नई दिल्ली। न ब्लैकमेलिंग, न भ्रष्टाचार, न हेकड़ी, न धमकी और न ही चापलूसी। ये हैं मनमोहन सिंह के चलाए पांच ब्रह्मास्त्र जिसके दम पर उनका इरादा अगले पांच साल तक सरकार चलाने का है।
पहला ब्रह्मास्त्र-ब्लैकमेलिंग नहीं चलेगी
शुक्रवार को शपथग्रहण के दौरान डीएमके के किसी सांसद को कैबिनेट मंत्री नहीं बनाया गया। ये इशारा था इस बात का कि अब कांग्रेस किसी भी साथी की धौंसपट्टी नहीं सुनेगी। वो उन लोगों की मांगें किसी भी सूरत में नहीं मानने वाली जो पार्टी को या फिर नई नवेली सरकार को ब्लैकमेल करना चाहेंगे। सो मनमोहन का पहला ब्रह्मास्त्र चला डीएमके नेता करुणानिधि पर। तिलमिलाए और रूठे करुणानिधि उलटे पांव चेन्नई लौट गए। वो अपने परिवार के लिए मलाईदार मंत्रालय के लिए ब्लैकमेल कर रहे थे लेकिन पूरे कुनबे को मंत्री बनवाने का सपना संजोए आए करुणानिधि बैरंग चेन्नई लौट गए। करुणानिधि नई कैबिनेट में अपने बेटा-बेटी-भानजे सहित कम से कम सात मंत्री बनवाना चाहते थे। लेकिन मनमोहन टस से मस नहीं हुए। उन्होंने साफ कर दिया - जो फॉर्मूला दूसरों के लिए वही करुणानिधि के लिए भी।
दूसरा ब्रह्मास्त्र-नहीं चलेगी गलत छवि
पिछली सरकार में कैबिनेट मंत्री रहे शीशराम ओला, हंसराज भारद्वाज जैसे नेताओं को इस बार मंत्रिमंडल में जगह नहीं दी गई। साफ है कि इस बार मनमोहन सिंह ने कुछ और सोचा है। ऐसे नेता जिनके दामन पर दाग लगे या फिर ऐसे नेता जिनके कामकाज पर सवाल उठे, इस कैबिनेट में नजर नहीं आए। मंत्री बनने के लिए क्लीन इमेज जरूरी है।
पिछली सरकार में जहाजरानी मंत्री रहे टी आर बालू पर मंत्री रहते हुए अपने ही परिवार के लोगों को ठेका दिलाने का सनसनीखेज आरोप लगा। ये भी आरोप लगा कि उनके रहते नेशनल हाईवे अथॉरिटी के कामकाज पर असर पड़ा। बालू ने पांच साल में चार बार एनएचएई अध्यक्ष बदले। संसद में भी बालू के कामकाज पर गंभीर आरोप लगाए गए। यही वजह है कि मनमोहन ने इस बार बालू पर अपना दूसरा ब्रह्मास्त्र चला दिया।
इसी वार का दूसरा शिकार बने डीएमके के ही ए राजा। पिछली सरकार में टेलीकॉम मिनिस्टर रहते हुए ए राजा पर स्पेक्ट्रम अलॉटमेंट में गड़बड़ियां करने के आरोप लगे। आरोप था कि उन्होंने एक कंपनी के अलॉटमेंट रद्द कर दूसरी कंपनियों को बीएसएनएल की लाइनें बिछाने का ठेका दिया। क्लीन इमेज के खाके में फिट नहीं बैठने वाले ए राजा को इसलिए मनमोहन ने बाहर ही रखा।
इसी कड़ी में मनमोहन ने राजस्थान कांग्रेस के वरिष्ठ नेता शीशराम ओला का भी पत्ता काट दिया। पिछली बार उन्हें पहले श्रम और रोजगार मंत्री बनाया गया और बाद में कोयला मंत्री। राजस्थान में अशोक गहलोत के मुख्यमंत्री बनने में ओला ने अड़ंगा लगाने की पूरी कोशिश की थी। वो कामयाब तो नहीं हुए, लेकिन कांग्रेस की भद्द काफी पिटी। उन्हें मंत्री न बनाकर अनुशासनहीनता को लेकर संदेश देने की कोशिश की जा रही है।
मनमोहन के ब्रह्मास्त्र का चौथा शिकार हुए कानून मंत्री हंसराज भारद्वाज। गांधी परिवार के काफी करीब समझे जाने वाले भारद्वाज राजीव गांधी और नरसिम्हा राव सरकार के दौरान भी राज्य मंत्री बनाए गए थे। वे सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ वकील हैं और पिछली सरकार में उन्हें कानून मंत्री की कुर्सी दी गई थी। लेकिन क्वात्रोची को क्लीन चिट दिए जाने के मामले में मामला जिस तरह उलझा उससे उनके हुनर पर सवाल उठे। चुनाव के दौरान कांग्रेस को बैकफुट पर डालने के लिए बीजेपी नेता ये मामला बार-बार उठाते रहे। नतीजा वो भी मनमोहन सरकार से बाहर खड़े हैं।
तीसरा ब्रह्मास्त्र-नहीं चलेगी चापलूसी
मनमोहन का तीसरा ब्रह्मास्त्र चापलूसों के खिलाफ चला। तीन दशक से कांग्रेस में छाए रहे अर्जुन सिंह का पत्ता मनमोहन सिंह ने साफ कर दिया। लगता है अर्जुन को इस बात की भनक लग चुकी थी क्योंकि कुछ दिन पहले उन्होंने साफ कहा था कि वो अभी रिटायर नहीं होना चाहते। दरअसल राहुल गांधी को पीएम बनाने के लिए दिया गया अर्जुन सिंह का बयान ही उनके आड़े आ गया।
अर्जुन सिंह का मंत्रिमंडल से बेदखल होना कांग्रेस के लिए एक बड़ी घटना है। जब पार्टी में राहुल और सोनिया गांधी की पकड़ पूरी तरह से मजबूत है तो जीवन भर गांधी परिवार के दरबार में सलाम बजाने वाले अर्जुन सिंह के लिए जगह नहीं रही।
अर्जुन सिंह का पत्ता कटने से संदेश साफ है। गांधी परिवार के करीबी रहना गुनाह नहीं है लेकिन सरेआम पब्लिक के बीचोबीच इस परिवार का हर वक्त गुणगान करना विरोधियों को परिवारवाद और गांधी परिवार के बिना कांग्रेस के जीवित न रह पाने के आरोप लगाने का मौका देता है। जो ऐसा करेगा वो गांधी परिवार का चापलूस समझा जाएगा। अर्जुन सिंह इस कैटेगरी में चाहे न चाहे फिट हो गए। सूत्रों का कहना है कि खास तौर पर राहुल गांधी को चापलूसों से चिढ़ है।
चौथा ब्रह्मास्त्र-नहीं चलेगी धमकी
मनमोहन का चौथा और अहम ब्रह्मास्त्र है किसी की धमकी नहीं सहना। लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को मिली 206 सीटों ने आज मनमोहन को ये ताकत दी है कि वो किसी भी दल की धमकी को हवा में उड़ा दें। मनमोहन की इसी ताकत के चलते आज शपथग्रहण के दौरान समाजवादी पार्टी दूर ही नजर आई। मुलायम सिंह आए जरूर लेकिन दुआ-सलाम के बिना ही लौट गए। न्यूक्लियर डील के मुद्दे पर केंद्र का समर्थन करने के बाद समाजवादी पार्टी का समाजवाद चरम पर था। बाटला हाउस एनकाउंटर पर जिस तरह समाजवादी पार्टी महासचिव अमर सिंह ने केंद्र सरकार से समर्थन वापस लेने की धमकी दी उसकी गूंज राजनीतिक गलियारों में बहुत दिनों तक रही। गठबंधन राजनीति में ये धमकी तब की मनमोहन सरकार ने चुपचाप सही। लेकिन जब चुनाव से पहले मुलायम सिंह ने कांग्रेस को दरकिनार करना शुरू किया तो मनमोहन ने भी अपने हथियार सहेज लिए और आज उनका इस्तेमाल कर दिया।
पांचवां ब्रह्मास्त्र- नहीं चलेगी हेकड़ी
प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने इस हथियार का इस्तेमाल आरजेडी अध्यक्ष लालू यादव पर किया। लालू कांग्रेस को गच्चा देकर और पासवान से साठ-गांठ कर चुनाव मैदान में उतरे लेकिन सिर्फ चार सीटें मिलीं। लालू कोशिश करते रहे कि किसी तरह केंद्रीय मंत्रिमंडल में जगह मिल जाए। दिल्ली आकर गुणा-भाग में भी जुटे लेकिन सब बेकार रहा। मनमोहन की कमान में कांग्रेस ने भी लालू को उनकी हैसियत दिखाने की ठान ली। लालू भले भूल गए लेकिन कांग्रेस नहीं भूल पाई कि चुनाव के दौरान लालू ने कांग्रेस को क्या-क्या कहा था। बाबरी मस्जिद तोड़ने का जिम्मेदार तक बताया था। राजा से रंक बने लालू कांग्रेस से गठबंधन न करने को भूल बताते रहे। सोनिया-मनमोहन का गुणगान भी किया यहां तक कि बिना शर्त समर्थन देने को भी तैयार हो गए लेकिन मनमोहन ने घास नहीं डाली।
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