बुंदेलखंड। आखिर वो कैसे लोग हैं जो अपनी मौत को खुद दावत देते हैं। आखिर उन्हें क्यों ये लगता है कि ये समस्या उनकी जिंदगी का एक हिस्सा है। वो कहते हैं मजबूरी जो न कराए। जी हां, उन मजबूर लोगों की गलती सिर्फ इतनी है कि वे बुंदेलखंड में पैदा हुए। जहां 21वीं सदी के भारत की तस्वीर कुछ ऐसी ही है।
चिलचिलाती गर्मी में गला भिगोने के लिए बुंदेलखंड के हजारों किसान गंदे पानी को पीने के लिए विवश हैं। आलम ये है कि गंदे पानी को ढ़ूंढने के लिए उन्हें भारी मशक्कत करनी पड़ रही है। एक बाल्टी पानी के लिए घरों से मीलों दूर जाना पड़ रहा है। वो भी किसे कुंए या नलकूप पर नहीं बल्कि ऐसी जमीन की तलाश में जहां खुदाई के बाद कुछ पानी मिल जाए।
सरकारी महकमे लोग भी इस दिक्कतों से अनजान नहीं हैं। वो जानते हैं कि हजारों किसान पानी की बूंद बूंद के लिए तरस रहे हैं। लेकिन वो इसी आस के साथ हैं कि सब कुछ ठीक हो जाएगा। लेकिन कब होगा ये पता नहीं।
बुंदेलखंड में पानी की समस्या केवल इस साल की नहीं है। यहां सालों से किसानों को पानी के लिए तरसना पड़ रहा है। लेकिन गर्मियों में ये समस्या भयानक रूप धारण कर लेती है। इस इलाके में बाकायदा नेता पानी के नाम पर वोट मांगते हैं और जीतते भी हैं। लेकिन किसानों की प्यास नहीं बुझ पाती। इस खबर पर आप अपनी राय दें।
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