

नोएडा। गौरव बख्शी नोएडा के एक रजिस्ट्री ऑफिस में हो रहे भ्रष्टाचार का सच सामने लाने के लिए सिटिज़न जर्नलिस्ट बने। गौरव के संघर्ष की शुरुआत तब हुई जब उन्होंने अपनी गोद ली बेटी के पिता के तौर पर अपना नाम रजिस्ट्रार के दफ्तर में दर्ज कराना चाहा। सब रजिस्ट्रार ने उनसे रिश्वत की मांग की। गौरव बख्शी ने रिश्वत देने से इनकार कर दिया और इस भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज उठाने का फैसला किया।
गौरव अपने पिता के साथ उन कर्मचारियों के पास गए जिन्होंने रिश्वत की मांग की थी और बातचीत को कैमरे पर रिकॉर्ड कर लिया। जब उन्होंने ये वीडियो अधिकारियों को दिखाकर अपनी शिकायत दर्ज कराई तो उनके और उनके पिता के साथ मारपीट की गई।

बाड़मेर। राजस्थान के एक आम मजदूर ने भ्रष्टाचार के खिलाफ़ आवाज क्या उठाई, भ्रष्टाचारियों के पैरों तले से जैसे जमीन ही खिसक गई। गुनहगारों ने मंगलाराम की टांगें तुड़वा दीं, लेकिन उनका हौसला आज भी बुलंद है।
मंगलाराम ने RTI के जरिए ये जानाकारी मांगी कि सरकार ने उनके गांव में 8 साल में क्या विकास कार्य किए हैं। जब RTI का कोई जवाब नहीं आया, तो उन्होंने सूचना आयुक्त का दरवाजा खटखटाया। साथ ही उन्होंने मनरेगा में हो रही गड़बड़ियों के खिलाफ भी शिकायत दर्ज कराई।

ईटानगर। पाई ग्याडी के संघर्ष की शुरुआत हुई 2007 में, जब अरुणाचल प्रदेश के स्वास्थ्य मंत्री के बेटे अकुंग वैली की नियुक्ति इंस्पेक्टर टैक्स एंड एक्साइज के पद पर हुई। उन्होंने गुवाहाटी यूनिवर्सिटी के प्रगज्योतिष कॉलेज का ग्रेजुएशन सर्टिफिकेट जमा किया।
तीन साल बाद, जब अतुम कल्चरल मिनिस्टर बने, तो उनकी बेटी अनुंग को सोशल और कल्चरल ऑर्गनाइजर बनाया गया। अपने भाई की तरह ही अनुंग ने भी ग्रैजुएशन डिग्री जमा कर दी, जो उनका कहना था कि गुवाहाटी यूनिवर्सिटी के बेलटोला कॉलेज की है।

पुंछ। अयाज मुगल पुंछ के मराह गांव में रहते हैं। ये इलाका आतंकवाद से काफी वक्त तक प्रभावित रहा है। 1993 में सरकार ने यहां डिस्पेंसरी खोलना स्वीकृत किया था लेकिन 18 साल बीतने के बाद भी गांव के लोगों को डिस्पेंसरी का इंतजार हैं।
2010 में अयाज ने मुख्यमंत्री से इस देरी को लेकर शिकायत की। वहां से बताया गया कि ब्लॉक डेवेलपमेंट अधिकारियों को डिस्पेंसरी बनाने के लिए 1999 में 10 लाख रुपए दिए गए हैं। यानि पैसा एलॉट हुए 10 साल से ज्यादा वक्त गुजर चुका है लेकिन यहां कुछ नहीं हुआ है।

नई दिल्ली। सिटिजन जर्नलिस्ट बनी शेफाली सेवक पेशे से वकील हैं। इन्होंने लड़ाई लड़ी अपने ऑफिस के करीब बने एक नामी होटल के खिलाफ जिसने सार्वजनिक पार्किंग स्थल को अपने कब्जे में ले लिया था।
2008 में जब शेरेटन होटल ने अपनी चारदीवारी के आसपास घेराबंदी की तो शेफाली ने कुछ फोटो खींची। इसमें दिखाया गया कि कैसे पार्किंग बोर्ड लगाकर अवरोध खड़े कर दिये गए। इतना ही नहीं होटल प्रबंधन ने यहां पर एक गार्ड भी रख दिया जो आम लोगों को होटल की दीवार के साथ लगने वाली पार्किंग पर रोकने का काम करता था।

मुंबई। प्रदीप भाटिया ने मुंबई के मीरा रोड पर एक चाय की दुकान में अवैध शराब की बिक्री का पर्दाफाश किया था। चौंकाने वाली बात ये थी कि ये चाय की दुकान कश्मीरा पुलिस थाने के बहुत नजदीक थी और स्वतंत्रता दिवस के दिन भी यहां अवैध बिक्री चल रही थी। प्रदीप ने जगह के फोटो लिए और पुलिस थाने में शिकायत दर्ज कराई। ये FIR सरोज टी स्टाल के खिलाफ थी। इसके बाद सीजे टीम के साथ प्रदीप ये जानने पहुंचे कि उनकी शिकायत पर कोई कार्रवाई हुई भी है कि नहीं।
FIR करने के तीन दिन बाद भी शराब भी बिक्री दिन दहाड़े चल रही थी। पुलिस के इस ढुलमुल रवैये से तंग आकर उन्होंने खुद ही टी स्टाल मालिक से जवाब तलब किया। इसके बाद वो सीनियर इन्सपेक्टर अनिल पाटिल से मिले जिन्होंने वादा किया कि टी स्टाल के खिलाफ़ कार्रवाई होगी।

बैंगलोर। अपने हक़ की लड़ाई लड़ने के लिए परीक्षित दलाल सिटिजन जर्नलिस्ट बने। उनका आरोप है कि बैंगलोर के एक अस्पताल की लापरवाही की वजह से उनकी पत्नी कपाली और अजन्मे बच्चे की मौत हुई। 16 अप्रैल 2010 को कपाली को सिजेरियन ऑपरेशन के लिए ऑपरेशन थिएटर ले जाया गया। साढ़े 10 बजे डॉक्टर बाहर आए और उन्होंने कहा कि उसे एनेसथिसीया से रिएक्शन हो गया है और 12 बजकर 20 मिनट पर उसकी मौत का एलान कर दिया गया। वो परीक्षित के बच्चे को भी नहीं बचा सके।
इस हकीकत को बर्दाश्त कर पाना परीक्षित के लिए लिए मुश्किल था, लेकिन अस्पताल के रवैये से उन्हें गड़बड़ी का अंदेशा होने लगा। तब उन्होंने FIR दर्ज कराई और अलगी ही सुबह शव को पोस्टमॉर्टम कराया। पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट ने परीक्षित हिला दिया। रिपोर्ट में लिखा था कि उसकी मौत शॉक और हेमेरेज की वजह से हुई। जबकि अस्पताल का दावा था कि उसकी मौत एनेस्थीसिया की वजह से हुई है।
परीक्षित ने तय कर लिया कि वो दोषियों को सज़ा दिलाएंगे और इसलिए उन्होंने अस्पताल के खिलाफ केस कर दिया। अगस्त 2010 में ये केस CID को सौंप दिया गया, जिसने मेडिकल स्टाफ के खिलाफ चार्जशीट बनाई। लेकिन इसके बावजूद KMC ने डॉक्टरों को सस्पेंड करने से इनकार कर दिया।

पटना। सरकार गरीबों के लिए तमाम योजनाएं बनाती है, जो अगर ठीक ढंग से लागू की जाएं तो वाकई चमत्कारी बदलाव लाए जा सकते हैं। लेकिन अफसोस ये कि ये योजनाएं जरूरतमंदों तक पहुंचती ही नहीं है। उनके हक का पैसा बीच में ही डकार लिया जाता है, और उनके हिस्से आती है सिर्फ गरीबी। सीजे की टीम ने बिहार के एक गांव का दौरा किया और जहां दो ग्रामीण सीजे बनकर अब इंसाफ़ की गुहार लगा रहे हैं।
राज्य की राजधानी पटना से महज़ 45 किलोमीटर की दूरी पर चियनतार गांव है यहां के लोग ख़ामोशी से बदहाल ज़िंदगी जीने को मजबूर हैं। 2000 की आबादी वाले इस गांव में ज्यादातर लोग पिछड़ी जातियों के हैं। सरकारी योजनाओं का फ़ायदा यहां के लोगों तक नहीं पहुंच ही नहीं पाता है। आईबीएन7 के सिटीजन जर्नलिस्ट बने जगमोहन महतो गांव के और पुरुषों की तरह ही रेत खनन का काम करते हैं। दिन भर की कड़ी मेहनत के बाद ये 100 से 150 रुपए कमा पाते हैं। लेकिन परिवार के पांच सदस्यों के लिए ये काफी नहीं है। ये काम सरकार की महात्मा गांधी राष्ट्रीय रोजगार गारंटी योजना के तहत हो रहा था। मनरेगा के तहत इन्हें जॉब कार्ड मिलना था और साथ 100 दिन का काम और हर दिन के काम के एवज़ में 100 रुपए मिलने थे।

गाजीपुर। उत्तर प्रदेश के गाज़ीपुर जिले में जहां किसान बेहद परेशान हैं। कहने को तो इलाके में तीन नहरें हैं, लेकिन फसलों को पानी नसीब नहीं होता। गाज़ीपुर की तीनों नहरें सूखी पड़ी है और प्रशासन किसानों की परेशानी जानते हुए भी कोई कदम नहीं उठा रहा है। लेकिन यहां किसानों के लिए सिटीजन जर्नलिस्ट जगदीश सिंह वरदान साबित हुए।
दरअसल शारदा नदी से गाजीपुर जिले के सैदपुर, जखनिया और सदात ब्लॉक में नहरों के माध्यम से सिंचाई की व्यवस्था है। लेकिन ये व्यवस्था सिर्फ नाम की है क्योंकि साल के 3 महीनों को छोड़ बाकी समय ये नहर सूखी रहती हैं। और इससे प्रभावित होती हैं करीब तीन सौ ग्राम सभाएं। पानी के लिये किसान मजबूर होते हैं पंप सेटों के इस्तेमाल के लिये।

बांदा। हम सब अपने आसपास हो रही गड़बड़ियों को अकसर देखते हैं, लेकिन उनके खिलाफ़ आवाज़ उठाना अपनी जिम्मेदारी नहीं समझते। लेकिन आईबीएन7 के सिटीज़न जर्नलिस्ट कामता प्रसाद मिश्र ने सरकारी नौकरी करते हुए भी अपने ही विभाग के भ्रष्ट लोगों के खिलाफ़ आवाज़ उठाई। उनके लिए मुश्किलें पैदा की गईं, लेकिन वो फिर भी अटल रहे और उनकी कोशिशों से एक बड़ी धांधली से पर्दाफाश हुआ है।
कामता मिश्र कारीधारड़ी पूर्व माध्यमिक विद्यालय में सहायक अध्यापक के पद पर कार्यरत हैं। इनको शिक्षा विभाग में लंबे समय से खुलेआम हो रहे भ्रष्टाचार बर्दाश्त नहीं हुआ। और इन्होंने सिटीज़न जर्नलिस्ट बनने का फैसला किया है ये जानने के लिए कि आखिर गुनहगारों के खिलाफ़ कोई कार्रवाई क्यों नहीं होती।
दरअसल सरकारी स्कूलों की बदहाली के खबरें अकसर आती हैं, लेकिन सच तो ये है कि सरकार इन स्कूलों और यहां पढ़ने वाले बच्चों के लिए तमाम सुविधाएं उपलब्ध कराती है। लेकिन भ्रष्ट अधिकारी बच्चों के लिए आए पैसे बेझिझक हड़प जाते हैं।






















































