नई दिल्ली। लोकसभा में विश्वास मत प्रस्ताव पर आज बहस के दौरान सदन में विपक्ष के नेता लालकृष्ण आडवाणी ने यूपीए सरकार को ही विश्वास प्रस्ताव की बहस के लिए ज़िम्मेदार ठहराया।
प्रधानमंत्री पर हमला करते हुए आडवाणी ने कहा कि कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी की मंजूरी के बिना आप एक कदम भी नहीं बढ़ सकते।
मनमोहन सिंह को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि इस तरह का विशेष सत्र बुलाने का दोष कृपया किसी अन्य पर ना मढ़े। भारतीय संसद के इतिहास में यह पहला मौका है, जब एक अल्पमत सरकार को बने रहने की अनुमति दी गई है। अगर किसी को दोषी ठहराया जा सकता है, तो वह स्वयं आपकी सरकार है।
आडवाणी का साफ तौर पर कहना था कि चुनाव से कुछ महीने पहले यदि ये बहस हो रही है तो इसकी ज़िम्मेदार सरकार ख़ुद है और प्रधानमंत्री जी विशेष तौर पर है। एक साल पहले जब उन्होंने एक अख़बार को इंटरव्यू में कहा कि यदि वाम मोर्चा परमाणु समझौते से सहमत नहीं तो वह जो फ़ैसला करने चाहे कर सकता है. तब से लेकर पिछले एक साल तक सरकार को जैसे लकवा ही मारा रहा है।
साथ ही आडवाणी ने ये भी कहा कि यूपीए सरकार को अस्पताल के आईसीयू में भर्ती मरीज़ की तरह है और स्वाभाविक है कि ये सवाल पूछा जाए कि क्या ये मरीज़ बचेगा या नहीं?
उन्होंने पूर्व प्रधानमंत्रियों चंद्रशेखर, एच.डी. देवगौड़ा और आई. के गुजराल की सरकारों का उदाहरण देते हुए कहा कि हम सरकार को हराना चाहते हैं न कि उसे अस्थिर करना चाहते हैं।
उधर मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के नेता मोहम्मद सलीम ने बहस में हिस्सा लेते हुए यूपीए को निशाना बनाया और कहा कि सवाल विश्वसनीयता का है। उन्होंने कहा, "प्रधानमंत्री यह कह कर विश्वास प्रस्ताव लाए कि सदन को मंत्रिपरिषद में विश्वास है। लेकिन सवाल यहां विश्वसनीयता का ही है औऱ विश्वास तोड़ा गया है।
सलीम का कहना था कि यह सभी जानते हैं कि कई नीतियों पर कांग्रेस और वाम दलों के मतभेद हैं मसलन विनिवेश, आर्थिक नीति लेकिन विदेश नीति के मसले पर कांग्रेस अपनी ही नेताओं के सुझाए हुए रास्ते का विरोध करेगी।
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