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गडकरी का ड्राइवर 6 कंपनियों का डायरेक्‍टर !

Updated Oct 23, 2012 at 16:25 pm IST |

 

23 अक्‍टूबर 2012
आईबीएन 7

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नई दिल्ली
। किसानों की जमीन हथियाने के आरोपों से घिरे बीजेपी अध्यक्ष नितिन गडकरी अब एक और विवाद से घिर गए हैं। खुलासा हुआ है कि उनकी कंपनी को घाटे से उबारने के लिए एक कंपनी ने 164 करोड़ रुपये का लोन दिया। ये वही कंपनी है जिसे महाराष्ट्र में तमाम कामों का ठेका मिला था जब गडकरी वहां के लोकनिर्माण मंत्री थे। यही नहीं, लोन में दिए गए पैसे का स्रोत भी साफ नहीं है। अंग्रेजी अखबार ने अपनी पड़ताल में खुलासा किया है कि 16 अन्य कंपनियों के एक समूह के गडकरी की कंपनी में शेयर हैं इन 16 कंपनियों के शुरुआती डायरेक्टर गडकरी के लोग मसलन उनका ड्राइवर जिसका नाम मनोहर पानसे, गडकरी का एकाउंटेंट पांडुरंग झेडे, उनके बेटे का दोस्त श्रीपाद कोतवाली वाले और निशांत विजय अग्निहोत्री नाम का एक शख्स थे। अकेले उनका ड्राइवर 6 कंपनियों का डायरेक्‍टर बना। 

पिछले दिनों आरोप लगा कि गडकरी ने महाराष्ट्र में सरकार से मिलीभगत करके किसानों की सौ एकड़ जमीन हड़प ली। इस आरोप पर मचे हंगामे की धूल अभी बैठी भी नहीं थी कि नया खुलासा हो गया है। एक ऐसा खुलासा जो सोशल इंटरप्रेन्योर होने यानी समाज के हित में कारोबार करने के गडकरी के दावे पर सवाल खड़ा करता है। ताजा जानकारी के मुताबिक गडकरी के नियंत्रण वाली पूर्ति पावर एंड शुगर लिमिटेड 64 करोड़ रुपये के घाटे में थी। 30 मार्च 2010 को आइडियल रोड बिल्डर्स यानी आईआरबी ग्रुप की फर्म ग्लोबल सेफ्टी विजन ने उसे 164 करोड़ रुपये का लोन दिया। आईआरबी ग्रुप को 1995 से 1999 के बीच महाराष्ट्र में तमाम सरकारी ठेके मिले थे। तब गडकरी ही लोक निर्माण मंत्री थे। आरबीआई ने पूर्ति पावर एंड शुगर लिमिटेड के तमाम शेयर भी खरीदे। यानी मसला वही सत्ता से पैसा और पैसे से सत्ता का लगता है।

गडकरी महाराष्ट्र के लोक निर्माण मंत्री थे तो आईआरबी को फायदा हुआ और जब गडकरी बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष हुए तो उनकी घाटे की कंपनी को उबारने के लिए वही आईआरबी सामने आ गई। सवाल गंभीर हैं। लेकिन गडकरी ने दावा किया है कि वे जांच के लिए तैयार हैं। वे ये भी कह रहे हैं कि वे 14 महीने पहले कंपनी के चेयरमैन के पद से इस्तीफा दे चुके हैं। उनके पास अब कंपनी के केवल 310 शेयर हैं जिनकी कीमत 3100 रुपये है। लेकिन बीजेपी जानती है कि तथ्य के मकड़जाल ने गडकरी को उलझा दिया है। फिर भी दावा है कि वो बैकफुट पर नहीं है, क्योंकि उसकी नजर में बीजेपी की कमीज कांग्रेस से अभी भी ज्यादा उजली है।

उधर कांग्रेस हम तो डूबेंगे सनम, तुमको भी ले डूबेंगे वाले अंदाज में खुशी मना रही है। हालांकि पार्टी नेताओं के पास इसका जवाब नहीं कि महाराष्ट्र में उनकी सरकार है तो जांच के लिए किस बात का इंतजार है। पार्टी प्रवक्ता संदीप दीक्षित कहते हैं कि जांच की एक प्रक्रिया होती है और जांच एजेंसी प्रोफेशनल तरीके से काम करती है। कांग्रेस की इस हीलाहवाली को टीम केजरीवाल सत्तापक्ष और विपक्ष की मिलीभगत का एक और सुबूत मानती है। अरविंद केजरीवाल ने कहा कि हम देश के सामने जो बात साबित करना चाहते थे वो साबित हो गई है। दोनों पार्टियां भ्रष्टाचार के मामले पर मिली हुई हैं। दोनों एक-दूसरे को बचा रही हैं। इस बीच आईआरबी ने एक बयान जारी करके दावा किया है कि उसका पूर्ति ग्रुप से कोई करीबी रिश्ता नहीं है। कंपनी ने ये भी दावा किया है कि ग्लोबल सेफ्टी विजन, आईआरबी की सहायक कंपनी नहीं है। न ही आईआरबी ने इस कंपनी में कोई निवेश ही किया है।

बहरहाल, पूर्ति पावर एंड शुगर लिमिटेड के एमडी सुधीर दिवे ने माना है कि पूर्ति को 64 करोड़ का नुकसान हुआ था और आईआरबी के प्रमोटर डीपी महिस्कर ने उन्हें 164 करोड़ रुपये का लोन ग्लोबल सेफ्टी विजन के जरिए दिलाया था। पूर्ति ने 62 करोड़ रुपये ब्याज समेत लौटा भी दिए। उनके मुताबिक इस लेन-देन में सबकुछ नियम-कायदे के हिसाब से हुआ। लेकिन तहसीलदार से मंत्री गडकरी के निजी सचिव और फिर उनसे जुड़ी कंपनी के एमडी तक का सफर तय करने वाले सुधीर दिवे की सफाई के बाद भी तमाम सवाल मुंह बाए खड़े हैं।

सवाल ये कि पूर्ति ग्रुप को आईआरबी या ग्लोबल सेफ्टी विजन ने लोन किस मद से दिया। यानी पैसे का स्रोत क्या है? 2009 के रिकॉर्ड बताते हैं कि पूर्ति में निवेश करने वाली 16 कंपनियों में चार ही लोग घूम-घुमाकर डायरेक्टर के पद पर हैं। नितिन गडकरी के बेटे निखिल को 22 फरवरी 2011 को पूर्ति का एमडी बनाया गया था। ऐसे में ये कहना कहां तक ठीक है कि गडकरी का कंपनी से रिश्ता नाममात्र का है।

जाहिर है, अलग तरह की पार्टी होने का दावा करने वाली बीजेपी की साख सवालों के घेरे में है। नितिन गडकरी आरएसएस के दुलारे माने जाते हैं। जब राजनीति के किसी पूर्णकालिक कार्यकर्ता की जगह कारोबारी दिमाग के लिए मशहूर गडकरी को बीजेपी का अध्यक्ष बनाया गया था, तो आरएसएस की वजह से ही ज्यादा सवाल नहीं उठ पाए थे। ऐसे में साख पर सवाल का सिलसिला बीजेपी से होते हुए नागपुर के आरएसएस मुख्यालय तक भी पहुंच जाए, तो आश्चर्य नहीं।

 

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