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क्या विवाद उठने के बाद ही खिलाड़ी को मिलेंगे अवॉर्ड?

Updated Jan 29, 2013 at 14:59 pm IST |

 

29 जनवरी 2013
वार्ता

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नई दिल्ली। देश के तीसरे सर्वोच्च नागरिक पुरस्कार पद्म भूषण के लिए इतिहास रचने वाले पहलवान सुशील कुमार की अनदेखी से यह सवाल फिर से उठ खड़ा हुआ है कि क्या विवाद उठने के बाद ही किसी खिलाड़ी को पुरस्कार मिल पाएगा। बीजिंग (2008) और लंदन (2012) ओलंपिक मे लगातार दो पदक जीतकर इतिहास बनाने वाले पहले भारतीय खिलाड़ी सुशील कोई पहले ऐसे खिलाड़ी नहीं है जिनके साथ ऐसा हुआ है। इससे पहले महिला निशानेबाज अंजलि भागवत, महिला मुक्केबाज एम सी मैरीकोम और निशानेबाज गगन नारंग के साथ ही ऐसा हुआ था और उनके विरोध व्यक्त करने के बाद ही उन्हे देश के र्सवोच्च ‘राजीव गांधी खेल पुरस्कार’ से नवाजा गया था।

ध्यानचंद को नहीं समझा ‘भारत रत्न’ के योग्य

हॉकी के जादूगर मेजर ध्यानचंद को अब तक देश के सर्वोच्च सम्मान ‘भारत रत्न’ के योग्य नहीं समझा गया है। हालांकि गृह मंत्रालय ने इस पुरस्कार में खिलाड़ियों को शामिल करने के लिए नियमों में परिवर्तन किए है लेकिन लगातार दूसरे साल ध्यानचंद की अपेक्षा हुई। ध्यानचंद की स्टिक के जादू का पूरी दुनिया ने लोहा माना लेकिन उन्हीं के देश में उन्हे ‘भारत रत्न’ देने के लिए कोई तैयार नहीं है। क्या ध्यानचंद का भारतीय खेलों मे योगदान अन्य क्षेत्रों से ‘भारत रत्न’ पाने वाले लोगों से कम है। यह एक यक्ष प्रश्न है।

सुशील की उपेक्षा दिल तोड़ने वाली

सुशील की पद्म भूषण के लिए उपेक्षा इस चैंपियन पहलवान का दिल तोड़ देने वाली है। देश को लगातार दो ओलंपिक पदक (कांस्य और रजत) देने वाले पहलवान को यदि यह कहना पड़े कि उसे और क्या करके दिखाना होगा तो यह वाकई हृदयविदारक स्थिति है। पुरस्कारों का चयन करने वालो के लिए यह समझ पाना बहुत मुश्किल है कि एक खिलाड़ी को ओलंपिक पदक के लिए चार साल कितना पसीना बहाना पड़ता है।

नारंग ने दी थी बहिष्कार की धमकी

दिल्ली राष्ट्रमंडल खेलों में चार स्वर्ण पदक जीतने वाले निशानेबाज गगन नारंग ने ‘खेल रत्न’ के लिए अपनी उपेक्षा पर यह तक धमकी दे डाली थी कि वह राष्ट्रमंडल खेलों का बहिष्कार कर देंगे। नारंग ने उस समय यह धमकी देते हुए कहा था कि वह आखिर अपने अंदर प्रेरणा कहां से लाएं। किसी खिलाड़ी के मन से निकली यह स्वाभाविक पीडा थी। नारंग ने फिर अपना निर्णय बदलते हुए खेलों में हिस्सा लिया और फिर अगले साल उन्हे खेल रत्न प्रदान किया गया। नारंग जैसी स्थिति महिला मुक्केबाज मैरीकोम की भी हो गई थी।

मैरीकोम भी हुई उपेक्षा की शिकार

मैरीकोम ने 2008 मे जब चौथी बार विश्व खिताब जीता तब भी उनकी ‘खेल रत्न’ के लिए उपेक्षा हो गई। इससे आहत मैरीकोम को कहना पड़ा कि खेल रत्न बनने के लिए आखिर उन्हें कितने विश्व खिताब जीतने पड़ेंगे। तत्कालीन खेल मंत्री एम.एस गिल ने मैरी को न्याय दिलाने का आश्वासन दिया। मैरी को अगले साल ओलंपिक पदक विजेताओं पहलवान सुशील और मुक्केबाज विजेंद्र सिंह के साथ संयुक्त रूप से ‘खेल रत्न’ पुरस्कार दिया गया। मैरीकोम के विवाद के समय यह बात भी उठ गई थी कि खेल रत्न के लिए मैरी का नाम है। तब सुशील और विजेन्द्र को भी कहना पडा था कि उनके लिए फिर ओलंपिक पदक जीतने का क्या फायदा। इस विवाद को निपटाते हुए सरकार ने फिर तीनो खिलाडियो को संयुक्त रूप से खेल रत्न दिया।

अंजलि ने की थी अर्जुन अवॉर्ड समिति की आलोचना

महिला निशानेबाज अंजलि भागवत ने 2003 में अर्जुन अवॉर्ड समिति की आलोचना कर डाली थी जिसने एथलीट के एम बीनामोल को ‘खेल रत्न’ के लिए चुना था। अंजलि ने तब कहा था कि 2002 में मैं नंबर एक निशानेबाज थी। राष्ट्रमंडल खेलों में मैंने चार स्वर्ण जीते। विश्व कप और एशियाई खेलों में मैंने रजत जीते। आखिर मैं और क्या करूं। अंजलि के मामले में उठे विवाद के बाद बीनामोल और अंजलि को संयुक्त रूप से खेल रत्न दिया गया।

फोटो खिंचवाने में अधिकारी आगे

लंदन ओलंपिक के बाद तमाम सम्मान समारोह में बड़े अधिकारी सुशील के साथ फोटो खिंचवाने पर गर्व महसूस करते थे। लेकिन कामयाबी का पुरस्कार सही समय पर नहीं मिले तो खिलाड़ी के अंदर प्रेरणा कहां से पैदा होगी। ऐसा लगता है कि पुरस्कारों और विवादों का एक नजदीकी रिश्ता बन गया है। यानी जब तक विवाद नहीं खड़े होंगे, पुरस्कार नहीं मिलेगा।

 

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पाठकों की राय | 29 Jan 2013

Jan 29, 2013

हमारेनेताकिरकेट . अलावा किसी खेल को खेल नही मानते ! . तो किशी ओरखिलाड़ी को .

sushila rohtak


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