केदारनाथ। महाभारत के मुताबिक नर और नारायण नाम के दो भाई थे। दोनों शिव के भक्त थे। केदारेश्वर ज्योतिर्लिंग की उत्पति की कथा शिव पुराण में तब आती है जब नर और नारायण शिव की अराधना कर रहे होते हैं। भगवान शिव की प्रार्थना करते हुए दोनों कहते हैं कि शंभु आप हमारी पूजा ग्रहण करें।
नर और नारायण जब पूजा आग्रह पर भगवान शिव खुद उस पार्थिव लिंग में आते हैं। इस तरह पार्थिव लिंग के पूजन में वक्त गुजरता जाता है। एक दिन भगवान शिव खुश होते हैं और नर नारायण के सामने प्रकट होकर कहते हैं कि वो उनकी अराधना से बेहद खुश हैं। इसलिए वर मांगो।
नर नारायण शिव भगवान से कहते हैं कि हे प्रभु अगर आप प्रसन्न हैं तो लोक कल्याण के लिए कुछ कीजिए। भगवान शिव कहते हैं कि कहो क्या कहना चाहते हो। इस पर नर नारायण कहते हैं कि जिस पार्थिव लिंग में हमने आपकी पूजा की है उस लिंग में आप स्वयं निवास कीजिए ताकि आपके दर्शन मात्र से लोगों का कष्ट दूर हो जाए।
दोनों भाइयों के अनुरोध से भगवान शिव और प्रसन्न हो जाते हैं और केदारनाथ के इस तीर्थ में केदारेश्वर ज्योतिलिंग के रुप में निवास करने लगते हैं। इस तरह केदारेश्वर ज्योतिर्लिंग की उत्पति होती है। इस ज्योतिर्लिंग की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि साल के छह महीने तक ये बर्फ की चादर से ढंका रहता है। लेकिन छह महीने के बाद जब मंदिर के कपाट खुलते हैं तो यह ज्योतिर्लिंग पहले की तरह ही प्रज्वलित रहता है।
धर्म पुराण के मुताबिक पाप से मुक्त होने के बाद इस मंदिर का निर्माण पांडवों ने अपने हाथ से किया। लेकिन आठवीं सदी में इसका दोबारा निर्माण किया गया और ये काम आदि शंकराचार्य ने खुद किया था।
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