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नदियों को दोबारा जीवन देने में जुटे हैं जयेश

Posted on Jun 02, 2009 at 17:08 | Updated Jun 11, 2009 at 15:35

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नवसारी। गुजरात के सिटीज़न जर्नलिस्ट जयेश नायक एक रिपोर्ट के जरिए हमें बताना चाहते हैं कि किस तरह दिन रात नदियों से रेत निकाला जा रहा है और रेत के इस अवैध खनन से पानी के ये स्रोत बर्बाद हो रहे हैं।

जयेश नायक एक किसान हैं। उनकी ही तरह जैसे नवसारी के कई किसान आज दिन-ब-दिन कम होती पैदावार और धीरे-धीरे बंजर होती ज़मीन को लेकर काफी परेशान हैं।

दक्षिण गुजरात का नवसारी इलाका जहां के काफी गांवों में पानी धीरे-धीरे खारा होता जा रहा है। इससे फसल को नुकसान पहुंच रहा है। ये खारा पानी न तो पीने लायक है और न ही खेती के लायक।




पानी केवल खारा ही नहीं हो रहा बल्कि ज़मीन के अंदर इसका स्तर भी लगातार कम होता जा रहा है। इसकी सबसे बड़ी वज़ह नवसारी की नदियों से अवैद्य रूप से रेत निकालना। रेत निकालने से नदियों का पट चौड़ा हो रहा है और पानी में खारापन बढ़ता जा रहा है।

जयेश पिछले 7 साल से दक्षिण गुजरात की नदियों को बचाने की कोशिश कर रहे हैं। केवल नवसारी की नदी से ही नहीं बल्कि रेत निकालने का ये अवैध धंधा पूरे दक्षिण गुजरात की नदियों से हो रहा है। अंबिका, पूर्णा, कावेरी, औरंगा, तापी, दमणगंगा, खापरा, मान और कान नदियों से दिन-रात मैनुअली और मैकेनाइज्ड तरीके से रेत निकाला जा रहा है।

इससे ज़मीन का कटाव बढ़ रहा है। अवैध रुप से लगातार रेत निकालने से केवल पानी ही खारा नहीं हो रहा है बल्कि नदी में डूबने से कई लोगों की मौत भी हो रही है।

मरे लोगों की मौत की वज़ह कोई हादसा नहीं थी। इन्हें नहीं पता था कि जिस नदी में ये नहाने गए हैं उसमें गहरा गड्ढा हो चुका है। असल में, रेत निकालने से नदियों में 40 से 100 फीट गहरा गड्ढा हो जाता है और नदी का तट बड़ा हो जाता है। अवैध रूप से रेत की इस कटाई से पर्यावरण को तो नुकसान पहुंच ही रहा है साथ ही साथ नदी का इस्तेमाल करने आए लोगों को इसकी गहराई का अंदाजा नहीं लग पाता है। आए दिन यहां हादसे होते रहते हैं।

जयेश ने कई बार प्रशासन को इसके बारे में लिखा है। लेकिन अब तक कोई कार्रवाई नहीं की गई है। क्या ये संभव है कि दक्षिण गुजरात की करीब 9 नदियों से दिन रात अवैध रूप से रेत निकालने का धंधा हो और प्रशासन को इसकी कानों-कान खबर ना हो।

जयेश स्थानीय प्रशासन और सरकार से ये पूछना चाहते हैं कि अब तक कोई कार्रवाई क्यों नहीं की गई है। क्या सरकार तब जागेगी जब नदियों से रेत खत्म हो जायेगा, जब भूमिगत जल पूरी तरह खारा हो जाएगा, जब किसानों को मजबूरी में खेती करने से तौबा कर लेनी पड़ेगी, जब पीने का पानी खत्म हो जायेगा और क्या सरकार तब जागेगी जब भूमिगत जल का स्रोत भी सूख जायेगा।

दक्षिण गुजरात की नदियों को बचाने की शुरुआत जयेश ने अपने इलाके की अंबिका नदी से शुरू की है। इसके लिए उन्होंने एक संगठन बनाया है- 'अंबिका नदी बचाओ जनहित रक्षा अभियान।' जयेश ने गुजरात हाई कोर्ट में एक रिट दाखिल की है।

जयेश का मानना है कि कोई भी काम तब तक सफल नहीं हो सकता जब तक इसमें आम लोगों की भागीदारी न हो। आज नदियों को बचाने की इस मुहिम में करीब 1.50 लाख लोग जुड़ चुके हैं। इसमें वैसे लोग शामिल हैं जिनकी रोजी-रोटी नदियों से जुड़ी हुई हैं और इसमें वैसे लोग भी शामिल हैं जिन्होंने इस अवैध धंधे की वज़ह से अपनों को खोया है।

इस अवैद्य धंधे को रोकने की पहल अगर कहीं से हो सकती है तो वो है स्थानीय प्रशासन के स्तर से। जयेश ने नवसारी के जिलाधिकारी से इस संबध में सवाल किया लेकिन वहां भी निराशा ही हाथ लगी।

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