नई दिल्ली। चुनाव खत्म हो गए और नेताओं के भविष्य का फैसला वोटिंग मशीनों में कैद है। एक बार फिर नेताओं के वादों की धूल उड़ी और जनता को ये विश्वास दिलाया गया कि उनकी सारी शिकायतें अब दूर हो जाएंगीं। लेकिन इसका हिसाब देने वाला कोई नहीं कि इन नेताओं के पिछले वादों का क्या होगा। 30 साल पहले ऐसा ही एक वादा किया गया था दिल्ली के हजारों किसानों से जो आज तक पूरा नहीं हुआ।
सरकार ने भूमिहीन किसानों को खेती के लिए जमीन देने की योजना बनाई थी। कई किसानों को योजना के तहत जमीन भी दी गई जिस पर मेहनत कर उन लोगों ने ज़मीन को खेली के लायक बनाया। यहां तक तो ठीक था लेकिन हो ये रहा है कि बहुत से लोगों को जमीन का मालिकाना हक नहीं दिया जा रहा है। ऐसे लोगों की लड़ाई लड़ रहे हैं सिटीजन जर्नलिस्ट विजय चौहान।
विजय चौहान दिल्ली के छावला गांव के रहने वाले हैं। 70 के दशक में इंदिरा गांधी ने 20 सूत्रीय कार्यक्रम पूरे भारत में लागू किया था जिसके तहत गरीब किसानों को कृषि भूमि मुफ्त देने की योजना बनाई गई थी।
20 सूत्रीय योजना के अनुसार दिल्ली में 5000 एकड़ जमीन गरीब किसानों को खेती के लिए बांटी गई थी। बरसों बाद महज़ 40 प्रतिशत लोगों को मालिकाना हक़ मिल पाया है बाकी 60 प्रतिशत लोग आज तक अपनी जमीन के मालिकाना हक की लड़ाई लड़ रहे हैं ।
विजय बताते हैं कि जब हमें ये जमीन दी गई थी उस समय ये ऊबड़ खाबड़ बंजर जमीन थी लोगों ने इस जमीन को खेती लायक बनाने के लिए काफी पैसा लगाया। यहां तक की कई लोगों ने अपने गहने तक बेच दिए।
कुछ समय तक पटवारी इन जमीनों की गिरदावरी भी देते थे यानी वो काग़ज़ जिस पर उस जमीन का पूरा ब्यौरा होता था कि जमीन किसके नाम पर है और उस जमीन पर खेती हो रही है या नहीं लेकिन। अब हमें वो भी नहीं मिलती। पटवारी खेती वाली जमीन को बंजर जमीन दिखा देता है।
सुप्रीम कोर्ट के अनुसार जो आदमी जमीन का लगान देता है वो उस दिन से ही जमीन का मालिक बन जाता है। हमें ये जमीन जब दी गई थी उसी समय हमने जमीन का लगान भर दिया था। अब हमें ये समझ नहीं आ रहा कि आखिर हमारे साथ ये सौतेला व्यवहार क्यों हो रहा है। सरकार खुद नियम बनाती है लेकिन अपने बनाए नियमों की भी उसे कोई परवाह नहीं।
इन जमीनों के मालिकाना हक के लिए 18 जुलाई 2002 को रेवेन्यू रिकॉर्ड में चढ़ाने के लिए दिल्ली विधान सभा में एक प्रस्तावित भी पास हुआ था। लेकिन आज तक इस पर कोई अमल नहीं हुआ। पीड़ितों ने कई बार इसकी शिकायत कई अधिकारियों से की। लेकिन अभी तक कोई कार्यवाही नहीं की गई।
हर बार चुनाव के दौरान मंत्री जी आते हैं और चुनाव के बाद जमीन पर मालिकाना हक आश्वासन देकर चले जाते हैं लेकिन लोग आज तक जमीन के मालिक नहीं बन पाए हैं।
विजय कहते हैं -हमने कई बार इस सिलसिले में दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित से भी अपील की। लेकिन वहां से भी हमें केवल आश्वासन के अलावा कुछ नहीं मिला। 2002 में महिपाल पुर चौक में शीला दीक्षित ने ये घोषणा की थी कि चुनाव के बाद लोगों को मालिकाना हक मिल जाएगा लेकिन हुआ कुछ नहीं। हर बार की तरह हमें फिर से वोट के लिए छला गया। जब इस सिलसिले में हमने शीला दीक्षित से एक बार फिर बात की तो उन्होंने उल्टे हम पर ये आरोप लगा दिया कि हमारे पास कागज़ ही पूरे नहीं है।
विजय बताते हैं कि शीला जी ने फिर वही झूठी जानकारी दी जो वो पिछले 7 सालों से देती आ रही हैं। उनका दावा है कि लोगों के पास कागजात पूरे नहीं है जबकि विजय समेत 40 आदमियों के कागजात विजय के पास हैं। अब विजय ये जानना चाह रहे हैं कि आखिर कौन सी सरकारी एजंसी ये तय करेगी कि कागजात पूरे हैं या अधूरे। और अधूरे हैं तो इनमें क्या कमियां हैं।












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