केदारनाथ। शिव का पांचवां सबसे महत्वपूर्ण ज्योतिर्लिंग केदारेश्वर महादेव का है। शिव पुराण के मुताबिक से केदारेश्वर ज्योतिर्लिंग मुक्ति का सबसे सरल मार्ग है। जो भक्त केदारेश्वर ज्योतिर्लिंग के दर्शन करते हैं उनकी मुक्ति का रास्ता पूरी तरह से साफ हो जाता है। इसी ज्योतिर्लिंग के दर्शन के बाद से पांडव अपने पाप से मुक्त हुए थे।
पौराणिक कथाओं में इस ज्योतिर्लिंग के बारे में दो तरह की बाते की जाती है। एक कथा उस वक्त की जब पांडव अपने पाप का प्रायश्चित करना चाहते थे। उनके पापों का प्रायश्चित तभी हो पाया। जब भगवान शिव उन्हें खुद दर्शन दिए।
शास्त्र के मुताबिक पांडव हरिद्वार के रास्ते केदारनाथ के दर्शन के लिए आगे बढ़ते हैं। जैसे ही वो केदारनाथ पहुंचते हैं दूर से उन्हें भगवान शिव दिखाई पड़ते हैं। लेकिन थोड़ी ही देर के बाद शिव अंतरध्यान भी हो जाते हैं।
फिर पांडवों को अपने पाप का अहसास होता है। धर्मराज युधिष्ठिर कहते हैं कि हे ईश्वर आप हमसे छुप गए हैं क्योंकि हमने पाप किया है। लेकिन हम आपकी तलाश जरुर करेंगे। आपके बगैर हमारी मुक्ति नहीं है।
केदारनाथ में एक जगह गुप्त काशी है। उस जगह का नाम गुप्तकाशी इसलिए पड़ा कि पांडवों को देखकर भगवान शिव वहीं छुप गए थे। गुप्तकाशी से भगवान शिव की तलाश करते हुए पांडव गौरीकुंड तक जाते हैं। लेकिन इसी जगह एक बड़ी विचित्र बात होती है। पांडवों में से नकूल और सहदेव को दूर एक सांड दिखाई देता है।
भीम अपनी गदा से उस सांड को मारने दौड़ते हैं। लेकिन वह सांड उनकी पकड़ में नहीं आता है। भीम उसके पीछे दौड़ते हैं और एक जगह सांड बर्फ में अपने सिर को घुसा देता है। भीम पूंछ पकड़कर खिंचते हैं। लेकिन सांड अपने सिर का विस्तार करता है। सिर का विस्तार इतना बड़ा होता है कि वह नेपाल के पशुपति नाथ तक पहुंचता है। पुराण के अनुसार पशुपतिनाथ भी बारह ज्योतिर्लिंगों में से एक है।
देखते ही देखते वह सांड एक ज्योतिर्लिंग में तब्दील हो जाता है। फिर उससे भगवान शिव प्रकट होते हैं। भगवान शिव का साक्षात दर्शन करने के बाद पांडव अपने पापों से मुक्त होते हैं।
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