नई दिल्ली। अब तक आप जान चुके हैं कि किसी तरह नरसिम्हा राव सरकार 1996 में भ्रष्टाचार और स्कैंडल के आरोपों से जूझ रही थी। खुद प्रधानमंत्री नरसिम्महा राव भी भ्रष्टाचार के आरोपों से अछूते नहीं थे। 1997 के चुनावों से मात्र कुछ महीने पहले एक बड़े स्कैंडल ने सरकार की साख पर बट्टा लगा दिया।
उस घोटाले का नाम था जैन हवाला घोटाला, स्टील और पॉवर सेक्टर के इंडिस्ट्रियलिस्ट जैन नाम के शख्स ने खुलासा किया कि उसने करीब-करीब हर राजनीतिक पार्टियों के नेताओं को घूस दिए थे। उस घूस की कुल कीमत थी 33 मिलियन यूएस डॉलर यानी करीब डेढ़ सौ करोड़ रुपये। यही नहीं जैन ने ये कहकर सबको सकते में डाल दिया कि उसने कश्मीरी अलगावादियों को भी पैसे दिए थे। जैन ने कई राजनीतिज्ञों के नाम लिए। 115 लोगों के नामों की लिस्ट जारी हुई। कई मंत्रियों को इस्तीफा देने पर मजबूर होना पड़ा।
इन सबके बीच 11वीं लोकसभा के लिए चुनाव हुए। इन चुनावों के बाद भारतीय राजनीति नई दशा और दिशा को ओर बढ़ी जो अब तक जारी है। बड़ी पार्टियां छोटी और क्षेत्रीय पार्टियों के साथ मिलकर सरकार बनाने की ओर अग्रसर हुईं।
ग्यारहवें लोकसभा के लिए मुख्य मुकाबला तीन फ्रंटों के बीच था। एक तरफ आडवाणी की अगुवाई में शिव सेना, हरिय़ाणा विकास पार्टी और समता पार्टी जैसे दल बीजेपी के साथ थे। वक्त की नजाकत को समझते हुए कांग्रेस ने भी क्षेत्रीय पार्टियों से नाता जोड़ना शुरू कर दिया। इन दो फ्रंट के अलावा एक तीसरा फ्रंट उभरा। इसका नाम था नेशनल फ्रंट जिसमें लेफ्ट फ्रंट, जनता दल और तेलगू देशम जैसी पार्टियां शामिल थी। सभी का सिर्फ एक ही मकसद था कांग्रेस और बीजेपी दोनों को ही केंद्र की सत्ता से बाहर रखना।
जाहिर है 1996 के लोकसभा चुनाव में जनता ने किसी को पूर्ण बहुमत नहीं दिया। लेकिन कोई भी दल गठबंधन धर्म का निर्वाह करने के लिए परिपक्व नहीं था। ऐसे में देश ने महज दो सालों में तीन प्रधानमंत्री देखे।
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