नई दिल्ली। हिंदुस्तान की शायद अकेली ऐसी सियासी शख्सियत है जिस पर आकर देश की धर्मनिरपेक्ष तस्वीर बिखर जाती है। जो दंगों का दागी है, जिसके सिर पर सैकड़ों की मौत का इल्जाम है। एक डिक्टेटर, विकास का हिमायती और गुजरात में जननायक। नरेंद्र मोदी को भारत का सुप्रीम कोर्ट नीरो की संज्ञा देता है। नीरो, जिसने उस वक्त अपनी आंखें मूंद ली थीं, जब उसका राज्य जल रहा था। वही मोदी आज भारतीय जनता पार्टी के भविष्य की सबसे बड़ी उम्मीद हैं।
अपने राज्य गुजरात को ऊंची विकास दर देने वाले इस मुख्यमंत्री के बारे में कहा जाता है कि निजी जिंदगी में वो बेदाग रहे हैं। इसका सबूत साइबर दुनिया में भी मिलता है। फेसबुक जैसी सोशल नेटवर्किंग वेबसाइट्स पर मोदी का गुणगान। कहते हैं कि उनके समर्थक ज्यादातर 25 साल से कम उम्र के हैं और ये भी कनबतियां हैं कि अगले लोकसभा चुनाव में शायद वो राहुल गांधी के खिलाफ बीजेपी का सबसे ताकतवर मोहरा होंगे।
इन लोकसभा चुनावों में नरेंद्र मोदी हिस्सा नहीं ले रहे फिर भी वो इस खेल के महारथी की हैसियत रखते हैं। वो पश्चिमी भारत में बीजेपी की 74 सीटों पर चुनाव रथ के सारथी बनाए गए हैं। गुंटूर से गुवाहाटी तक हर तरफ बीजेपी काडर में उनकी मांग है। हर उम्मीदवार की चाहत है कि वो आएं और उसके चुनाव की बागडोर अपने हाथ में ले लें।
लेकिन उनके लिए सपने पालने वाली भीड़ के बावजूद नरेंद्र मोदी का अंदाज काफी शांत और संदेश सीधा होता है। जैसे-जैसे नरेंद्र मोदी राष्ट्रीय राजनीति की तरफ बढ़ रहे हैं वैसे-वैसे उनकी जुबान से निकले शब्द मीठे होते जा रहे हैं। उनकी कोशिश है कि अपनी छवि को थोड़ा बदला जाए। भाषणबाजी के बजाय विकास की बात की जाए।
ये एक ऐसे राजनीतिक नेता का सफरनामा है, जो कम से कम अपने राज्य में ही सही अपनी पार्टी से बड़ा हो चुका है। वो कहते हैं कि मैं पांच करोड़ गुजरातियों को अपना परिवार मानता हूं। उनके ये शब्द उनके राज्य में उनके लिए पागलपन तक पैदा कर देते हैं लेकिन कुछ लोगों को इसमें शंका के बीज दिखाई देते हैं।
मोदी अहमदाबाद से 100 किलोमीटर दूर गुजरात के मेहसाणा जिले के छोटे से कस्बे वडनगर की संकरी गलियों में जन्मे और फिर यहीं पले-बढ़े भी। उनके स्कूल के टीचरों को याद है कि वो एक औसत छात्र होते थे पर उनमें जबर्दस्त उत्साह हुआ करता था। मोदी के टीचर हरगोविंदभाई पटेल कहते हैं कि अगर मैं क्लास में कोई सवाल पूछता था, तो नरेंद्र मोदी की उंगली सबसे पहले उठती थी।
उधर, मोदी का ज्यादातर वक्त स्कूल से बाहर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ यानी आरएसएस की शाखाओं में ही बीतता था। रोज वो दो बार शाखा जाते थे जिन साथियों ने नरेंद्र मोदी के साथ इन शाखाओं में हिस्सा लिया, उन्हें याद है कि मोदी काफी गंभीर रहते थे। तैराकी जैसा खेल भी उनके लिए शरीर को फिट रखने से ज्यादा अहमियत नहीं रखता था।
मोदी के दोस्त महेंद्रभाई दारजी कहते हैं कि मोदी आज जो भी हैं वो इसी संघ की बदौलत हैं। आरएसएस में अपनी भागीदारी के बाद मोदी का झुकाव अगर कहीं था तो वो था थियेटर। वो बहुत ही अच्छे कलाकार थे और एक बेहतरीन वक्ता थे। नरेंद्र मोदी बताते हैं कि मैंने अपने स्कूल में पैसा इकट्ठा करने के लिए कुछ नाटकों में भाग लिया। कुछ मोनो एक्टिंग भी की।
मोदी की मां के मुताबिक जब बेटे नरेंद्र ने घर छोड़ा, तो वो तो पागल ही हो गई थीं। करीब दो महीने तक उनकी यही हालत रही और इसके बाद दो साल तक उन्हें नरेंद्र की कोई खबर नहीं मिली। सालों बाद जब उनका बेटा मुख्यमंत्री बना, तो वो बेटे के शपथग्रहण समारोह में पहुंचीं। पर आज अपने बेटे से उनकी मुलाकात बस उसे टीवी पर देखकर होती है। अब वो बेटे से नहीं मिल पातीं।
दिलचस्प बात ये है कि मोदी ने आरएसएस में शामिल होने के लिए घर नहीं छोड़ा था। नरेंद्र मोदी के भाई बताते हैं कि मोदी शादी नहीं करना चाहते थे इसलिए घर छोड़कर चले गए। तब उनकी पत्नी बनीं स्कूल टीचर को आज जमाना भुला चुका है। सोमभाई मोदी बताते हैं कि 15 साल की उम्र में उनका रिश्ता तय हुआ था, लेकिन उनका गौना नहीं हुआ था।
घर छोड़ते ही 15 साल के नरेंद्र मोदी परिवार के बंधनों से आजाद हो गए। उनका मकसद था आरएसएस और आरएसएस चीफ गुरु गोलवलकर का साथ। मोदी ने अपनी किताब में गोलवलकर की जमकर हिमायत की है और उनके सांप्रदायिक या फासिस्ट होने के आरोपों का करारा जवाब भी दिया है।
नरेंद्र मोदी कहते हैं कि किसी को ये नहीं भूलना चाहिए कि गोलवलकर कोई सांसद नहीं थे फिर भी उनकी मौत के बाद संसद ने उन्हें श्रद्धांजलि दी थी। पहले प्रचारक और फिर अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के सदस्य के बतौर मोदी धीरे-धीरे भगवा काडर में ऊपर उठते चले गए। इमरजेंसी के वक्त वो एक मजबूत संगठक के बतौर सामने आए। साथी बताते हैं कि यही वो वक्त था जिसने मोदी को गांधी परिवार के पूरी तरह खिलाफ कर दिया और यही वो वक्त था जिसके बाद गांधी परिवार की अगली पीढ़ियां उनके निशाने पर आ गईं।
ताज्जुब है कि मोदी के सबसे बड़े विरोधी गुजरात में उनके शासन को भी इमरजेंसी की सेंसरशिप के बरअक्स रखते हैं। जहां किसी भी तरह के विरोध की रत्ती भर गुंजाइश नहीं है। आर्गनाइजर मोदी की भूमिका ने उन्हें अपनी पार्टी में काफी ऊपर उठा दिया था। उनकी काबलियत आंककर उन्हें आडवाणी की स्वर्ण जयंती रथयात्रा का सारथी बना दिया गया। अरुण जेटली कहते हैं कि वो परफेक्शनिस्ट हैं। सत्ता के सीधे रास्ते पर आने के बावजूद नरेंद्र मोदी अपनी जीत को लेकर काफी पसोपेश में थे लेकिन वो जीते और 2001 में पहली बार गुजरात के मुख्यमंत्री का ताज भी पहना। मोदी कहते हैं कि मुझे तब तक चुनाव लड़ने का कोई अनुभव नहीं था।
पार्टी ने उन्हें सबसे पहले और सबसे बड़ा काम सौंपा अंदरूनी उठापटक का खात्मा लेकिन बीजेपी के इस नए खेवनहार के लिए हर तरफ चुनौतियां मुंह बाए खड़ी थीं। पार्टी हैवीवेट शंकरसिंह वाघेला से लेकर पूर्व मुख्यमंत्री केशूभाई पटेल और धुर दक्षिणपंथी विश्वहिंदू परिषद नेता प्रवीण तोगड़िया तक जो गुजरात को अपनी जागीर समझते थे। अगले आठ साल मोदी के लिए काफी मुश्किल भरे थे। उन्होंने चुन-चुनकर चुनौतियों से निपटना शुरू किया। पहले वाघेला कांग्रेस में घुसे। फिर केशूभाई पटेल खुद नेपथ्य में चले गए और तोगड़िया धीरे-धीरे खामोश हो गए।
गुजरात में सियासत का अब एक ही चेहरा दिखता है। कुछ की नजर में यही चेहरा गुजरात है और ये चेहरा है नरेंद्र मोदी। सड़कों पर बड़े-बड़े बिलबोर्ड्स पर उनकी मुस्कुराहट बिखरी दिखाई देती है। उनकी सरकार उनके बारे में सीडी जारी करती है और उन्हें ध्यान में रखकर बनाई गई एक गुजराती फिल्म 'गुजरात नो नाथ' को सरकार ने टैक्सफ्री भी कर दिया है। गुजरात की सरकार नरेंद्र मोदी की तुलना एक शेर से करती है जिसके पास बड़ा दिल ।
ये तय है कि मोदी अब ब्रैंड हैं और मोदी को ब्रैंड बनाया एक हादसे ने जिसकी याद आज भी हिंदुस्तान को दुख से भर देती है। नरेंद्र मोदी को मुख्यमंत्री बने महज कुछ महीने बीते थे कि गोधरा में साबरमती एक्सप्रेस जला दी गई। बस यहीं से मोदी का करियर, उनकी छवि और उनकी राजनीति शुरू हुई। साबरमती कांड के बाद गुजरात ही नहीं हिंदुस्तान की सियासत में दो नए शब्द जन्मे। गोधरा से पहले और गोधरा के बाद।
11 सौ लोगों की मौत, 300 औरतों से बलात्कार, सैकड़ों अनाथ बच्चे और हजारों बेघर। ये गोधरा का नतीजा था। मोदी पर आरोप है कि उनके पुलिसवाले या तो इसे खामोशी से देख रहे थे या उन्होंने बाकायदा उन्होंने गुजरात की लूट-खसोट में भीड़ की मदद की सच चाहे जो हो मोदी आज इस पर बात करने से कतराते हैं।
गोधरा बीत गया और इधर मोदी ने घातक चुप्पी इख्तियार कर ली। साफ था कि मोदी के दिल में दंगों के शिकार मुसलमानों के लिए कोई सहानुभूति नहीं थी और इस बात ने लोगों के दिल में उनके लिए जबर्दस्त नफरत पैदा कर दी। यहां तक कि उनकी ही पार्टी के सबसे बड़े नेता ने भी इसके लिए उन्हें फटकार लगाई। पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने साफ कहा था कि एक नेता को राजधर्म का पालन करना चाहिए। एक राजा अपनी प्रजा के बीच अंतर नहीं कर सकता।
मोदी के इस रुख को लेकर दुनिया भर में गुस्से की लहर थी। मगर उनके साथी उनका बचाव कर रहे थे। उनका कहना था कि मोदी के पास कोई विकल्प नहीं बचा था। अरुण जेटली कहते हैं कि गोधरा के बाद जो कुछ गुजरा, वो बहुत ही बुरा था और वो इस बुरी स्थिति में फंस गए थे।
कानून और सबूत उन्हें गोधरा का षड्यंत्रकारी कहें या महज एक दर्शक। मोदी ने लोगों की सोच को पलटने में कामयाबी हासिल कर ली थी और वो जल्द ही अपनी इस ताकत को पहचान भी गए।
नतीजतन राज्य विधानसभा चुनावों में वो भारी मतों से जीतकर पहुंचे। अपने जबर्दस्त हिंदू समर्थक अभियान के बाद वो हिंदू हृदय सम्राट के बतौर उभरते देखे गए। कभी ओट लेकर वो अल्पसंख्यकों पर वार करते तो कभी उन्होंने जानबूझकर पाकिस्तानी राष्ट्रपति को मियां कहकर बुलाया। हर जगह हमलावर भूमिका।
मोदी को यकीन था कि उनकी जीत उनके विरोधियों के मुंह बंद कर देगी और फिर मोदी गुजरात में अपने काम पर जुट गए। मोदी ने अपनी क्षमता का इस्तेमाल इस बार गुजरात का ब्रैंड स्थापित करने में किया। नारा था- वाइब्रैंट गुजरात लेकिन साथ ही वो खुद को राज्य के चीफ एग्जीक्यूटिव के बतौर पेश कर रहे थे।
अरुण जेटली कहते हैं कि उनका बहुत सा वक्त इंटरनेट पर बीतता है। उनके पास कोई निजी संपत्ति नहीं है। है तो सिर्फ उनका कंप्यूटर, कुछ किताबें और कुछ कुर्ते पाजामे। गुजरात की कामयाबियों को मोदी अपनी कामयाबी कहते हैं। उनकी शख्सियत के साथ राज्य की ये दोहरी ब्रैंडिंग तब पूरी हुई, जब रतन टाटा ने अपने नैनो प्लांट को सिंगूर से हटाकर सानंद में ले जाने का फैसला किया।
अब गुजरात में पैसा आ रहा है पर उसे अभी भी अंतर्राष्ट्रीय मंजूरी की दरकार है। चार साल पहले अमेरिका ने नरेंद्र मोदी को वीजा देने से इनकार कर दिया था। खुद नरेंद्र मोदी कम से कम दो बार अपनी इंग्लैंड यात्राएं रद्द कर चुके हैं। उन्हें डर था कि उन्हें वहां विरोध का सामना करना पड़ेगा।
आज मोदी का दावा है कि गुजरात के गांव-गांव में बिजली है। हर तालुका प्रमुख के घर ब्रॉडबैंड सुविधा है। नर्मदा पर बांध, साबरमती पर चैनल का निर्माण और हजारों छोटे-छोटे बांधों की बदौलत राज्य में जलस्तर 20 फीसदी ऊपर जा चुका है।
ये बात अलग है कि खुद मोदी के इलाके के घरों को आज भी पानी मयस्सर नहीं। शेरबानो अहमदाबाद के बाहरी हिस्से में रहती हैं। 2002 के दंगों में उनका सबकुछ खत्म हो गया। उनके घर के लोग आज भी गंदा पानी पीने को मजबूर हैं। परिवार की सेहत दांव पर है क्योंकि दंगा पीड़ितों के लिए जो पुनर्वास कॉलोनियां बनाई गईं। वहां पीने को यही पानी दिया गया।
शेरबानो कहती हैं कि हमारे लिए नौकरियां नहीं हैं। हमारे लिए कोई लोन नहीं। अगर आप सबके लिए कुछ न कुछ करते हैं तो आप हमारे लिए कुछ क्यों नहीं करते। क्या हम इंसान नहीं हैं। गुजरात की राजधानी का एक हिस्सा ऐसा भी है जहां नरेंद्र मोदी के सूरज की रोशनी नहीं पहुंचती। वाइब्रैंट गुजरात की नदियां पुनर्वास कॉलोनियों के दरवाजे पर आकर ठिठक जाती हैं। जहां 2002 के सैकड़ों दंगा पीड़ित अभी भी अपनी जिंदगियां ढो रहे हैं।
मोदी निजी तौर पर इन इलाकों का दौरा करने से कतराते हैं। दूसरी तरफ अल्पसंख्यकों के कल्याण के राजनीतिक वादे भी करते रहते हैं ताकि उनके वोटबैंक पर कोई असर न पड़े। पिछले महीने ही अहमदाबाद के इमाम ने उनके नाम पर मुहर लगाई है। मोदी ने अपनी पार्टी में एक पूर्व वरिष्ठ पुलिस अधिकारी अल सईद को जगह दी, जो 2002 का दंगा पीड़ित भी है। गुजरात में उन्होंने एक मुसलमान को डीजी पुलिस नियुक्त किया है।
गोधरा दंगों के बाद कई परिवारों ने गुजरात ही नहीं देश छोड़ दिया था। अब कुछ परिवार विदेशों से लौटे हैं। उनके मुताबिक मोदी के गुजरात में पिछले 7 साल में कोई दंगा नहीं हुआ इसलिए उन्हें यहां लौटने का कोई अफसोस नहीं है। दंगा पीड़ित फहीम कहते हैं कि हमारा तरीका है माफ करो और भूल जाओ और फिर आगे बढ़ जाओ। मगर गुजरात से बाहर मोदी की ये छवि किसी को प्रभावित नहीं करती। गुजरात से बाहर आने के लिए मोदी को अभी बहुत कुछ साबित करना बाकी है।
शायद ये मोदी के नाटकीय कायापलट का सबसे बड़ा और अहम काम होगा जो उन्हें करना बाकी है। उन्हें विकास के दावों के साथ साथ दंगों का दाग भी धोना है और यही इंसाफ उन्हें राष्ट्रीय राजनीति में वो जगह दिला पाएगा जिसका वो सपना देख रहे हैं।
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