

मुंबई। अगर आप मेरी तरह स्टार ट्रेक यूनिवर्स के फैन नहीं थे या उसके 40 साल पुराने लेगसी से वाकिफ नहीं थे तो भी आपको एक बात माननी ही पड़ेगी कि अब्राहम्स की 2009 की स्टार ट्रेक रिबूट एक फ्रेश और मजेदार स्टैंड अलोन साई-फाई एडवेंचर थी। इसका सीक्वल ‘स्टार ट्रेक- इन टू डार्कनेस’ उसी तरह काम करती है, भले ही इसमें कई जोक्स और रेफरेन्सेस है, जो ओरिजिनल फिल्म्स और टीवी सिरीज की याद दिलाते हैं। ये सीक्वल फनी और थ्रिल्लिंग है और इसका बेसिक प्लाट भी नया है।
इन टू डार्कनेस की शुरूवात विजुअली बहुत ही शानदार होती है, जहां एक तरफ ब्लड रेड जंगल के बीच कैप्टन किर्क यानी कि क्रिस और बोन्स यानी कार्ल अर्बन का पीछा कर रहे एलियंस उनके उपर भाले से हमला करते हैं और वही दूसरी ओर स्पॉक यानी कि ज़कारी क्वींटो एक ज्वालामुखी के बीच में फंसा हुआ है। धमाकेदार शुरूआत के साथ इस फिल्म की रफ़्तार कभी नीचे नहीं गिरती है। लेकिन फिल्म की असली कहानी है नए विलेन जॉन हैरिसन की तलाश की, जो स्टारफ्लीट पर विनाशकारी हमला करने के बाद एक अलग प्लैनेट पर छिप रहा है।

मुंबई। अगर आप ओवर वेट है, खेल में खराब, और फिर पढाई में भी कुछ ख़ास नहीं है तो स्कूल का सफ़र मुश्किल से ही कटता है। फिल्म ‘गिप्पी’ की 14 साल की नायिका गुरमीत कौर यानी रिया विज इन सारी परेशानियों से तंग है। उसे हमेशा लोग ताना मारते है और उसे नज़रंदाज़ किया जाता है। साथ ही वो बहुत मुश्किल से अपने स्कूल ड्रेस में फिट हो पाती है।

मुंबई। ‘गो गोवा गॉन’ को भारत की पहली जॉम-कॉम या ज़ोम्बिस पर आधारित कॉमेडी मूवी के रूप में प्रोजेक्ट किया जा रहा है। फिल्म में कुणाल खेमू, वीरदास और आनंद तिवारी तीनो दोस्त हैं जो एक फ्लेश-इटिंग जोम्बिस से भरे आइलैंड पर फंस जाते है। यह फिल्म मस्त काम करती है जब फिल्म के डायरेक्टर कृष्णा डी के और राज निदिमोरू तीनों दोस्तों की बिना सिर पैर वाली मस्ती दर्शाती है। पर इसके बाद मानों लगता है कि फिल्म मेकर यह नहीं जानते हैं कि कहानी को किस दिशा में ले जाना है। और फल स्वरुप फिल्म का सेकंड हाफ इंसानों और ज़ोम्बिस के बीच एक लेजी चूहे-बिल्ली का खेल बनकर रह जाता है।

मुंबई। डायरेक्टर संजय गुप्ता की मल्टीस्टारर फिल्म शूटआउट एड वडाला में एक गैंगस्टर पुलिस स्टेशन में भागता हुआ आता है। उसके दोनों हाथ उसके दुश्मन ने काटे हुए हैं। एक और बदमाश का सिर कुचला गया है जबकि तीसरे को कुर्सी से बांधकर रिवर्स गियर डालकर कुचला जाता है।
संजय गुप्ता की शूटआउट एट वडाला में लगातार होती हिंसा ही हिंसा है। यह कहानी है 1970 के खतरनाक गैंगस्टर मान्या सुर्वे की जिंदगी के उतार-चढ़ाव की और 1982 में उसकी मौत की जिसे अभी तक सबसे पहला पुलिस एनकाउंटर माना जाता है। शुरू से लेकर अंत तक शूटआउट एट वडाला खून-खराबे, आइटम गर्ल और बड़े डायलॉग से भरी हुई है। साथ ही गुप्ता इसमें बेमतलब का सेक्स और हिंसा भरते हैं। डायरेक्टर अपना स्तर नीचे गिराने में बिल्कुल भी पीछे नहीं हटते, वो अपनी मर्जी से इसमें कई आइटम सॉन्ग डालते हैं। एक्टर को गाली गलौज वाली लाइन देते हैं। ऊबड़-खाबड़ लव मेकिंग सीन डालते हैं और यहां तक कि फिल्म में एक बेहद ही अश्लील रेप सीन भी शूट किया गया है। फिल्म साफ तौर पर मान्या सुर्वे यानि कि जॉन अब्राहम की कहानी दर्शाती है। जिसे जवानी में पुलिस द्वारा फंसाया जाता है। वह जेल में एक ठग यानि तुषार कपूर से दोस्ती करता है और फिर एक जघन्य अपराधी बनकर वहां से भागता है।

मुंबई। एक रेलवे स्टेशन के ब्रिज पर एक भिखारी लड़की को लता मंगेशकर का एक पुराना गाना गाते सुनकर दो आदमी बिना एक-दूसरे से नजरें मिलाएं अगल-बगल से गुजरते हैं। वो गाना सिचुएशन से मिलता-जुलता है। एक पिता जो अपनी बेटी को अपनी कहानी की नकल करके बताता है, उसकी एनर्जी देखने लायक और उसका उत्साह दिल जीतने वाला। एक छोटा सा लड़का, अपनी बहन के कपड़े पहने और अपनी मां के मेकअप के साथ एक डांस नंबर पर डांस करता है बिना ये सोचे कि उसका परिवार क्या कहेगा। और एक नौजवान जो गांव से आया है और एक सुपरस्टार के गेट पर खड़े हो कर सिक्योरिटी गार्ड से मिन्नत करते हुए उसकी आंखों में आंसू आ जाते हैं कि उसे उस लीजैंड से मिलने दिया जाए। ये वो सीन हैं जो बांबे टॉकीज देखने के बाद लंबे समय तक आपके दिमाग में रहेंगे। ये चार शॉर्ट फिल्म्स का एक ऐसा सुनहरा सफर है जो भारतीय सिनेमा के 100 साल का जश्न मनाने के लिए बनाई गई फिल्म है।
करीब आधे-आधे घंटे की इन चार कहानियों के बीच कोई लिंक नहीं है। सिर्फ इतना कि इनमें फिल्मों के प्रति प्यार शेयर किया गया है। करन जौहर की फिल्म में रानी मुख़र्जी और रणदीप हुड्डा एक अर्बन कपल है। उनकी शादी में अब कोई जान नहीं रही। अपने काम पर एक नए इंटर्न साकिब सलीम के साथ दोस्ती रानी और उसके पति के रिश्ते के कड़वे सच को सामने लाती है। जौहर की फिल्म असहज ईमानदारी के साथ परिपक्व लगती है। सॉलिड एक्टिंग, शार्प डायलॉग और दो एवरग्रीन गानों के साथ ये कहानी और मजबूत होती है। अपने प्रेडिक्टेबल अंत के बावजूद ये फिल्म काफी असरदार है।

मुंबई। जब कोई एलियन किसी लड़की के शरीर मे घुसती है और उस लड़की की अपनी आत्मा शरीर छोड़ने से मना कर देती है, तो उसके दिमाग में दो आवाजें उठती हैं जो अलग अलग चीज़ें चाहती हैं। जैसे की दो लड़के एक दूसरे को पसंद नहीं करते। ट्विलाइट बुक्स की ऑथर स्टीफनी मेयर अपने उसी लव ट्रैंगल फॉर्मूला को फिर से रिसाइकिल करती हैं, सिर्फ यहां वैम्पायर्स की जगह स्काई फाई बैकड्रॉप का इस्तेमाल किया गया है। ‘द होस्ट’ मेयर की ही एक और बेस्टसेलर पर आधारित है लेकिन इस फिल्म की हीरोइन ट्विलाइट फिल्मों की रोने धोने वाली हीरोइन से कहीं ज्यादा करिश्माई है।
सओईर्स रोनान, मेलानाई स्ट्राडर के किरदार में है जो आने वाले भविष्य में उन बचे हुए कुछ लोगों में से हैं जिन पर एलियंस ने अब तक कब्ज़ा नहीं किया है। जब आखिर में मेलानाई पर कब्ज़ा पा लिया जाता है तो वांडरर नाम की एलियन उसके शरीर में घुसती है पर प्रॉब्लम यहां ये है कि मेलानाई अपना शरीर छोड़ने से इनकार कर देती है। तो हांलाकि आप यहां एक ही शख्स को देख रहे हैं, यहां दरअसल दो लोग हैं जो लगातार हर छोटी से छोटी चीज़ पर झगड़ते रहते है। मामला तब बिगड़ जाता हैं जब हमारी हिरोईन एलियन हेडक्वॉटर्स से भाग निकलती है और बचे हुए इंसानों के ग्रुप को ज्वाइन कर लेती है जो पहाड़ों में छुपे हुए हैं।

मुंबई। 11 साल पहले विशाल भरद्वाज की पहली फिल्म ‘मकड़ी’ से बेहद अलग, उन्हीं के द्वारा लिखी और प्रोड्यूस की गयी ‘एक थी डायन’ उन्हें फिर एक बार डायनों की दुनिया में घुसते हुए दिखाती है। पर जहां ‘मकड़ी’ एक ओल्ड फैशन कहानी थी, जहां गांव की एक डायन लोगों को जानवरों में बदल देती है, वहीं ‘एक थी डायन’ मॉडर्न वर्ल्ड में सेट एक सुपरनेचुरल थ्रिलर है। फर्स्ट टाइम डायरेक्टर कनन्न अय्यर अपनी फिल्म की कहानी को बहुत ही सहज तरीके से सेट करते हुए अपने नायक बोबो यानी इमरान हाश्मी से मिलवाते हैं जिसके पास सब कुछ है, मैजिशियन के तौर पर सक्सेसफुल करियर, एक सपोर्टिव मंगेतर तमारा यानी हुमा कुरैशी और एक छोटा सा लड़का जिसे वो जल्द ही अडॉप्ट करना चाहते हैं।
सबकुछ होने के बाद भी बोबो को उसकी मरी हुई बहन की आत्मा सताती रहती है। जब वो हिप्पनॉसिस के ज़रिए अपने अतीत में जाता है, तो उसका सामना होता है एक रहस्यमयी औरत डायना यानी कोंकणा सेन शर्मा की यादों से, जिसे बचपन में बोबो और उसकी बहन की देखभाल के लिए रखा गया था। 11 साल के बच्चे का इस अंधेरी दुनिया की ओर झुकाव और उसके डर को अय्यर ने बहुत ही अच्छे तरीके से दिखाया है। जब डायना इनकी ज़िन्दगी में आती है, बोबो को सिर्फ उस क्लू की ज़रूरत है जो उसकी थ्योरी को कन्फर्म कर सके, और कोंकणा भी अपने रहस्यमय किरदार को बखूबी निभाती हैं। वापस वर्तमान में आते हुए जैसे ही लगता है की बोबो ने अपने अतीत को पीछे छोड़ दिया है उसकी ज़िन्दगी में एक और औरत आती है लिसा दत्त यानी कल्कि कोचलिन।

मुंबई। रोहन सिप्पी द्वारा निर्देशित ‘नौटंकी साला’ उस कहावत को सार्थक करती है कि अगर आपने किसी की जान बचाई है तो वो आपकी ज़िम्मेदारी बन जाती है। आयुष्मान खुराना, आरपी के किरदार में हैं जो एक नेक दिल थिएटर एक्टर है। एक रात घर लौटते हुए वो किसी को देखता है जो सुसाइड करने की कोशिश कर रहा है और वो उसे रोकता है। बेघर, बेचारा और टूटे दिल वाला यह शख्स है मंदार ली यानी कुणाल रॉय कपूर।

मुंबई। हैले बैरी स्टारर द कॉल सीधे अपने मुद्दे पर आती है। ये एक शानदार थ्रिलर है जो दर्शकों को इससे जुड़ने में समय बर्बाद नहीं करती। फिल्म की शुरुआत होती है लॉस एंजेलिस पुलिस डिपार्टमेंट के इमरजेंसी कॉल सेंटर में जहां दर्जनों ऑपरेटर फोन लाइंस मैनेज करते हुए परेशान कॉलर्स को शांत कर रहे हैं, वहीं दूसरी ओर ऑफिसर्स को उनका केस सौंप रहे हैं।
जॉर्डन के किरदार में बैरी फोन ऑपरेटर हैं जो एक लड़की से बात कर रही है, जो अपने घर में घुसे एक आदमी की शिकायत कर रही है। जब कॉल डिसकनेक्ट हो जाता है तो जॉर्डन उसे कॉल बैक करती है। इस वजह से उस लड़की का अपहरण हो जाता है और उसका मर्डर हो जाता है। खुद को इस दुर्घटना के लिए ज़िम्मेदार मानते हुए जॉर्डन कॉल फ्लोर से रिटायर हो जाती है और नए ऑपरेटर की इंस्ट्रक्टर बन जाती है।

मुंबई। जुरासिक पार्क में एक सीन है जो फिल्म इतिहास में छप गया है। आप जानते हैं किस सन के बारे में बात हो रही है। उस सीन की जिसमें कार के डैशबोर्ड पर रखे दो पानी के ग्लास जिसमें कंपन पैदा होती है, जो इस बात का आगाज़ करते हैं कि वो खतरनाक बड़ा सा डायनासोर आ रहा है। ये सीन स्टीवन स्पीलबर्ग की इस मॉन्स्टर मूवी क्लासिक के वही पुराने वर्जन के साथ 3D में और भी डरावना लगता है। इस वीकेंड अपनी 20वीं सालगिराह मनाने के लिए सिनेमाघरों में दुबारा आई है।
यह 3D बनावटी नहीं है। ये बस सिर्फ इस शानदार फिल्म को सेलिब्रेट करने का एक बहाना है। हैरत है कि इसके स्पेशल इफ़ेक्ट 20 साल बाद आज भी लाजवाब लगते हैं। इसके फैन्स इसकी कहानी का हर हिस्सा याद रखेंगे जहां वैज्ञानिक का एक ग्रुप और दो बच्चे एक महत्वाकांक्षी थीम पार्क जैसे आइलैंड में जाते हैं जहां एक अरबपति ने कुछ अजीब डीएनए के ज़रिये प्री हिस्टोरिक डायनासोर को जन्म दिया।






















