नूरपूर,हिमाचल प्रदेश। बैजनाथ से जब शिवलिंग को रावण ले जा नहीं पाया तो चिन्ता में पड़ गया। रावण समझ नहीं पा रहा था कि क्या करें। इसके बाद रावण भगवान शिव की तपस्या में फिर लीन हो गया। साल दर साल निकल गए। लेकिन भगवान शिव प्रकट नहीं हुए।
लेकिन रावण तपस्या करता रहा। जब काफी साल गुजर गए और भगवान शिव प्रकट होने का नाम नहीं ले रहे थे तो रावण ने एक नया तरीका सोचा।
रावण ने शिव भगवान को प्रकट करने के लिए अपने सिर काटने का फैसला कर लिया। रावण को लगा कि एक सिर काटते ही भगवान शिव प्रकट हो जाएंगे। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। रावण फिर चिंता में पड़ गया। इसके बाद उसने अपने दूसरे सिर की बलि दे दी। लेकिन शिव नहीं आए। फिर एक एक कर रावण ने अपने नौ सिरों की बलि दे दी। रावण अपना दसवां सिर काटने ही जा रहा था कि भगवान शिव प्रकट हो गए।
रावण ने शिव भगवान से कहा कि बहुत बड़ी गलती हो गई। मुझे माफ कर दीजिए और मेरे साथ चलिए। लेकिन भगवान ने रावण की बात नहीं मानी। बदले ने शिव ने एक एक कर रावण के नौ सिरों को जिंदा कर दिया। और कहा कि जाओ तुम फिर पहले की तरह बलशाली हो जाओगे। तुम पर हमारी कृपा बनी रहेगी। लेकिन जो वचन मैंने तुमको दिया था वो व्यर्थ नहीं जाएगा। इसलिए अपने मन को नियंत्रित करो और जाओ। तुम हरदम मेरे सबसे प्रिय भक्त रहोगे।
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