नई दिल्ली। महाभारत का आखिरी चरण। भीम और दुर्योधन अपने वजूद की लड़ाई लड़ रहे थे। कृष्ण को लगा कि शायद इस तरह तो ये युद्ध कभी खत्म नहीं होगा और भीम शायद ही दुर्योधन को हरा पाए। उन्होंने चुपचाप भीम को बताया कि विरोधी का कौन सा हिस्सा सबसे कमजोर है। किस्मत की बात भीम को कृष्ण की सलाह जंच गई और एक ही वार में दुर्योधन जमीन पर था। 2009 की चुनावी महाभारत के भीम थे मनमोहन सिंह और उनकी कृष्ण थीं सोनिया गांधी। आडवाणी को मुंह की खानी पड़ी।
ये भी अजीबोगरीब इत्तिफाक है कि 15वीं लोकसभा के सबसे बड़े पद के ये दावेदार पड़ोसी मुल्क पाकिस्तान में जन्मे। पर दोनों दो अलग-अलग सोचों की नुमाइंदगी करते हैं। एक पीएम इन वेटिंग को बाकायदा प्रोजेक्ट किया गया था तो दूसरे की भविष्यवाणी हो चुकी थी। आडवाणी को अपने पीछे जनता का भरोसा था लेकिन मनमोहन को भरोसा था अपने कृष्ण पर।
वो जननायक नहीं हैं, तो ये कोई बड़ी बात नहीं थी। 2004 की लोकसभा ने एक ऐसी साझेदारी को पैदा दिया, जहां जनसेवक होने के लिए जननायक होना जरूरी नहीं था। मनमोहन कभी प्रधानमंत्री नहीं थे और उन्होंने कभी ऐसा सुलूक भी नहीं किया। वो देश के चीफ एक्जीक्यूटिव ऑफिसर थे क्योंकि पार्टी की कमान सोनिया के हाथ में थी। वो सीईओ के बतौर देश चलाते रहे और सरकार के रोजमर्रा के काम देखते रहे।
मनमोहन-सोनिया की ये जुगलबंदी संसदीय इतिहास में सबसे अनोखी थी। जहां सरकार किसी के हाथ थी और कमान किसी के हाथ। दुनिया भर में मनमोहन एक काफी ताकतवर और फैसले पर अटल प्रधानमंत्री के बतौर देखे गए। बराक ओबामा कहते हैं कि मनमोहन सिंह एक अदभुत शख्स हैं।
अपने देश में मनमोहन सिंह को लोग बेशक यस प्राइम मिनिस्टर कहें पर दुनिया भर में उनके आर्थिक सुधारों का डंका 1991 से ही बज रहा है। उन्होंने दुनिया की शायद ही कोई ऐसी वित्त संस्था छोड़ी हो, जहां वो अहम पद पर न रहे हों। कहते हैं कि जब पहली बार जब उनके दस्तख्त से छपा नोट बाजार में आया तो उनकी पत्नी गुरशरण कौर ने उसे स्मारक के बतौर फ्रेम करवाकर रखना चाहा था लेकिन मनमोहन सिंह ने उन्हें मना कर दिया था। ये बात और है कि सारी पत्नियों की तरह गुरशरण ने अपनी ही चलाई और उनके बंगले के एक कमरे में आज भी वो सौ रुपए का नोट मढ़वाकर रखा है।
राहुल गांधी कहते हैं कि मनमोहन सिंह ने इस देश के लिए जो किया है वो कोई नहीं कर सकता। कई मायनों में हिंदुस्तान के कार्पोरेटाइजेशन का सारा श्रेय मनमोहन सिंह को ही जाता है और शायद इसीलिए जवाहरलाल नेहरू के बाद मनमोहन सिंह पहले भारतीय प्रधानमंत्री हैं जो अपने दफ्तर में दूसरा कार्यकाल निभाएंगे और ये खुद में कोई कम उपलब्धि नहीं क्योंकि मनमोहन सिंह ने ही एक बार कहा था कि उस विचार को साकार होने से कोई नहीं रोक सकता, जिसका वक्त आ गया है। तो क्या मनमोहन सिंह के इस विचार के साकार होने का वक्त आ चुका है।
(IBNkhabar के मोबाइल वर्जन के लिए लॉगआन करें m.ibnkhabar.com पर!)
More on: Manmohan, Primeminister, Oath, kings & queen








कमेंट्स
1