नई दिल्ली। चुनाव से ठीक पहले तीसरा मोर्चा एकबार फिर बन गया है। मोर्चे में जितने दल लगभग उतने ही पीएम पद के उम्मीदवार भी हैं लेकिन क्या इसकी ताकत है अपने बूते सरकार बनाने की। इस बात की क्या गारंटी है कि चुनाव के बाद भी तीसरे मोर्चे में शामिल सभी दल साथ-साथ ही रहेंगे। और अगर ये सबसे बड़ा गठबंधन बनकर उभरा भी तो क्या कांग्रेस अथवा भाजपा से इसे सरकार बनाने का समर्थन मिलेगा। ये और ऐसे ही अन्य सवालों के जवाब तलाशे गए इस बार के मुद्दा में। बहस में हिस्सा लिया वाम नेता नीलोत्पल बसु, एनसीपी नेता डीपी त्रिपाठी, वरिष्ठ पत्रकार आलोक मेहता, जेडीएस प्रवक्ता दानिश अली, कांग्रेस नेता अश्विनी कुमार और भाजपा प्रवक्ता प्रकाश जावड़ेकर ने। एंकरिंग की संदीप चौधरी ने।
संदीप- अश्विनी जी पहला सवाल आपसे, ये तीसरा मोर्चा है इसकी बानगी कुछ बनती दिख रही है। लेकिन आपके विचार में ये एक हकीकत भी हो सकता है या महज एक फसाना ही है?
अश्विनी- इस मोर्चे में कितने नेता हैं, इनकी क्या साझेदारी है मुझे तो समझ में आई नहीं। सिर्फ एक बात जरूर है कि कुछ लोग ये चाहते हैं कि देश में एंटी कांग्रेसिजम के उपर अपनी राजनीतिक दुकान चलाएं।
संदीप- लेकिन ये सिलसिला बढ़ता जा रहा है। आपके ही जो नजदीकी हैं शरद पवार जी ने एक बयान दिया कि विमान में तकनीकी खराबी की वजह से वो जा न सके। तो बहुत से आपके ही लोग हैं जो तीसरे मोर्चे की ओर जाते दिखाई दे रहे हैं। दिक्कत हो रही है इस बात को लेकर?
अश्विनी- ये बिल्कुल गलत है। शरद पवार ने एक बार नहीं दो बार नहीं कई बार कहा है कि उनका जो दल है वो स्वयं हैं वो यूपीए के साथ हैं। और उन्होंने कभी ये नहीं कहा कि वो यूपीए से बाहर हैं।
संदीप- त्रिपाठी साहब मुझे ये बात समझाइए कि आप कांग्रेस के साथ है महाराष्ट्र में, गोवा में कांग्रेस के साथ है। कटिहार की भी सीट अगर मिल जाती है तो वहां भी बातचीत हो सकती है लेकिन नवीन पटनायक के साथ आप कैसे जा रहे हैं?
त्रिपाठी- नवीन पटनायक का अभिनंदन सभी धर्मप्रेक्ष दलों को भारत में करना चाहिए। इन्होंने एक बहुत ही ऐतिहासिक मौके पर चुनाव के मौके पर भारतीय जनता पार्टी को अलग-थलग कर दिया और उससे पूरे देश में एनडीए का जो आइसोलेशन हुआ है उसके लिए नवीन पटनायक आइना बन गए हैं।
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