रांची। झारखण्ड पुलिस के जोनल आई.जी ने माना कि चुनाव के एक दिन पहले झारखण्ड में मारे गए पांच लोग निर्दोष थे और आस पास के गांव के ग्रामीण थे। इन पांचों को नक्सली बताकर मारा गया था।
मालूम हो कि लोकसभा चुनाव के पहले चरण की वोटिंग से ठीक पहले झारखंड नक्सली हमले से दहल उठा था। लेकिन इसके बाद सुरक्षाबलों ने एक कहानी गढ़ी। तमगे जीतने के लिए और अपने आला अफसरों की वाहवाही लूटने के लिए उन्होंने एनकाउंटर का खेल खेला। और इस एनकाउंटर की भेंट चढ़ गए कई देशप्रेमी। जिनके घर परिवार में तमाम लोग वर्दी पहन कर आतंक से लड़ते थे।
उनमें शामिल था एक 14 साल का बच्चा भी जो स्कूल जाता था लेकिन उसे भी नक्सली बना कर गोलियों से छलनी कर दिया गया। पुलिस की मानें तो 14 साल का मसीह एक नक्सली था। 15 अप्रैल को पुलिस की गोलियों से सिर्फ मसीह ही नहीं मरा। 16 साल का उसका भाई संजय, उसके पिता और उसका चचेरा भाई भी मारे गए।
मसीह की बहन सपना कहती था कि हम अपने चचेरे भाई और बहन के साथ स्कूल जा रहे थे। रास्ते में विस्फोट और गोली की आवाज सुनकर वापस लौट आए। थोड़ी देर में दो पुलिसवाले आए और मेरे पिता सुपाय, भाई संजय, चचेरे भाई सुपे और मसीह को अपने साथ लेते गए। वो लोग गांव के ही पिताय मुंडा को भी अपने साथ लेते गए। थोड़ी देर बाद उनके मारे जाने की खबर आई।
मसीह के चाचा भारतीय सेना में जवान हैं। मसीह के एक और रिश्तेदार झारखंड पुलिस में काम करते हैं। जिस परिवार के दो लोग चुनाव वाले दिन नक्सलियों से लोहा ले रहे थे उसी दिन उनके परिवार को नक्सली बताकर खत्म कर दिया गया।
आठवीं का छात्र मसीह, कोल फील्ड में नौकरी करने वाला सुपॉय और रांची के कॉलेज में बारहवीं का छात्र संजय झारखंड पुलिस की नजर में नक्सली थे।
एसपी, लातेहार हेमंत टोप्पो का कहना था कि घटनास्थल पर मारे गए लोगों के शव उधर ही पड़े थे जिधर से नक्सली गोली चला रहे थे। इससे साफ हो जाता है कि वे लोग भी नक्सली थे।












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