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देखें: मनमोहन के कैबिनेट मंत्रियों का लेखा-जोखा

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Posted on May 22, 2009 at 07:41pm IST | Updated May 22, 2009 at 09:08pm IST

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नई दिल्ली। डॉ. मनमोहन सिंह ने लगातार दूसरी बार देश के प्रधानमंत्री के रूप में शुक्रवार को शपथ लेकर एक बार फिर राष्ट्र की बागडोर अपने हाथों में थाम ली है। राष्ट्रपति प्रतिभा देवीसिंह पाटिल ने मनमोहन सिंह के अलावा 19 मंत्रियों को पद व गोपनीयता की शपथ दिलाई।

मनमोहन सिंह

आर्थिक सुधारों के जनक एवं देश को ‘परमाणु वनवास’ से उबारने वाले कुशल प्रशासक मनमोहन सिंह लगातार दूसरी बार प्रधानमंत्री का दायित्व संभाला।

लोकसभा चुनाव 2009 में मिली जीत के बाद वह जवाहरलाल नेहरु के बाद भारत के पहले ऐसे प्रधानमंत्री बन गए हैं, जिन्हें पांच वर्षों का कार्यकाल सफलतापूर्वक पूरा करने के बाद लगातार दूसरी बार प्रधानमंत्री बनने का मौका मिला है।

उन्होंने 21 जून 1991 से 16 मई 1996 तक नरसिम्हाराव के प्रधानमंत्रित्व काल में वित्तमंत्री के रुप में भी कार्य किया है। वित्तमंत्री के रुप में उन्होंने भारत में आर्थिक सुधारों की शुरआत की।

डॉ. सिंह को सही मायनों में एक विचारक और विद्वान के रुप में जयजयकार मिली है। अपनी कर्मठता और कार्य के प्रति अपने शैक्षणिक दृष्टिकोण के साथ-साथ स्पष्टवादिता और आडंबरविहीन आचरण के लिए जाने जाने वाले डॉ. सिंह का जन्म 26 सितम्बर 1932 को अविभाजित भारत के पंजाब प्रांत के गांव गाह में हुआ था। जो इस समय पाकिस्तान में है।

उन्होंने वर्ष 1948 में पंजाब विश्वविद्यालय से मैट्रिकुलेशन की परीक्षा उत्तीर्ण की। उनके शैक्षणिक जीवन ने उन्हें पंजाब से कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय पहुंचाया। जहां उन्होंने वर्ष 1957 में अर्थशास्त्र में प्रथम श्रेणी में स्नातक डिग्री हासिल की। इसके पश्चात वर्ष 1962 में ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय के नफील्ड कॉलेज से अर्थशास्त्र में डी.फिल किया।

डॉ. सिंह ने अपनी पुस्तक ‘इंडियाज एक्सपोर्ट ट्रेन्डस एण्ड प्रोस्पेक्टस फॉर सेल्फ सस्टेन्ड ग्रोथ’ में भारत के आंतरिक व्यापार पर केन्द्रित नीति की प्रारंभिक समीक्षा की थी। यह पुस्तक इस संबंध में पहली और सटीक आलोचना मानी जाती है।

डॉ. सिंह ने अर्थशास्त्र के अध्यापक के तौर पर काफी ख्याति अर्जित की। वह पंजाब विश्वविद्यालय और बाद प्रतिष्ठित दिल्ली स्कूल ऑफ इकनॉमिक्स में प्राध्यापक रहे। इसी बीच वह अंकटाड सचिवालय में सलाहकार भी रहे और 1987 तथा 1990 में जिनेवा में संयुक्त कमिशन में सचिव रहे।

1971 में डॉ. सिंह को वाणिज्य मंत्रालय में आर्थिक सलाहकार तथा 1972 में वित्त मंत्रालय में मुख्य आर्थिक सलाहकार बनाया गया।

इसके बाद के वर्षों में वह योजना आयोग के उपाध्यक्ष, रिजर्व बैंक के गवर्नर, प्रधानमंत्री के सलाहकार और विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के अध्यक्ष रहे।

भारत के आर्थिक इतिहास में हाल के वर्षों में सबसे महत्वपूर्ण मोड़ तब आया जब डॉ. सिंह 1991 से 1996 तक भारत के वित्तमंत्री रहे। उन्हें भारत के आर्थिक सुधारों का प्रणेता माना जाता है।

डॉ. सिंह को उनके सार्वजनिक जीवन में प्रदान किए गए कई पुरस्कारों और सम्मानों में देश का दूसरा सर्वोच्च नागरिक सम्मान ‘पद्म विभूषण’, भारतीय विज्ञान कांग्रेस का ‘जवाहरलाल नेहरु जन्म शताब्दी पुरस्कार’, वित्तमंत्री के लिए ‘एशिया मनी एवॉर्ड’ और ‘यूरो मनी एवॉर्ड’, क्रैम्ब्रिज विश्वविद्यालय का ‘एडम स्मिथ पुरस्कार’ और कैम्ब्रिज में सेंट जॉन्स कॉलेज में विशिष्ट कार्य के लिए ‘रॉयटर्स पुरस्कार’ प्रमुख थे।

डॉ. सिंह को जापानी निहोन कीजई शिमबन सहित अन्य कई संस्थाओं से भी सम्मान प्राप्त हो चुका है।

डॉ. सिंह ने कई अंतरराष्ट्रीय सम्मेलनों और अनेक अंतरराष्ट्रीय संगठनों में भारत का प्रतिनिधत्व किया है। उन्होंने साइप्रस में आयोजित सरकार के राष्ट्रमंडल प्रमुखों की बैठक (1993) में और वर्ष 1993 में वियना में आयोजित मानवाधिकार पर विश्व सम्मेलन में भारतीय शिष्टमंडल का नेतृत्व किया है।

अपने राजनीतिक जीवन में डॉ. सिंह वर्ष 1991 से भारत के संसद और ऊपरी सदन (राज्यसभा) के सदस्य रहे हैं, जहां वह वर्ष 1998 और 2004 के दौरान विपक्ष के नेता थे।

डॉ. सिंह की तीन पुत्रियां हैं। अविभाजित भारत के पंजाब प्रांत में 26 सितम्बर 1932 को जन्में डा. मनमोहन सिंह ने पांच साल पहले भी 22 मई के दिन ही पहली बार प्रधानमंत्री पद की शपथ ली थी।

ममता बनर्जी

लोकसभा चुनाव में पश्चिम बंगाल में वामपंथियों का किला ध्वस्त करने वाली तृणमूल कांग्रेस की अध्यक्ष ममता बनर्जी की पांच वर्षो के बाद केंद्रीय मंत्रिपरिषद में वापसी हुई है। 'दीदी' के नाम से मशहूर 54 वर्षीय ममता बनर्जी इससे पहले पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) सरकार में मंत्री थी। उस सरकार में वह रेल मंत्रालय की जिम्मेदारी भी संभाल चुकी हैं। वामपंथियों का गढ़ कहे जाने वाले पश्चिम बंगाल में मार्क्‍सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा) के कद्दावर नेता सोमनाथ चटर्जी को जादवपुर संसदीय सीट से पराजित कर ममता ने अपनी संसदीय पारी की धमाकेदार शुरुआत की थी।

हाल ही में संपन्न हुए लोकसभा चुनाव में ममती की आंधी ने वामपंथियों का किला लगभग पूरी तरह ढहा दिया। तृणमूल कांग्रेस को 19 सीटों पर सफलता मिली। वर्ष 1977 के बाद पहली बार वामपंथियों को राज्य में लोकसभा चुनाव में इतनी बुरी पराजय का सामना करना पड़ा। वर्ष 2004 के लोकसभा चुनाव में वामपंथी दलों को 35 सीटों पर सफलता मिली थी। कांग्रेस को छह और तृणमूल को एक ही सीट से संतोष करना पड़ा था। उल्लेखनीय है कि पिछले 32 वर्षो से प्रदेश में वामपंथी शासन है। ममता की कोशिश वर्ष 2011 में होने वाले राज्य विधानसभा के चुनाव में वामपंथी दलों को सत्ता से बाहर करना है।

सीपी जोशी

पेशे से मनोविज्ञान के प्रोफेसर सी. पी. जोशी पहली बार केंद्र सरकार में मंत्री बने हैं। राजस्थान विधानसभा चुनाव के बाद लोकसभा चुनाव में राजस्थान में कांग्रेस को शानदार जीत दिलाने में अहम भूमिका निभाने वाले जोशी को कांग्रेस ने केंद्र में कैबिनेट मंत्री का पद देने का फैसला कर उन्हें उनकी मेहनत का ईनाम दिया है। 58 वर्षीय जोशी भीलवाड़ा संसदीय सीट से चुनाव जीतकर लोकसभा पहुंचे हैं। विधानसभा व लोकसभा चुनाव के दौरान वह प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष थे। उनकी अध्यक्षता में कांग्रेस ने प्रदेश की 25 संसदीय सीटों में से 19 पर जीत दर्ज की है। वर्ष 1998 से 2003 के दौरान वह तत्कालीन मुख्यमंत्री अशोक गहलोत की मंत्रिपरिषद में कई महत्वपूर्ण मंत्रालयों की जिम्मेदारी संभाल चुके हैं।

एस. एम. कृष्णा

कर्नाटक के मुख्यमंत्री रह चुके एस. एम. कृष्णा पहली बार केंद्र सरकार में कैबिनेट मंत्री को ओहदा संभाल रहे हैं। इससे पहले वह केंद्र सरकार में राज्य मंत्री रह चुके हैं। 77 वर्षीय कृष्णा अपनी लंबी राजनीतिक पारी के दौरान कई महत्वपूर्ण पदों को सुशोभित कर चुके हैं। वह महाराष्ट्र के राज्यपाल भी रह चुके हैं। वह लोकसभा में कर्नाटक के मांड्या संसदीय सीट का कई बार प्रतिनिधित्व कर चुके हैं। अमेरिका में पढ़ाई करने वाले कृष्णा को प्रशासनिक, अंतर्राष्ट्रीय कानून और आर्थिक कूटनीति के क्षेत्र का जानकार माना जाता है। केंद्र सरकार में वह उद्योग राज्यमंत्री और वित्त राज्यमंत्री रह चुके हैं। वर्ष 1989 से 1992 तक वह कर्नाटक विधानसभा के अध्यक्ष भी रह चुके हैं।

एम. वीरप्पा मोइली

एम. वीरप्पा मोइली ने पिछले 30 वर्षों के अपने राजनीतिक सफर में कर्नाटक का मुख्यमंत्री बनने से लेकर कांग्रेस महासचिव और कांग्रेस प्रवक्ता का पद संभाला है। हालांकि इस लंबी राजनीतिक पारी में वह पहली बार लोकसभा पहुंचे हैं। कर्नाटक के दक्षिण कन्नड़ जिले के मारपाड़ी गांव में जन्मे मोइली 2009 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस के सबसे परिचित चेहरों में एक रहे। पार्टी के प्रवक्ता के रूप में उन्होंने प्रतिद्वंद्वियों के आरोपों के सटीक जवाब दिए और कांग्रेस की आवाज बुलंद की। मोइली 1992 से 1994 तक कर्नाटक के मुख्यमंत्री रहे। इससे पहले राज्य विधानसभा में 1983 से 85 तक वह विपक्ष के नेता रहे। पेश से वकील मोइली ने कई किताबें भी लिखी है। शिक्षा के क्षेत्र में उन्होंने कई महत्वपूर्ण काम किए हैं। वह द्वितीय प्रशासनिक सुधार आयोग के अध्यक्ष भी हैं। बहरहाल, मोइली पहली बार लोकसभा पहुंचे हैं।

सुशील कुमार शिंदे

दलित और पिछडे़ वर्ग के परिवार में जन्मे तथा अदालत में एक अर्दली से लेकर संसद तक पहुंचने वाले सुशील कुमार शिंदे ने महाराष्ट्र विधानसभा के सदस्य के रूप में 1974 से संसदीय जीवन की शुरुआत की और वहां जुलाई 1992 तक विभिन्न विभागों के मंत्री और फिर राज्य के मुख्यमंत्री पद की जिम्मेवारी संभाल चुके हैं। जुलाई 1992 में राज्यसभा सांसद बने। उसके बाद 2004 तक लोकसभा के सदस्य और अक्तूबर 2004 के बाद दोबारा महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री बनाए गए। बाद में उन्हें नवम्बर 2004 में आंध्र प्रदेश में राज्यपाल बनाकर भेजा गया।

29 जनवरी 2006 के बाद से मनमोहन सिंह सरकार में उनको ऊर्जा मंत्री बनाया गया। वे मराठी और हिन्दी की कई पुस्तकों के लेखक हैं।

गुलाम नबी आजाद

डॉ. मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाले मंत्रिमंडल में दूसरी बार शामिल हुए गुलाम नबी आजाद कांग्रेस के सबसे वरिष्ठ और अनुभवी नेताओं में शुमार होते हैं। असाधारण सांगठनिक क्षमता के धनी आजाद को कांग्रेस में बड़े संकटमोचक के रूप में भी जाना जाता है। कांग्रेस में नौ बार महासचिव बने आजाद पार्टी की सबसे ताकतबर समझी जाने वाली इकाई कांग्रेस कार्यसमिति के 18 वर्ष तक सदस्य रहे चुके हैं।

सात मार्च 1949 को जम्मू कश्मीर के एक साधारण किसान परिवार में जन्मे आजाद ने डोडा जिले में ब्लॉक कांग्रेस कमेटी के सदस्य के रूप में राजनीति शुरू की और राज्य में विधायक तथा वर्ष 2005 में मुख्यमंत्री बने। वर्ष 1980 में युवा कांग्रेस के अध्यक्ष नियुक्त हुए और इस पद पर पहुंचने वाले वह देश में अल्पसंख्यक समुदाय के पहले नेता बने। महाराष्ट्र के वसीम से लोकसभा के लिए चुने जाने के बाद उन्हें 1982 में कानून, न्याय तथा कंपनी मामलों के मंत्रालय में राज्य मंत्री की जिम्मेदारी सौंपी गई।

आजाद 1984 में आठवीं लोकसभा के लिए फिर संसद में पहुंचे और 1990 में उन्हें राज्यसभा सदस्य बनाया गया। उन्हें पूर्व प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव की गठबंधन सरकार में संसदीय मामलों तथा नागरिक उड्डयन मंत्रालय की जिम्मेदारी सौंपी गई। डॉ. मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली संप्रग सरकार में उन्हें फिर संसदीय मामलों का मंत्री बनाया गया। 27 अक्टूबर 2005 को उन्हें जम्मू कश्मीर का मुख्यमंत्री नियुक्त किया गया और सात जुलाई 2008 तक वह इस पद पर बने रहे। कांग्रेस ने जम्मू कश्मीर विधानसभा का 2002 का चुनाव उन्हीं के नेतृत्व में लड़ा था और इसमें पार्टी को भारी सफलता मिली थी। 15 वें लोकसभा चुनाव में आजाद को तमिलनाडु में पार्टी का कार्यभार सौंपा गया था जिसे उन्होंने बखूबी निभाते हुये अपने गठबंधन को भारी सफलता दिलायी।

शरद पवार

शरद पवार का जन्म 12 दिसम्बर 1940 को महाराष्ट्र के पुणे जिले के बारामती में हुआ। अब तक वह बारामती निर्वाचन क्षेत्र से लोकसभा के निर्वाचित होते रहे हैं लेकिन इस बार उन्होंने यह सीट अपनी बेटी सुप्रिया सुले के लिये छोड़ दी और वह स्वयं माढा से निर्वाचित हुये। पवार महाराष्ट्र की मराठा राजनीति के प्रमुख स्तंभ हैं तथा सहकारिता आंदोलन में भी उनका खासा दबदबा है। महाराष्ट्र की राजनीति में खासा दखल रखने वाले पवार पिछली संप्रग सरकार में कृषि मंत्री के अलावा उपभोक्ता मामलों और खाद्य और लोक वितरण विभाग में भी मंत्री रह चुके हैं। उनका पूरा नाम शरद चंद्र गोविंद राव पवार है। वह पेशे से किसान हैं। उन्होंने कॉमर्स में स्नातक की उपाधि हासिल की है। 1967 में वे महाराष्ट्र विधानसभा के सदस्य बने। वे चार बार राज्य के मुख्यमंत्री रह चुके हैं और छह बार लोकसभा के लिए चुने जा चुके हैं। कांग्रेस के साथ उनके रिश्ते बनते बिगड़ते रहे हैं। 1999में उन्होंने विदेशी मूल के पीएम के मुद्दे पर कांग्रेस छोड़कर राष्ट्रवादी कांग्रेस बनायी फिलहाल वह इस पार्टी के अध्यक्ष हैं। शरद पवार ने प्रतिभा पवार से विवाह किया है। उनकी बेटी सुप्रिया सुले को भी केन्द्रीय मंत्रिमंडल में स्थान मिल सकता है।

ए के एंटनी

निवर्तमान संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार में रक्षा मंत्री रहे वरिष्ठ कांग्रेसी नेता ए के एंटनी का पूरा नाम अर्कापरंबिल कुरियन एंटनी है। उनका जन्म केरल में अलप्पुझा जिले के चेरथला तालुक में 28 दिसंबर 1940 को एक सीरियन कैथोलिक परिवार में हुआ था। महज 37 साल की उम्र में 1977 में केरल के मुख्यमंत्री बन कर देश के सबसे युवा मुख्यमंत्री होने का रिकॉर्ड कायम करने वाले एंटनी ने चेरथला में प्रारंभिक शिक्षा पूरी की। इसके बाद उन्होंने कला स्नातक की डिग्री अर्नाकुलम स्थित महाराजा मेडिकल कॉलेज से हासिल की। इसके बाद अर्नाकुलम में गवर्नमेंट ला कॉलेज से एंटनी ने कानून की पढ़ाई की। उन्होंने चेरथला से छात्र राजनीति में प्रवेश किया और राज्य में छात्र आंदोलन के जरिये वह केरल स्टूडेंट यूनियन के प्रमुख नेता के रूप में उभरे। सामाजिक मसलों को सूझबूझ के साथ उठाने की उनकी समझ को देखते हुये वह केएसयू के अध्यक्ष बने और इसके बाद राजनीति में उन्होंने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। सन1970 में वह पहली बार कांग्रेस के टिकट पर विधायक बने और पार्टी से युवाओं को जोड़ने का काम बखूबी किया। कांग्रेस नेतृत्व ने भी उनकी इस प्रतिभा को परखते हुए एंटनी को प्रदेश युवा कांग्रेस का अध्यक्ष मनोनीत किया और 27 अप्रैल 1977 को केरल के मुख्यमंत्री बनने से पहले उन्हें प्रदेश कांग्रेस का अध्यक्ष बनाया गया। पार्टी के इतिहास में सबसे युवा प्रदेश अध्यक्ष होने के बावजूद उन्होंने इस जिम्मेदारी को बखूबी निभाते हुये अथक परिश्रम के बूते पार्टी को सत्ता तक पहुंचाया। अब तक तीन बार राज्य के मुख्यमंत्री रहे एंटनी का पहला कार्यकाल 27 अक्टूबर 1978 तक रहा। इसके बाद 1984 से कांग्रेस के महासचिव नियुक्त किये जाने पर वह राष्ट्रीय राजनीति में आ गये। हालांकि पार्टी हाईकमान ने 1995 में उन्हें फिर केरल में पार्टी की कमान सौंपी और वह 22 मार्च 1995 को दोबारा मुख्यमंत्री बने। इस बार भी उन्हें इस पद पर महज एक साल तक ही रहने का मौका मिला और 09 मई 1996 तक वह इस पद पर रहे। इसके बाद 1996 से 2001 तक वह राज्य विधानसभा में विपक्ष के नेता रहे। तीसरी बार एंटनी 17 मई 2001 को मुख्यमंत्री बने तथा 29 अगस्त 2004 तक राज्य की सत्ता का नेतृत्व किया। मुख्यमंत्री के रूप में यह उनका सबसे लंबा कार्यकाल था। फिलहाल कांग्रेस कार्यसमिति के सदस्य होने के अलावा वह कर्नाटक के प्रभारी भी हैं। 2004 में पार्टी की अंदरूनी कलह के कारण मुख्यमंत्री पद छोड़ने के बाद प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने एंटनी को 2005 में अपने मंत्रिमंडल में शामिल कर रक्षा मंत्री बनाया। 1985 से 1995 तक वह दो बार लोकसभा के सदस्य भी रहे। इस दौरान राजीव गांधी तथा नरसिंहा राव की सरकारों में वह नागरिक आपूर्ति उपभोक्ता मामलों और सार्वजनिक वितरण मामलों के मंत्री बनाये गये। रक्षा मंत्री के रूप में भी उन्होंने रक्षा सौदों में बिचौलियों की भूमिका को समाप्त करने का ठोस फैसला लिया। रक्षा उपकरणों की अनावश्यक कीमत बढ़ाने वाले बिचौलियों की छुट्टी करने वाले उनके इस साहसिक फैसले की सर्वत्र तारीफ की गयी। सार्वजनिक जीवन में वास्तविकता के मद्देनजर कठोर फैसले लेने वाले एंटनी कांग्रेस के अनुशासन समिति के भी अध्यक्ष हैं।

पी चिदम्बरम

तमिलनाडु में शिवगंगा जिले के कनाडुकतम गांव में 16 सिंतबर 1945 को राज परिवार में जन्मे चिदंबरम ने चेन्नई के प्रेसिडेंसी कॉलेज से विज्ञान स्नातक की उपाधि लेने के बाद मद्रास विश्वविद्यालय के ला कॉलेज से विधि स्नातक की उपाधि भी हासिल की। वर्ष 1968 में उन्होंने हार्वर्ड बिजनेस स्कूल से एमबीए किया। वर्ष 1969 में वकालत का पेशा अपनाने वाले चिंदबरम को वर्ष 1984 में वरिष्ठ वकील का दर्जा दिया गया।

मद्रास उच्च न्यायालय के साथ ही उच्चतम न्यायालय में भी वकालत करने वाले चिदंबरम ने देश की कई अन्य अदालतों में भी वकालत की है। वर्ष 1984 में उन्होंने कांग्रेस के टिकट पर शिवगंगा संसदीय क्षेत्र में पहला चुनाव लड़ा और उसमें जीत हासिल करने के बाद राजीव गांधी सरकार में उप मंत्री बने।

इसके बाद विभिन्न सरकारों में वाणिज्य एवं वित्त विभाग संभाल चुके चिदंबरम गत लोकसभा चुनाव के बाद केन्द्र में बनी संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (यूपीए) सरकार में भी वित्त मंत्री बने।

गत 26 नवंबर को मुंबई में हुये आतंकी हमले के दौरान तत्कालीन गृह मंत्री शिवराज पाटिल के भारी दबाव के कारण इस्तीफा देने के बाद तत्कालीन वित्त मंत्री चिदंबरम को गृह मंत्रालय का दायित्व सौंपा गया था। संकट की घड़ी में उन्होंने सुरक्षा एजेंसियों और खुफिया एजेंसियों के बीच तालमेल बनाने और कानून व्यवस्था की स्थिति को लेकर राज्यों के साथ भी बेहतर रिश्ते बनाये रखने का प्रयास करके वित्त मंत्री वाली उपलब्धि गृह मंत्री के रूप में भी हासिल की।

कपिल सिब्बल

पेशे से वकील और शायर मिजाज कपिल सिब्बल पिछली संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार में विज्ञान और प्रौद्योगिकी एवं पृथ्वी विज्ञान मंत्री रह चुके हैं। वे कांग्रेस के प्रवक्ता भी रह चुके हैं। आठ अगस्त 1948 को पंजाब के जालंधर में जन्मे कपिल की शिक्षा दीक्षा दिल्ली और अमेरिका में हुई है। भारत के अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल रह चुके सिब्बल एक कवि भी हैं और अगस्त 2008 में आई विटनेस शीर्षक से उनका एक कविता संग्रह भी प्रकाशित हो चुका है। वे पहले भारतीय मंत्री हैं जो कि अंटार्कटिका पर जा चुके हैं। कपिल दिल्ली के चांदनी चौक इलाके से लोकसभा के लिये निर्वाचित हुये हैं। पिछले लोकसभा चुनाव में भी उन्होंने वहां कांग्रेस के टिकट पर मशहूर टेलीविजन कलाकार और भाजपा प्रत्याशी स्मृति ईरानी को भारी मतों से पराजित किया था। उनके प्रयासों से अंटार्कटिका में जुलाई 2008 में हिमाद्री नामक भारतीय अनुसंधान केन्द्र स्थापित किया गया।

अंबिका सोनी

कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी की नजदीकी अम्बिका सोनी ने आज दूसरी बार मंत्री पद संभाला है। पिछली सरकार में बतौर पर्यटन एवं संस्कृति मंत्री उन्होंने इन्क्रेडिबल इंडिया की अच्छी मार्केटिंग की। विदेशी पर्यटकों को भारत की ओर आकर्षित करने में उन्होंने 12 से 14 प्रतिशत की वृद्धि दर हासिल की। सोनी ने पर्यटकों पर हमलों का मामला राज्यों के साथ उठाया और राज्यों को पर्यटन पुलिस बलों की स्थापना के लिये तैयार किया। 13 नवम्बर 1943 को लाहौर में जन्मी अम्बिका के दिवंगत पिता भारतीय सिविल सेवा के अधिकारी थे। सोनी ने अपनी शिक्षा दीक्षा दिल्ली विश्वविद्यालय के इन्द्रप्रस्थ कॉलेज और क्यूबा में हवाना विश्वविद्यालय में हासिल की। सोनी पिछले लगभग 35 वर्ष से पूरी वफादारी से कांग्रेस से जुड़ी हुई हैं। उनकी इसी वफादारी और संगठन के प्रति समर्पण के मद्देनजर उन्हें पिछली बार मंत्री पद दिया गया था। वह पहली बार 1975 में युवा कांग्रेस की अध्यक्ष बनीं। 1976 में वह राज्यसभा की सदस्य बनीं और 1998 में पार्टी ने उन्हें अखिल भारतीय महिला कांग्रेस की अध्यक्ष बनाया। इसके अगले वर्ष उन्हें अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी की महासचिव की जिम्मेदारी सौंपी गई। वर्ष 2004 में वह फिर राज्यसभा में आईं। पिछली सरकार में वह पर्यटन एवं संस्कृति मंत्री रहीं। इस बीच वह कई समितियों की सदस्य रह चुकी हैं। सोनी ने अक्टूबर 1961 में उदय सी सोनी से विवाह किया1 उनके एक पुत्र है।

मीरा कुमार

भारतीय राजनीति को लंबे समय तक प्रभावित करने बाले बाबू जगजीवन राम के घर में पली-बढ़ीं उनकी बेटी मीरा कुमार पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी के प्रयास और प्रेरणा से विदेश सेवा को छोड़ राजनीति में आयीं। वह कांग्रेस के टिकट पर पहली बार 1985 में उत्तर प्रदेश के बिजनौर लोकसभा क्षेत्र से उप चुनाव लड़ीं और मायावती तथा रामविलास पासवान को पराजित कर राजनीति में धमाकेदार शुरुआत की।

31 मार्च 1945 को जन्मी मीरा कुमार की प्रारंभिक शिक्षा दिल्ली के महारानी गायत्री देवी स्कूल में हुई। उन्होंने 1968 में दिल्ली विश्वविद्यालय से अंग्रेजी में स्नातकोत्तर की डिग्री ली। वर्ष 1971 में वह विदेश सेवा मे आयीं। मीरा कुमार पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी के प्रयास से 1990 में अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी की महासचिव बनीं। वह 1996 में दिल्ली के करोलबाग से सांसद चुनी गयीं। मीरा कुमार वर्ष 1968 में बिहार की पहली महिला कैबिनेट मंत्री सुमित्रा देवी के बड़े पुत्र मंजुल कुमार से परिणय सूत्र मे बंधीं।

मीरा कुमार बिहार से पहली बार 2004 के लोकसभा चुनाव में सासाराम सीट से कांग्रेस के टिकट पर सांसद चुनी गयीं। इसके बाद इसी क्षेत्र से पुनः एक बार फिर कांग्रेस के टिकट पर चुनाव जीत कर सांसद बनी हैं। इस सीट से उनके पिता बाबू जगजीवन राम 1952 से लेकर 1984 तक लोकसभा चुनाव जीतने मे सफल रहे थे। मीरा कुमार पिछली सरकार में सामाजिक न्याय और आधिकारिता मंत्री थीं।

मुरली देवड़ा

राज्यसभा सदस्य मुरली देवड़ा ने अपने राजनीतिक जीवन की शुरुआत मुंबई नगर निगम में एक पार्षद के रुप में की थी। पिछली संप्रग सरकार में पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्री के रुप में अंतर्राष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल के आसमान छूते दाम और घरेलू बाजार की खुदरा कीमतों के बीच संतुलन बिठाने में उनकी भूमिका काफी चर्चा में रही।

महाराष्ट्र की राजधानी मुंबई में 10 जनवरी 1937 को जन्मे देवड़ा की शिक्षा दीक्षा स्नातक तक हुई जिसके बाद उन्होंने राजनीति और सामाजिक क्षेत्र में काम करना शुरू किया। वह उद्योगपति भी हैं। उनके पुत्र मिलिंद देवड़ा लगातार दूसरी बार लोकसभा के लिए चुने गये हैं।

देवड़ा पहली बार 1968 से 1978 तक मुंबई नगर निगम में पार्षद और मुंबई के मेयर बने। उसके बाद 1982 से तीन साल तक वह महाराष्ट्र विधानसभा में विधायक भी रहे। वर्ष 1985 में पहली बार वह आठवीं लोकसभा के लिये चुने गये। उसके बाद लगातार तीन बार वह लोकसभा के सांसद बने। वर्ष 1998 में वह फिर से 12वीं लोकसभा के लिये चुने गये। इस दौरान वह संसद की स्थायी समितियों के अध्यक्ष भी रहे। वर्ष 2002 में वह पहली बार राज्य सभा के सदस्य बने।

कमलनाथ

कमलनाथ ने अपनी स्कूली शिक्षा देहरादून के दून स्कूल से ग्रहण की और कोलकाता के सेंट जेवियर कॉलेज से वाणिज्य में स्नातक डिग्री प्राप्त की।

उन्होंने सांसद रहते हुए वर्ष 1982 और 1983 में संयुक्त राष्ट्र आम सभा में भारत का प्रतिनिधित्व किया था और वर्ष 1987 में निकारागुआ, वर्ष 1998 में ग्वाटेमाला और वर्ष 1990 में साइप्रस में आयोजित इंटरनेशल पार्लियामेंट्री यूनियन कॉन्प्रेंस में भाग लिया था। वे कुछ समय तक केन्द्र सरकार के उपक्रम आवास और शहरी विकास(हुडको) के बोर्ड के निदेशक भी रहे है।

कमलनाथ ने वर्ष 1991 में पेरिस में हुई विश्व फारेस्ट कॉन्फ्रेंस में भारतीय प्रतिनिधि मंडल का नेतृत्व किया था। इसके अलावा उन्होंने फिनलैंड, स्वीडन, जर्मनी, जापान, सिंगापुर, दुबई और इंग्लैंड में भी देश के प्रतिनिधि मंडल का नेतृत्व किया।

एस. जयपाल रेड्डी

केंद्रीय मंत्रिमंडल में लगातार दूसरी बार शामिल किए सुदिनी जयपाल रेड्डी 2002 में कांग्रेस के केंद्र में सत्तारुढ़ होने से पहले पार्टी के प्रवक्ता रहे। इससे पहले वह जनता दल और जनता पार्टी के प्रवक्ता रह चुके थे। आंध्र प्रदेश के मदगुल में 16 जनवरी 1942 को जन्में रेड्डी को ( सर्वश्रेष्ठ सांसद) के पुरस्कार से भी सम्मानित किया जा चुका है।

उस्मानिया विश्वविद्यालय से एम ए की डिग्री हासिल करने वाले रेड्डी 1969 से 1984 के दौरान आंध्रप्रदेश के कलवाकुर्ती क्षेत्र से चार बार विधायक रहे। उन्होंने 1975 में आपातकाल लगाये जाने का विरोध करते हुये कांग्रेस से त्यागपत्र दे दिया और 1977 में जनता पार्टी में शामिल हो गये। उन्होंने 1980 में मेडक से इंदिरा गांधी के विरुद्ध चुनाव लड़ा लेकिन उन्हें हार का मुंह देखना पडा1

वह पांचवीं बार लोकसभा के लिये चुने गये हैं। इससे पहले वह 1984, 1998, 1999 और 2004 में लोकसभा के लिये चुने जा चुके हैं। वह दो बार राज्यसभा के सदस्य रह चुके हैं। रेड्डी जून 1991 से जून 1992 तक राज्य सभा में विपक्ष के नेता रहे1

रेड्डी केंद्र में संयुक्त मोर्चा सरकार में मंत्री रह चुके हैं और पिछली मनमोहन सरकार में शहरी विकास मंत्री थे।

बी. के. हांडिक

सामाजिक कार्यकर्ता और उद्योगपति की भूमिकाएं निभाने वाले असम के जोरहाट से सांसद बिजय कृष्ण हांडिक पिछली सरकार में भी रक्षा, संसदीय मामलों, रसायन एवं उर्वरक राज्य मंत्रालयों का काम संभाल चुके हैं।

कांग्रेस से उनका नाता 35 साल पुराना है। जोरहाट की जिला कांग्रेस समिति के अध्यक्ष पद से लेकर अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के सदस्य। प्रदेश कांग्रेस कमेटी के उपाध्यक्ष और कई समितियों की सदस्य रह चुके है1

1980 से 86 तक वह राज्यसभा सदस्य थे। वह 1991, 1996, 1998, 1999, 2004 और 2009 में लोकसभा के लिए चुने जा चुके हैं।

हांडिक का जन्म एक दिसम्बर 1934 को जोरहाट में हुआ। उन्होंने कलकत्ता विश्वविद्यालय से एम.ए. की डिग्री हासिल की है।

आनंद शर्मा

छात्र आंदोलन और युवा राजनीति से उभरने वाले आनंद शर्मा ने राष्ट्रीय राजनीति में अपनी महत्वपूर्ण पहचान बनाई है। आज शपथ ग्रहण करने वाली मनमोहन सरकार में उन्हें कैबिनेट मंत्री के रुप में शामिल किया गया। इससे पूर्व वह मनमोहन सरकार में विदेश राज्य मंत्री और सूचना एवं प्रसारण राज्य मंत्री का दायित्व सफलता पूर्वक संभाल चुके हैं।

आनंद शर्मा का जन्म हिमाचल प्रदेश के शिमला में पांच जनवरी 1953 को हुआ था। वह छात्र एवं युवा आंदोलन के प्रमुख नेता रहे हैं। वह कांग्रेस के छात्र संगठन एनएसयूआई के संस्थापकों में से एक हैं। पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी के करीबी रहे आनंद शर्मा हिमाचल प्रदेश की भारतीय युवक कांग्रेस के अध्यक्ष और महासचिव रहने के बाद इस संगठन के राष्ट्रीय अध्यक्ष रहे। उन्होंने शिमला से शिक्षा प्राप्त की और 31 साल की उम्र में पहली बार संसद के लिये चुने गये।

वायलार रवि

लम्बे समय तक केरल की राजनीति में विधायक और मंत्री की भूमिका निभाने वाले वायलार रवि ने इस बार फिर प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की टीम में दूसरी बार शामिल हुए है।

केरल के अलप्पूजहा में चार जून 1937 को जन्मे रवि केरल स्टूडेन्टस यूनियन के संस्थापक अध्यक्ष है जो केरल में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की शाखा है। वह 1971 में पांचवी लोकसभा के सदस्य चुने गये और तिरूवनन्तपुरम में चिटाईंकिल क्षेत्र का प्रतिनिधित्व किया। रवि 1977 में पुनः छठी लोकसभा के सदस्य चुने गये और 1979 तक रहे।

इसके बाद वह प्रदेश की राजनीति में चले गये और 1982 में केरल विधानसभा के सदस्य निर्वाचित हो राज्य के गृहमंत्री पद पर 1986 तक रहे। तत्कालीन मुख्यमंत्री के. करूणाकरन से मतभेद होने पर उन्होंने इस्तीफा दे दिया। वर्ष 1987 में वह पुनः राज्य विधानसभा के सदस्य निर्वाचित हुए और 1991 तक रहे। इसके बाद वह केन्द्र की राजनीति में आए और 1994 और फिर अप्रैल 2003 में वह पुनः राज्यसभा के सदस्य चुने गए 30 जनवरी 2006 को वह केन्द्र सरकार में प्रवासी मामलों के कैबिनेट मंत्री बने। उन्होंने संसदीय कार्य मंत्री पद का कार्यभार भी संभाला।


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