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आजादी@65: अपने बच्‍चे को बताएंगे ‘तिरंगे’ की पूरी कहानी

Updated Aug 14, 2012 at 12:56 pm IST |

 

14 अगस्‍त 2012
 रवि अत्रोलिया

 

 

भारत के 65वें स्वंतत्रता दिवस से जुड़ी सारी खबरों के लिए यहां क्लिक करें

प्यारे भारतवासियों,


मैं आपका अपना ‘राष्ट्रीयध्वज’ बोल रहा हूं। मेरे बारे में आपको संपूर्ण जानकारी नहीं दी गई। क्यों  नहीं दी गई? कौन जिम्मेदार है? यह प्रश्न यहां आचित्यहीन है। अत: मैं स्वयं आपके सामने आया हूं। अपने बारे में आप सभी को बताने के लिए गुलामी की काली स्याह रात अंतिम प्रहर जब स्वतंत्रता के सूर्य के निकलने कासंकेत प्रभातबेला ने दिया, उस दिन 22 जुलाई 1947 को भारत की संविधान के सभा कक्ष में पंडित जवाहरलाल नेहरू ने मुझे विश्व एवं भारत के नागरिकों के सामने प्रस्तुत किया। यह मेरा जन्म पल था।

मुझे भारत का राष्ट्रीयध्वज स्वीकार कर सम्मान दिया। इस अवसर पर पंडित नेहरू ने बड़ा मार्मिक हृदयस्पर्शी भाषण भी दिया तथा मानवीय सदस्यों के समक्ष मेरे दो स्वरूप एक रेशमी खादी एवं दूसरा सूती खादी से बना ध्वज प्रस्तूत किया। सभी ने कर्तल ध्वनि के साथ मुझे स्वतंत्र भारत के राष्ट्रीय ध्वज के रूप में स्वीकार किया। आजादी के दीवानों के बलिदान व त्याग की लालीमा मेरे रंगों में बसी है। इन्हीं दीवानों के कारण मेरा जन्म संभव हुआ।

14 अगस्त 1947 की रात 10.45 बजे काउंसिल हाऊस के सेंट्रल हॉल में श्रीमति सुचेता कुपलानी के नेतृत्व में वंदे मातरम् के गायन से कार्यक्रम शुरू हुआ। संविधान सभा के अध्यक्ष डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद व पंडित जवाहरलाल नेहरू के भाषण हुए। इस पश्चात श्रीमति हंसाबेन मेहता द्वारा अध्यक्ष मेरा सील्क वाला स्वरूप सौंपा गया।

श्रीमति हंसाबेन मेहता ने कहा कि- "आजाद भारत में पहला राष्ट्रध्वज जो इस सदन में फहराया जाएगा, वह भारतीय महिलाओं की ओर से इस राष्ट्र को एक उपहार है।" सभी लोगों के समक्ष यह मेरा पहला प्रदर्शन था। सारे जहां से अच्छा व जन-गण-मन के सामूहिक गाने के साथ यह समारोह सम्पन्न हुआ। 23 जून 1947 को मुझे आकार देने के लिए एक अस्थाई समिति का गठन हुआ था। इसके अध्यक्ष राजेंद्रप्रसाद तथा समिति में उनके साथ थे अब्दूल कलाम आजाद, के.एम.पाणीकर, श्रीमति सरोजिनी नायडू, के.एस.मुंशी, श्री राजगोपालाचारी और डॉ.बी.आर.अम्बेडकर। विस्तुत विचार-विमर्श के बाद मेरे बारे में निर्णय लिया गया और संविधान सभा में स्वीकृति प्राप्ती हेतु पंडित जवाहरलाल नेहरू को अधिकृत किया, जिन्होंने 22 जुलाई 1947 को सभी की स्वीकृति प्राप्त की और मेरा जन्म हुआ।

पंडित जवाहरलाल नेहरू ने मेरे मान बताए, जिन्हें आपको जानना जरूरी है (जिसका उल्लेख भारतीय मानक संस्थान के क्रमांक आई.एस.आई.1-1951 संशोधन 1968 में किया गया) उन्होंने कहा कि भारत का राष्ट्रध्वज समतल तिरंगा होगा एवम आयातकार होकर इसकी लंबाई-चौड़ाई का अनुपात 2:3 होगा। तीन समान रंगों की आड़ी पट्टीका होगी। सबसे ऊपर केशरिया, मध्य में सफेद तथा नीचे हरे रंग की पट्टी होगी। सफेद रंग की पट्टी पर मध्य में सारनाथ स्थित अशोक स्तंभ का 24 सलाकाओं वाला चक्र होगा, जिसका व्यास सफेद रंग की पट्टी की चौड़ाई के बराबर होगा।

मेरे (राष्ट्रध्वज) के निर्माण में जो वस्त्र उपयोग में लाया जाएगा, वह खादी का होगा तथा यह सूती, ऊनी या रेशमी भी हो सकता है, लेकिन शर्त यह होगी कि राष्ट्रध्वज का सूत हाथ से काता जाएगा एवं हाथ से बुना जाएगा। इसमें हथकरधा सम्मिलित है। सिलाई के लिए केवल खादी के धागों का ही प्रयोग होगा। आपको बताऊं मेरे कपड़े का निर्माण स्वतंत्रता संग्राम सेनानी के एक समूह द्वारा पूरे देश में एकमात्र उत्तरी कर्नाटक जिला धारावाड़ के गरग नामक गांव जो बंगलौर-पूना रोड पर स्थित है, वहां किया जाता है।

इसकी स्थापना 1954 में हुई। नियमानुसार राष्ट्रीय ध्वज के खादी के एक वर्ग फिट कपड़े का वजन 205 ग्राम होना चाहिए, हाथ से बनी खादी, जिसका प्रयोग राष्ट्रध्वज के निर्माण के लिए होता है, वह यहीं केंद्र है। परंतु अब राष्ट्र ध्वज का निर्माण क्रमश: अर्डिनेस क्योरिंग की फैक्टरी शाजापुर, खादी ग्रामोद्योगआयोग बंबई एवं खादी ग्रामोद्योग दिल्ली में होने लगा है। निजी निर्माताओं द्वारा भी राष्ट्रध्वज निर्माण पर कोई प्रतिबंध नहीं है, लेकिन राष्ट्रीयध्वज के गौरव और गरिमा को दृष्टीगत रखते हुए यह जरूरी है कि केवल आई एस आई (भारतीय मानक संस्थान) की मोहर लगी हो।

मेरे (राष्ट्रीय ध्वज) के रंगों का अर्थ स्पष्ट किया कि केशरिया रंग-साहस और बलिदान का, सफेद रंग-सत्य एवं शांति का, हरा रंग-श्रद्धा और शौर्य का प्रतीक होगा तथा 24 सलाकों वाला नीला चक्र 24 घंटे सत्त प्रगति और प्रगति भी ऐसी जैसे कि नीला अनंत विशाल आकाश एवं नीला अथाह गहरा सागर। आपको लगता है कि आप भी अपने घरों व दुकानों पर राष्ट्रध्वज वर्षभर फहराए, लेकिन जब तक मेरे मान-सम्मान सहित फहराने का ज्ञान प्रत्येक नागरिक को न हो जाए, तब तक आपको यह छूट कैसे दी जाए? अब आपको वैद्यानिक रूप से 365 दिन (वर्षभर) ससम्मान ध्वजारोहण सूर्योदय के समय करके, सूर्यास्त के समय ससम्मान उतार सकते हैं, लेकिन मोटरकारों पर साधारण नागरिक को राष्ट्रीयध्वज फहराने पर प्रतिबंध है।

राष्ट्रीय पर्व की तिथियां
1. 26 जनवरी से लेकर 29 जनवरी तक (बीटिंग रिट्रिट कार्यक्रम होने तक)
2. 6 अप्रैल से 13 अप्रैल तक (राष्ट्रीय सप्ताह में जो जलियावाला बाग के शहीदों की स्मृति में बनाया जाता है।)
3. 15 अगस्त (स्वतंत्रता दिवस)
4. 2 अक्टूबर (महात्मा गांधी जयंती)
5. भारत सरकार द्वारा निर्धारित राष्ट्रीय उल्लास का अन्य कोई दिन।
अ. किसी भी राज्य में उस राज्य की गठन की जयंती पर (जैसे म. प्र. का गठन 1नवंबर को हुआ)
ब. भारत सरकार किसी क्षेत्र में स्थानीय समारोह के उपलक्ष्य में किसी विशिष्ठ दिन राष्ट्रीय ध्वज प्रतिबंध रहित रूप से फहराने का अधिकार प्रदान करती है।

जब कोई राष्ट्र विभूति, महान व्यक्ति, राष्ट्र अध्यक्ष आदि का निधन होता है, तह उन्हें सम्मान देने के लिए शोक घोषित किया जाता है। इस दौरान मुझे (राष्ट्रध्वज) को शोक स्वरूप झुका दिया जाता है। झुका देने का आशय झुका देना नहीं, अपितु ध्वज दंड के मध्य फहराने की स्थिति को ध्वज झुकना माना जाता है। यदि राष्ट्रध्वज ले जाते हुए परेड या जुलूस के रूप में शोक मनाया जा रहा हो तो भाले के अग्रभाग में काले कपड़े (क्रेप) की पट्टी लगा दी जाएगी, जो स्वाभाविक रूप से लटकी रहेगी। ऐसे प्रयोग शासन देश पर ही होगा।

विशेष परिस्थिति:
राष्ट्रीय उल्लास के पर्वों पर अर्थात 26 जनवरी एवं 15 अगस्त के अवसर पर किसी राष्ट्र विभूति का निधन होता है तथा राष्ट्रीय शोक घोषित किया जाकर मुझे (राष्ट्रध्वज) झुका दिया जाना चाहिए, लेकिन मेरे भारतवासियों द्वारा इस दिन सभी जगहों पर कार्यक्रम एवं ध्वजारोहण सामान्य रूप से किया जाएगा। जिस भवन में उस राष्ट्र विभूति का पार्थिव शरीर रखा गया हो, उस भवन का ध्वज  झुका रहेगा। जैसे ही उस भवन से उसके पार्थिव शरीर को अंत्योष्टि के लिए बाहर निकालते है। वैसे ही उस भवन पर मुझे (राष्ट्रध्वज) पूरी ऊंचाई पर फहरा दिया जाएगा।

शवों पर लपेटना: राष्ट्र पर प्राण न्यौछावर करने वाले फौजी-रणबांकुरों के शवों पर एवं राष्ट्र की महान विभूतियों के शवों पर भी मुझे (राष्ट्रध्वज) उनकी शहादत को सम्मान देने के लिए लपेटा जाता है। तब मेरी केशरिया पट्टी सर तरफ एवं हरि पट्टी जांग की तरफ होना चाहिए। नाकी सीर से लेकर पैर तक सफेद पट्टी चक्र सहीत आए और केशरिया व हरि पट्टी दाएं-बाएं हो। याद रहे शहीद या विशिष्ठ व्यक्ति के शव के साथ मुझे जलाया या दफनाया नहीं जाए, बल्कि मूख अग्नि क्रिया से पूर्व या कब्र में शरीर रखने सेपूर्व मुझे हटा लिया जाए।

नष्टीकरण: अमानक, बदरंग, कटी-फटी स्थिति वाला मेरा स्वरूप फहराने के योग्य नहीं होता। ऐसा करना मेरा अपमान होकर अपराध है। अत: वक्त की मार से जब कभी मेरी ऐसी स्थिति हो जाए तो मुझे गोपनीय तरिके से सम्मान के साथ अग्नि प्रवेश दिला दे या वजन बांधकर पवित्र नदी में जल समाधि दे दें। इसी प्रकार पार्थिव शरीर पर से उतारे गए ध्वजों के साथ भी करें।

मेरा अपमान: मुझे पानी सतह पर स्पर्श कराना, भूमि पर गिराना,फाडऩा-जलाना, मुझ पर लिखना तथा मेरा व्यवसायिक उद्देश्य से उपभोक्ता वस्तु पर प्रयोग अपराध होता है। मुझे अकारण झुकाना भी मेरा अपमान कहलाता है।

शोक का प्रभाव क्षेत्र :-

क्र.    विभूति                                      क्षेत्र

अ  राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति एवं प्रधानमंत्री                   सारे भारत में
ब  लोकसभा अध्यक्ष एवं भारत के मुख्य न्यायाधिपति        दिल्ली में
स केंद्र मंत्री मंडल स्तर के मंत्री                          केवल दिल्ली व राज्य की राजधानी में
द केंद्रीय राज्य मंत्री व उप मंत्री                          दिल्ली में
इ किसी राज्य मंत्री मंडलीय स्तर का मंत्री                  संबंधित राज्य की राजधानी में  
                                    
मानक ध्वज का प्रकार और माप

क्र.  मिली मिटर में माप      फूट व इंच में माप       कहां प्रयोग होते है

1. 6300 x 4200   21 x 14फूट      जिन भवनों पर बहुत लंबे ध्वज दंड लगे हो
2. 3600  x 2400  12 x 08 फूट    लाल किला, राष्ट्रपति भवन, तोपखाने की गाड़ी पर

3.2700  x 1800   09 x 06 फूट    मध्य आकार के भवनों में

4.1800  x 1200   06 x  04 फुट   शवों एवं छोटे आकार के भवनों पर
 
5.1350  x  900   4.5 x  03 फूट  छोटे भवनों पर

6.900  x  600    03  x  02 फूट   विशिष्ठ अधिकारी के कक्ष में क्रांस बार पर लगाकर

7.450  x  300    18  x   12 इंच   अतिविशिष्ठ व्यक्तियों, विमान एवं रेल पर

8. 225  x   150  09   x  06 इंच    अतिविशिष्ठ व्यक्तियों की मोटर कार पर इन्हें दो पत्तों में बनाया जाताहै

9. 150  x   100  06  x   04 इंच   राज्य के सम्मेलनों व वार्ताओ के दोरान मेज पर रखने के लिए
(यह ध्वज केवल रेशमी खादी से बनाए जाते है।)

          
ऐतिहसिक ‘राष्ट्रध्वज’ कहा है ?

प्यारे भारतवासियों, आपको ऐसी बात बताने जा रहा हूं, जिससे मैं तो व्यथित हूं ही, आपको भी यह बात हृदयाघाती होगी। आपको मैंने बताया था कि 22 जुलाई 1947 को पंडित जवाहरलाल नेहरू ने संविधान सभा में मेरे दो स्वरूप क्रमश: सूती खादी एव सिल्क को लेकर गए थे तथा मुझे अंगीकार किया था और 14 अगस्त 1947 को रात्रि में श्रीमति हंसाबेन मेहता ने मुझे फहरानेहेतु तत्कालीन अध्यक्ष डॉ. राजेंद्रप्रसाद को सौंपा था। वही सिल्क का ध्वज 16 अगस्त 1947 को सुबह 8.30 बजे लाल किले से भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू द्वारा ध्वजारोहण किया गया था। इस मायने से मेरा वह स्वरूप ऐतिहासिक बन गया था, जिससे हर भारतवासी स्मरण स्वरूप बार-बार देखने की कामना रखते होंगे, लेकिन अफसोस कि तत्कालीनभारतवासी मेरे स्वरूप को कहीं रखकर भूल गए हैं। स्थिति यहां पहुंच गई किमेरा वह स्वरूप (ऐतिहासिक राष्ट्रध्वज) कहां है? यह न तो किसी को पता और न ही मुझे खोजने में तत्परता या रूचि दिखाई जा रही  है।

अत: मेरी आपसे प्रार्थना है कि 16 अगस्त 1947 को लाल किले पर फहराए राष्ट्रध्वज को खोजे व मेरे नौनिहालों को दिखाए, ताकि वे मेरे स्वरूप व गौरव से परिचित हो सके। मेरी आन-बान को बनाए रखने के लिए अपने प्रणों को न्यौछावर करने सेभी न चूकें।

आप सभी स्वाभिमान
प्यारा तिरंगा (राष्ट्रध्वज)

(लेखक रवि अत्रोलिया इंदौर के डीएसपी है और पिछले 3 दशकों से स्‍कूलों में जाकर बच्‍चों को तिरंगे के बारे में बताते हैं लोग इन्‍हें भारतीय राष्ट्रध्‍वज का चलता-फिरता तिरंगा का एनसाइक्लोपिडिया कहते हैं।)

 

यह खबर आपको कैसी लगी

10 में से 4 वोट मिले

पाठकों की राय | 14 Aug 2012

Aug 15, 2012

पढ़ने के बाद बहुत कुछ नया सीखने को मिला धयन्बद.....

Manish Kumar Agra

Aug 14, 2012

बहुत शिक्षाप्रद लेख है ! संग्रहनीय है !धन्यवाद !

santosh tiwari khandwa


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