शर्मा। पहले पहल मालूम हुआ कि शर्मा-भोंसले-सालसकर की तिकड़ी से अंडरवर्ल्ड कांपता था। अंडरवर्ल्ड इसे ‘डेथ स्क्वॉड’ कहने लगा था। क्योंकि ये सीधे फैसला सुना देते थे, सजा-ए-मौत। इनकी रिवाल्वर से निकली गोली और गैंगस्टर ढेर। धीरे-धीरे मुंबई अंडरवर्ल्ड की खबरें बढ़ी, तो मुंबई पुलिस के एनकाउंटर स्पेशलिस्ट अधिकारियों को लेकर भी खबरें आने लगी और रिस-रिस कर आने लगे कई और नाम- संजय कदम, विनायक साउदे, अनंत केन्जाले, असलम मोमिन, रवींद्र आंग्रे, अरुण बोरुडे, सचिन वाजे, दया नायक, राजू पिल्लै, शिवाजी कोलेकर, नितीन विचारे, अशोक बोरकर और इमैनुअल अमोलिक। और आने लगे इनसे जुड़ी खबरें। किसने किसको टपकाया? किसने किस गैंग के शूटर को मारा? किसकी गिनती कितनी हुई? प्रदीप शर्मा ने पूरा किया शतक? भोंसले सेंचुरी के पास? दया नायक का नया नंबर?

प्रदीप शर्मा ने जब गैंगस्टर विनोद मतकर को मारा तो पूरे अंडरवर्ल्ड में हड़कंप मच गया। शर्मा उस वक्त मुंबई पुलिस की अंधेरी इंटेलीजेंस यूनिट में सीनियर पुलिस इंस्पेक्टर थे। शर्मा की रिवाल्वर से निकली गोली ने परवेज सिद्धिकी, रफीक डब्बावाला, सादिक कालिया सहित तीन लश्कर के आतंकियों को मार गिराया। कहा जाता है कि प्रदीप शर्मा ने कुछ 112 एनकाउंटर किए, जो मुंबई पुलिस के किसी भी एनकाउंटर स्पेशलिस्ट की गिनती में सबसे ज्यादा थे। वहीं ‘एनकाउंटर स्पेशलिस्ट’ बन चुके प्रदीप शर्मा के साथ एक और युवा पुलिस अधिकारी तेजी से ‘एनकाउंटर स्पेशलिस्ट’ की दुनिया में अपना नाम कमा रहा था- वो था कर्नाटक के उड्डपी इलाके के एक बहुत ही सामान्य परिवार से आया दक्षिण भारतीय युवक- दया नायक। खुद दया नायक ने कई बार इस बात का जिक्र किया कि पुलिस सेवा में आने से पहले उसने एक रेस्त्रां में बरसों काम किया। दिन भर रेस्त्रां में काम और रात में पढ़ाई। जिंदगी में कुछ करने का जस्बा दया नायक को एक दिन रियल लाइफ हीरो की तरह बना गया। बताते है कि मुंबई के जुहू पुलिस स्टेशन में पहली ही पोस्टिंग के दौरान एक रात दया नायक से दो खूंखार गैंगस्टर भिड़ गए। दोनों ओर से गोलियां चली, नतीजा- दया नायक के एनकाउंटर्स की गिनती शुरु हो गई। दो से शुरु दया नायक की गिनती करीब 86 तक पहुंची। 26/11 के मुंबई आतंकी हमले में शहीद हुए विजय सालसकर भी अपने समय में चर्चित एनकाउंटर स्पेशलिस्ट रहे। एनकाउंटर्स में 80 से ज्यादा गैंगस्टर्स को मार गिराने वाले सालसकर के बिग कैच थे- अमर नाइक और सदा पावले। अमर नाइक मुंबई अंडरवर्ल्ड के पिल्लर्स में से एक था, वहीं सदा पावले उर्फ ‘सदा मामा’ मुंबई अंडरवर्ल्ड का एक खास हिस्सा था। प्रफुल्ल भोंसले भी मुंबई पुलिस के एनकाउंटर स्पेशलिस्ट हीरोज़ में से एक रहे। करीब 90 गैंगस्टरों को एनकाउंटर्स में मार गिराने वाले भोंसले दरअसल सालसकर के साथ मुंबई अंडरवर्ल्ड में ‘डेथ स्क्वॉड’ वाली टीम का हिस्सा रहे। आरिफ कालिया जैसे गैंगस्टर को एनकाउंटर में मार गिराने वाले प्रदीप भोंसले मुंबई अंडरवर्ल्ड की कमर तोड़ने वाले ‘एनकाउंटर स्पेशलिस्ट’ में से एक रहे। सचिन वाजे, रवींद्र आंग्रे जैसों एनकाउंटर स्पेशलिस्ट ने 50 से ज्यादा गैंगस्टरों को मार गिराया। १९९३ से २००३ के बीच का समय था, जब मुंबई पुलिस के एनकाउंटर स्पेशलिस्ट कहे जाने वाले इन जाबांज ऑफिसरों ने करीब ७०० गैंगस्टरों को एनकाउंटर्स में मार गिराया और मुंबई से अंडरवर्ल्ड का खात्मा कर दिया। नाम कई है, किस्से उससे भी ज्यादा। शायद इसीलिए भारतीय समाज में एनकाउंटर स्पेशलिस्ट को लेकर पिछले कुछ दशकों में बड़ा क्रेज बना। अब फिल्म दुनिया भी इससे अछूती नहीं रह रही। फिल्मों में पुलिसवालों का एनकाउंटर स्पेशलिस्ट वाला रोल बड़े ही तरीके से बुना जाने लगा। इतना ही नहीं बॉलीवुड ने तो एनकाउंटर स्पेशलिस्ट पर फिल्में भी बना डाली, फिर वो ‘अब तक छप्पन’ हो या ‘शागिर्द’, ‘कगार’ हो ‘खाकी’, ‘गर्व’ ‘कंपनी’ ‘ऑन-मैन एट वर्क’ ‘शूटऑउट एट लोखंडवाला’ ‘डिपार्टमेंट’ ‘सरफरोश’ जैसी कई फिल्में एनकाउंटर स्पेशलिस्ट कहे जाने वाले अधिकारियों के इर्दगिर्द बनी।

लेकिन रियल लाइफ में ‘एनकाउंटर स्पेशलिस्ट’ के साथ जो हुआ वो छुपा नहीं हैं। कभी मुंबई पुलिस की शान कहे जाने वाले, मुंबई पुलिस को स्कॉटलैंड यार्ड जैसा बना देने वाले इन एनकाउंटर स्पेशलिस्ट्स पर आय से अधिक संपत्ति जमा करने के आरोप लगे। कभी कहा गया कि प्रदीप शर्मा के तीन हजार करोड़ की संपत्ति है, तो कभी आरोप लगा कि दया नायक ने करोड़ रुपये की लागत का स्कूल अपने गांव में बनवाया है। एनकाउंटर स्पेशलिस्ट अंडरवर्ल्ड से अपने संबंधों को लेकर भी हमेशा आरोप झेलते रहे। आरोप लगते रहे कि मुंबई पुलिस के एनकाउंटर स्पेशलिस्ट गैंगस्टरों से पैसा लेकर उनके विरोधियों को एनकाउंटर में मार गिराया करते थे। मासूमों को एनकाउंटर में मार गिराने का मामला हो या कारोबारियों, बिल्डरों को धमकाकर पैसा वसूलने के केस, ऐसे आरोपों से भी एनकाउंटर स्पेशलिस्ट कभी बच नहीं सके। एनकाउंटर स्पेशलिस्ट्स को लेकर कई बातें सुनी जाती रही हैं, जैसे ये मुंबई पुलिस का दुर्भाग्य ही कहा जा सकता है कि एनकाउंटर स्पेशलिस्ट्स का बादशाह कहा जाने वाला प्रदीप शर्मा अब खुद जेल में है। दया नायक को खुद गिरफ्तारी से बचने के लिए भागना पड़ा था। असलम मोमिन को माफिया से संबंध रखने के चलते बर्खास्त किया गया। अरुण बरुडे पर एक नाबालिग से बलात्कार के आरोप लगे और कभी एनकाउंटर स्पेशलिस्ट रहे बरुडे को पुलिस से बचकर भागना पड़ा। बाद में बुरुडे की लाश उनके गृह जिले में एक रेल्वे ट्रैक पर मिली। एनकाउंटर स्पेशलिस्ट प्रवीन पाटील को बिना इजाजत फिल्म शूटिंग करने के लिए विदेश जाने के लिए सजा मिली। कई और विवादों से घिरे पाटील को भी बर्खास्त किए जाने का फैसला हुआ। अधिकांश एनकाउंटर स्पेशलिस्ट आरोपों से नहीं बच पाए। और ना ही निलंबन से। अब ना अंडरवर्ल्ड की वैसी धमक है ना एनकाउंटर स्पेशलिस्ट की।

लेकिन ‘एनकाउंटर स्पेशलिस्ट’ इमैनुएल अमोलिक की गिरफ्तारी ने लोगों के मन में एक सवाल जरुर खड़ा कर दिया है- क्या ‘मुंबई पुलिस के ब्लू ऑय ब्वॉय’ कहे जाने एनकाउंटर स्पेशलिस्ट अभिशप्त हैं? क्यों आखिर मुंबई पुलिस के इन एनकाउंटर स्पेशलिस्ट में से अधिकांश को अपने कैरियर के शुरुआती दिनों में जितना नाम मिला, उतनी ही अपनी सर्विस के आखिरी दिनों में बदनामी। बकौल एक पूर्व एनकाउंटर स्पेशलिस्ट, वो वक्त उन्हें भी वैसा ही बना देता है, जैसा वो भोगते थे। मुंबई पुलिस के इन एनकाउंटर स्पेशलिस्ट की हालत भी हॉलीवुड फिल्म ‘ब्लड’ के सिल्वस्टर स्टेलोन के किरदार की तरह होती है, जो वियतनाम युध्द में अमेरिकी कमांडो होता है, इंसान से बदतर हालातों में जिंदगी जीता है, लेकिन जब हालात सामान्य होते हैं, तो उन हालातों से खुद को एडजेस्ट नहीं कर पाता। और शुरु होता विवादों का दौर। ऐसे में वहीं समाज, वही मीडिया, वही राजनेता, वही आला अधिकारी, जो कभी इन एनकाउंटर स्पेशलिस्ट को हीरो बनाए रखे थे, उन्हें हाशिए पर ढकेल देते हैं, या फिर देते है नाम, वो भी बदनामी के साथ। देश के जाने-माने मनोचिकित्सक डॉ. यूसुफ माचिसवाला की मानें तो एनकाउंटर स्पेशलिस्ट अधिकारी एक अलग ही मनोस्थिती में पहुंच जाता है। मुंबई पुलिस से लंबे समय से जुड़े डॉ. माचिसवाला ने एनकाउंटर स्पेशलिस्ट अधिकारियों की मनोस्थिती से जुड़ी कई बातों का खुलासा किया। दरअसल एनकाउंटर स्पेशलिस्ट का टैग ही उस पुलिस अधिकारी को अपने साथी अधिकारियों से अलग होने का अहसास दिला देता है। एक बैच के कई सौ पुलिस अधिकारियों में से कुछ ही एनकाउंटर स्पेशलिस्ट टैग पाने में सफल हो पाते है, और ऐसे में उन पुलिस अधिकारियों के मन में ये आना स्वाभाविक होता है कि वो अपने बैच में सबसे बेहतर में से हैं। बकौल डॉ. माचिसवाला दरअसल मुंबई पुलिस के आला अधिकारियों ने उस वक्त युवा अफसरों में से उन्हें चुना जो एग्रेसिव थे, जो डॉयनामिक थे, एनर्जी से भरपूर थे, जिनमें फाइटिंग स्प्रिट थी, जिनमें किलिंग इंस्टेंट था। और जो अपने इन गुणों को, मनोविचारों को लंबे समय तक बनाए रखने में कामयाब होते थे। लेकिन डॉ. माचिसवाला के मुताबिक कुछ ही सालों में एनकाउंटर स्पेशलिस्ट्स के ये खासियत ही उनकी दुश्मन साबित होने लगी। दूसरे एनकाउंटर स्पेशलिस्ट से अपनी गिनती बढ़ाने की कोशिश हो या अपने चीफ से बेहतर रिश्तों को बनाए रखने की जुगत, एनकाउंटर स्पेशलिस्ट सेल की आंतरिक राजनीति हो या मीडिया- मानवाधिकार संगठनों का दबाव, एनकाउंटर स्पेशलिस्ट किसी भी मोर्चे पर हार मानने को तैयार नहीं दिखते थे, और उसी मानसिक दबाव में जीना सीख लेते थे। लेकिन जब अंडरवर्ल्ड का खात्मा होते दिखा, आला अधिकारियों में ऐसे कई अधिकारी आए जो एनकाउंटर स्पेशलिस्ट्स के तौर-तरीकों के पक्षधर नहीं थे, तो ये एनकाउंटर स्पेशलिस्ट्स, उनकी अपनी भाषा में ‘बेकार’ से हो गए। बकौल डॉ. माचिसवाला उन्होंने ऐसे कई केसेस देखे हैं, जिसमें इंसान अपने मौजूदा काम से अलग कोई और दूसरा काम नहीं कर पाता है। उसकी पूरी पर्सनालिटी दरअसल एक ही तरह के स्पेशलिस्ट टास्क के लिए अनुकूल हो जाती है। कुछ ऐसा ही मुंबई पुलिस के एनकाउंटर स्पेशलिस्ट्स के साथ हुआ। जब एनकाउंटर स्पेशलिस्ट प्रदीप शर्मा का ट्रांसफर मुंबई से बाहर किया गया, तो शर्मा ने लंबी छुट्टी ली। कुछ ऐसा ही अरुण बरुडे के साथ हुआ। दोनों ही एनकाउंटर स्पेशलिस्ट थे, और मुंबई के बाहर, महाराष्ट्र के किसी थाने या पुलिस लाइन में बैठकर टेबल वर्क करने में खुद को असहज पा रहे थे। हाल ही में नवी मुंबई के बिल्डर की हत्या मामले में गिरफ्तार रिटायर्ड पुलिस अधिकारी इमैनुअल अमोलिक भी अपने समय में एनकाउंटर स्पेशलिस्ट रहे थे। बिल्डर हत्याकांड में पुलिस थ्योरी की मानें तो बिल्डर सुनील कुमार से रोड पर हुए एक छोटी-सी झड़प के चलते एनकाउंटर स्पेशलिस्ट रहे अमोलिक ने महीनों सारा प्लान तैयार किया और बिल्डर को सजा-ए-मौत दे दी, अपने एनकाउंटर के दिनों की स्टाइल में। पुलिस थ्योरी कितनी सही है या कितनी गलत, ये तो अदालत ही फैसला करेगी, लेकिन हम-आप कल्पना कर सकते हैं, कि एक एनकाउंटर स्पेशलिस्ट, जिससे कभी अंडरवर्ल्ड गैंगस्टर कांपते थे, रिटायरमेंट के बाद आम जिंदगी जीने लगता है, और महसूस करता है उस पॉवर, उस सम्मान, उस रुतबे का जाना, जो उसे एक एनकाउंटर स्पेशलिस्ट के तौर पर मिलता था। एनकाउंटर स्पेशलिस्ट इमैनुएल अमोलिक हो या दया नायक, प्रदीप शर्मा हो या अरुण बरुडे, मुंबई पुलिस के वो ब्ल्यू आई ब्वायज़ अब नितांत अकेले होते दिखते हैं, मीडिया की चमक से दूर, आला अधिकारियों की शाबासियों से दूर, खुद से लड़ते हुए।

एक भारतीय।

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पाठकों की राय | 20 Feb 2013

Feb 20, 2013

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मान गये आपको. पहली बार किसी मीडीया ने इतने सारे एनकाउंटर स्पेसिलाइस्ट्स के नाम दिए है. बहुत बाड़िया हिन्दी इन डॉट कॉम

sachin patil ghatkoper, mumbai

Feb 20, 2013

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