नई दिल्ली। यूपी में जो जीता वही बनाता है केंद्र में सरकार। ये कहावत काफी पुरानी है। भले ही आज देश में छोटी पार्टियों का रुतबा बढ़ गया हो लेकिन अब भी उत्तर प्रदेश ही इकलौता राज्य है जहां से अस्सी सांसद चुन कर आते हैं। यूपी में हाथी है- यूपी में ही साइकिल भी है। दिल्ली की दावेदार होने का दम भरने वाली कांग्रेस और बीजेपी यहां हाशिए पर हैं और लड़ाई मायावती और मुलायम सिंह यादव के बीच मानी जा रही है। यूं तो दोनों कट्टर विरोधी हैं लेकिन इस मामले में एक राय है कि अगली लोकसभा त्रिशंकु हो ताकि प्रधानमंत्री बनने-बनाने के खेल में दांव उनपर भी लग सके।
पिछले लोकसभा चुनाव में बीएसपी को 19 सीटें मिली थीं और समाजवादी पार्टी गठबंधन को 38। बीजेपी गठबंधन 11 सीटों पर सफल हुआ था तो कांग्रेस 9 सीटों तक ही सिमटी रह गई थी
लेकिन तब से लेकर अब तक गोमती में काफी पानी बह चुका है। दलित-ब्राह्मण जैसे नए सामाजिक समीकरण राजनीति को प्रभावित कर रहे हैं। इसी का नतीजा था कि 2007 में बीएसपी दो तिहाई बहुमत की सरकार बना सकी। सूबे में ये कमाल 16 साल बाद हुआ था। मायावती चौथी बार मुख्यमंत्री बनीं, बिना किसी बैसाखी की मदद के। लेकिन माया की नजर अब दिल्ली पर है। वे कम से कम पचास सीट जीतने का लक्ष्य लेकर चल रही हैं ताकि मौका पड़ने पर ताज उनके सिर सजे। कुछ यही कोशिश मुलायम सिंह यादव की भी है। पर पिछली बार की 38 सीटों में वे कितना इजाफा कर पाएंगे, कहना मुश्किल है।
उधर, बीजेपी भी पुरानी चमक वापस पाने के लिए अरसे से तड़प रही है। न उसका मंदिर राग प्रभावित कर रहा है और न ही वरुण गांधी के जहरीले भाषण का बहुत असर है। अगर वो सीटों के मामले में कांग्रेस को पीछे छोड़ दे, तो बड़ी उपलब्धि होगी।
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