जयपुर। राजस्थान में हमेशा की तरह इस लोकसभा चुनाव में भी मुकाबला कांग्रेस और बीजेपी के बीच ही है। बीएसपी के विधायकों को साथ लाकर मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने कांग्रेस सरकार को बहुमत में तो ला दिया लेकिन ज्यादा बड़ी चुनौती लोकसभा चुनाव में पार्टी का बेड़ा पार लगाने की है। कांग्रेस के पास लोकसभा की 25 में से केवल चार सीटे हैं।
राजस्थान की गर्म रेत में बीजेपी का कमल खिलेगा या फिर ये गर्म रेत कांग्रेस का हाथ जला देगी। विधानसभा चुनाव में तो हाथ ने रेत की रानी का महल ढहा दिया- वसुंधरा गईं और अशोक गहलोत लौटे। लेकिन लोकसभा चुनाव का खेल तो बड़ा है।
दरअसल पांच साल पहले 2004 लोकसभा चुनाव में राजस्थान में कांग्रेस को 4 सीटें ही मिल सकीं जबकि वोट मिले 41.4 फीसदी।
लेकिन 2008 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस और बीजेपी के बीच ज्यादा फर्क नहीं था। कांग्रेस को 36.8 फीसदी वोट मिले थे और बीजेपी गठबंधन को 34.3 फीसदी। गहलोत को सरकार बनाने के लिए कई निर्दलीय विधायकों का समर्थन लेना पड़ा। यानि लोकसभा चुनाव में बड़ी सफलता पाने के लिए कांग्रेस को अब एक भारी छलांग की जरूरत है।
2008 के विधानसभा चुनाव के वोटों का हिसाब लगाएं तो यूपीए के हिस्से में 13 और एनडीए के हिस्से 11 सीटें आती हैं। अगर कांग्रेस अपने वोटों में 4 फीसदी का इजाफा कर पाए तो वो 22 सीट तक पा सकती है।
मुख्यमंत्री गहलोत के लिए अच्छी बात ये है कि उनकी और उनकी सरकार की छवि साफ-सुथरी है। महिलाओं का कांग्रेस की तरफ रुझान बढ़ा है जबकि अपनी महारानी के नखरे झेलने वाली बीजेपी अब भी अंतरकलह से जूझ रही है।
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