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लालू का सफर, गली के छोरे से लेकर हॉवर्ड गुरु तक

Posted on Apr 26, 2009 at 10:33pm IST | Updated May 01, 2009 at 04:33pm IST

पटना। लालू का नाम लेते ही याद आती है एक सूरत, भोलाभाला, गोल-गोल चेहरा, सफेद बाल जैसे कटोरा कट, चेहरे पर बिखरी मासूमियत, आंखों में शरारत, मन में कुछ कर गुजरने का और विरोधियों को धूल चटाने का जज्बा और जबान तो जैसे अभी कोई नया शगूफा छोड़ने वाली हो। लालू प्रसाद यादव को कोई भारत की राजनीति का मसखरा कहता है तो कोई इन्हें गरीबों का नेता। इसके अलावा कोई इन्हें बिहार को बर्बाद करने का दोष देता है। जो भी हो, लालू की चाहत का आलम ये है कि पाकिस्तान में अगर किसी भारतीय नेता की बात होती है।

इस बार लालू के साथ लोकजनशक्ति सुप्रीमो पासवान हैं। दोनों चुनावी जंग में कंधे से कंधा भिड़ाकर जूझ रहा है और दोनों का दुश्मन एक ही है नीतीश कुमार।

चाहे वो घोड़ागाड़ी में बैठें या हरे रंग के राष्ट्रीय जनता दल रथ में। लालू और आरजेडी की लालटेन एक बार फिर भीड़ इकट्ठी कर रही है। जो लोग लालू को सालों से जानते हैं वो कहते हैं कि चाहे जो बदला हो, लालू का अंदाज और उनका स्टाइल कभी नहीं बदला। अपने चुनाव अभियानों में लालू इस बार अपने मतदाताओं से माफी मांग रहे हैं। उन गलतियों की, जो उन्होंने सत्ता में रहते हुए कीं। वो ये भी याद दिला रहे हैं कि किस तरह उन्होंने रेलवे की शक्ल-सूरत बदल डाली।

दरअसल राबड़ी और लालू कुछ ही किलोमीटर के फासले पर जन्म लिए। राबड़ी का गांव है उत्तरी बिहार के गोपालगंज इलाके का सालार केला और लालू का फुलवारिया। लालू के बड़े भाई गुलाब राय आज भी फुलवारिया में ही रहते हैं। जिस झोपड़ी में लालू पैदा हुए थे अब वो झोपड़ी लालू की मां मराछिया देवी की यादगार बन चुकी है। गुलाब राय कहते हैं कि बचपन में ही लालू के बारे में भविष्यवाणी हो चुकी थी। लालू काफी गरीबी में पले-बढ़े। घर चलाने के लिए उनकी मां के पास जमीन का एक छोटा सा टुकड़ा और दो गायें हुआ करती थीं। बस इन्हीं से उन्होंने जैसे-तैसे अपने सातों बच्चों को पाला।

लालू जब 6 साल के थे तो अपने भाई मुकुंद राय के साथ रहने पटना चले आए। मुकुंद तब एक सरकारी वेटरिनरी कॉलेज में चपरासी थे। यहां रोज वो मिलर स्कूल तक पैदल जातेय़ जल्द ही वो स्कूल में सबके चहेते बन गए।




स्कूल और शहर में आने के बावजूद लालू कभी ये नहीं भूले कि वो कहां के रहने वाले थे और तभी उन्होंने फैसला लिया कि अपने भाईयों की तरह खुद को राय नहीं कहलवाएंगे। उन्होंने नाम के साथ अपनी जाति का नाम यादव जोड़ लिया। कॉलेज के दिनों में ही लालू को अपना करियर दिखाई देने लगा था। 1966 में पटना का बिहार नेशनल कॉलेज कांग्रेस विरोधी भावनाओं से भरा था।

राजनीति विज्ञान के छात्र लालू की दोस्ती तब नौजवान नीतीश कुमार से हुई। कॉलेज में लालू के साथी बताते हैं कि लालू हमेशा एक शोमैन की भूमिका में रहते थे। 1977 में पहली बार लालू संसद पहुंचे और दो साल बाद ही उन्होंने मोरारजी देसाई के खिलाफ वोट दिया। अभी तक लालू आदर्शवादी थे।

राममनोहर लोहिया और इमरजेंसी के नायक जयप्रकाश नारायण के अनुयायी लालू ने पिछड़ी जातियों के बीच अपनी छवि तैयार करनी शुरू कर दी थी। वो अब कांग्रेस राज को खुली चुनौती देते थे। इसी के साथ उन्होंने जेपी की एक खासियत भी अपना ली। बड़ी-बड़ी जनसभाएं। पटना के गांधी मैदान में होने वाली इन जनसभाओं में 1974 की संपूर्ण क्रांति के ख्वाब को बार-बार दोहराया जाता था। 1990 में टूटे-बिखरे बिहार के मलबे से लालू का राजनीतिक जन्म हुआ। मंडल आयोग की लहर पर सवार होकर वो जनता दल की तरफ से सत्ता पर काबिज हुए। अपनी जनता से उनका वादा था- स्वर्ग नहीं तो स्वर। खामोश रहने वालों को आवाज और सम्मान। पिछड़ी जातियों और मुसलमानों को बराबरी।

बिहार में जाति का फैक्टर हमेशा हावी रहा। हर बार पिछड़े ऊपर, 1991 के लोकसभा चुनाव ने लालू को बड़ी फतह दिलाई। पहले चुनाव में जनता दल ने 54 में से 53 सीटें जीतीं थीं। लालू का गणित साफ था। उन्हें मंडल और मुस्लिम के गठजोड़ की ताकत समझ आ गई थी। ये ऐसा गठजोड़ था जिसने उनकी पार्टी को बिहार में तीन बार सत्ता दिलाई और साथ ही राज्य को वो दिया, जो उसने दशकों से नहीं देखा था- राजनीतिक स्थायित्व।

जब 1997 में ऊंची जातियों के लोगों ने लक्ष्मणपुर बाथे में तकरीबन 58 लोगों को मार डाला, तो लालू ने तुरंत एक्शन लिया। बिनेश्वरराज बंसी के घर के 6 सदस्य भी इस हमले में मारे गए थे। वो कहता है कि आज उसके पास जो कुछ है वो लालू की वजह से है।

मुसलमान वोटरों की तरफ से लालू को चौतरफा समर्थन मिला। इसकी वजह भी थी जब लालकृष्ण आडवाणी ने 1990 में अपनी रथयात्रा शुरू की तो बिहार के मुसलमानों को डर था कि इससे मुस्लिम विरोधी लहर चल पड़ेगी। लेकिन 23 अक्टूबर को लालू ने वो कर दिखाया जो तब तक कोई राज्य सरकार नहीं कर सकी थी। आडवाणी की रथयात्रा बिहार में घुसी ही थी कि आडवाणी को समस्तीपुर में गिरफ्तार कर लिया गया।

लालू के इस कदम ने उन्हें अल्पसंख्यकों और धर्मनिरपेक्षता का मसीहा बना दिया। इस छवि को उन्होंने आने वाले कई साल तक भुनाया पर इस कामयाबी की चमक धीरे-धीरे खोने लगी। लालू नक्सलियों का उभार रोकने और बिहार को विकास के रास्ते पर लाने में नाकाम साबित हुए।

1997 में चारा घोटाला हुआ। 2000 में उन पर आय से ज्यादा संपत्ति छिपाने के आरोप लगे और दोनों में चार्जशीट किया गया। वो दिन भी आया जब उन्हें उनके ही लोगों ने ठुकरा दिया।

कभी उनके दुश्मन और अब उनके सियासी दोस्त लोकजनशक्ति पार्टी के चीफ रामविलास पासवान अब हर जगह उनके साथ जाते हैं। उनके स्वागत सत्कार में हिस्सा लेते हैं और उनके उड़नखटोले में सवारी करते हैं।

वहीं अगर राजनीति को छोड़ दें तो लालू पूरी तरह परिवार के लिए समर्पित आदमी हैं। जिन्हें अपनी लड़कियों और पोते-पोतियों से बेहद प्यार है। उनके बेटे तेजस्वी और तेज प्रताप को पिता की चुनाव रैलियों में देखा जा सकता है। लेकिन उनके पिता कहते हैं कि उनमें से कोई राजनीति में नहीं आएगा।

मगर उनके दोस्त इसकी सफाई देने को तैयार हैं। उनके मुताबिक जुबान से तीखे और बड़बोले लालू के भीतर हर किसी की तरह एक सामान्य आदमी है। जो बेहद मामूली चीजों में भी आनंद ढूंढ लेता है।

लालू ने रेलवे का घाटा कम करने के लिए छोटे-छोटे लेकिन अनूठे तरीके ईजाद किए। उन्होंने न तो यात्री किराया बढ़ाया और न मालभाड़े को छुआ। उन्होंने इंडस्ट्री को रेलवे का मालवाहक बिजनेस बढ़ाने के लिए लॉबीइंग की। कम कीमत वाला गरीब रथ शुरू किया और तयशुदा वजन से ज्यादा लोडिंग के लिए ट्रांसपोर्टरों से पैसा वसूलने का नियम बनाया। घाटे को ढो रही भारतीय रेलवे ने पांच साल में 90 हजार करोड़ का नफा जेब में डाल लिया।

मगर इस सबके बीच भी लालू अपने वोटरों को ये याद दिलाना नहीं भूले थे कि वो उन्हीं में से एक थे। हर मौके पर भोजपुरी में चुटकियां लेते लालू ने जमीन पर पकड़ बनाए रखी। उन्होंने कई बार डींग भी हांकी कि अंग्रेजी उनके लिए कितनी कम अहमियत रखती है। हालांकि ये साफ था कि उनके लिए इसकी एक अहमियत जरूर थी।

बात चाहे वैलेंटाइन डे की हो या फिल्मों में धूम्रपान पर रोक की। हर मामले में लालू ब्रैंड ने समाज पर अपनी छाप छोड़ी है। कभी उनके नाम पर फिल्मों के नाम दिए गए तो कभी पांचवीं क्लास के बच्चों के गेम शो में वो चतुराई भरे जवाबों से सभी पर छा गए।


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