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वनविभाग की धांधली से बलि चढ़ रहे पेड़

Posted on Jun 02, 2009 at 17:10 | Updated Jun 02, 2009 at 17:25

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नई दिल्ली। पर्यावरण को लेकर सबसे बड़ी समस्या यह है कि सरकार और अधिकारी खुद ही इन मुद्दों को लेकर लापरवाह हैं। या तो हमारे पास सख्त कानून नहीं और अगर कानून हैं तो उन्हें कड़ाई से लागू नहीं किया जाता। कुछ ऐसा ही हो रहा है दिल्ली में। दिल्ली में हरे-भरे पेड़ काटना भी बहुत आसान है क्योंकि इसके लिए तय किए गए जुर्माने में बेहद घोटाला है। दिल्ली के प्रवीन नारंग बने हैं सिटीज़न जर्नलिस्ट और बता रहे हैं इस धांधली की बजह।

Delhi Trees Preservation Act 1994 के मुताबिक किसी भी पेड़ के कटने पर वन अधिकारी कटे पेड़ का पूरा मुआयना करता है। पेड़ की उम्र और उसकी अहमियत के हिसाब से मुआवजे की कीमत तय की जाती है। ये मुआवजा 10000 रू तक कुछ भी हो सकता है। यहीं से शुरू होती है धांधली और नियमों के साथ खिलवाड़। वन अधिकारी ही ये तय करता है की काटे गए पेड़ का मुआवजा कितना हो। मुआवजा तय करने को लेकर कोई लिखित नियम नहीं हैं और इसका फायदा उठाते हैं भ्रष्ट अधिकारी।

दिल्ली में हो ये रहा है कि वन विभाग के अधिकारियों के साथ सांठ-गांठ कर लोग धड़ल्ले से पेड़ काट रहे हैं। कटे हुए पेड़ों के बदले कितने पेड़ कहां लगाए जाते हैं इसका भी कोई हिसाब-किताब नहीं रहता।




पेड़ों को लेकर नियमों और उनके लागू होने में क्या गड़बड़ियां है ये जानने के लिए प्रवीन ने वन एंव पर्यावरण मंत्रालय में एक आरटीआई दाखिल की। RTI के जरिए प्रवीन ने जाना कि दिल्ली भर में इस तरह की धांधली और हेराफेरी के कई मामले हैं।

मनोज कटारिया नामक एक शख्स ने छत्तरपुर इलाके में अपने फार्म हाउस की सुंदरता के लिए 415 पेड़ कटवा दिए। जुर्माने के तौर पर उसने भरे 59,075 रुपए। जबकि कानूनन उसे 41,50,000 रुपए अदा करने चाहिए थे।

दूसरी तरफ जब सरकार ने कॉमन वेल्थ गेम्स की निर्माण परियोजना के लिए दिल्ली रिज के आस-पास से 400 पेड़ काटवाए तो उस पर 3.25 करोड़ का जुर्माना लगा। साल 2003 में सुरेंद्र वासुदेव नाम के एक शख्स ने निजी फायदे के लिए पीपल, शीशम और नीम के 42 पेड़ काट डाले। काटे गए हर पेड़ के लिए जुर्माने के तौर पर 10 पेड़ लगाने का प्रावधान है लेकिन वन विभाग ने इस शख्स को 210 पेड़ लगाने का आदेश दिया। यही नहीं ये 210 पेड़ सुरेन्द्र ने कहां लगाए इस बात की भी वन विभाग को कोई जानकारी नहीं।

यानी निजी तौर पर जो पेड़ काटे जाते हैं उनमें सरकारी मिलीभगत से जुर्माना कम लिया जाता है। गैर सरकारी आंकड़ों के मुताबिक पिछले चार से पांच साल में दिल्ली में 40,000 से ज्यादा पेड़ कट चुके हैं। यानी भ्रष्ट वन अधिकारियों की वजह से सरकार को हर साल लाखों का नुक्सान हो रहा है।

कानून के साथ खिलवाड़ की एक वजह ये भी है कि डेल्ही ट्रीज प्रीजर्वेशन एक्ट अपने आप में बहुत कमज़ोर है। वन विभाग ने पेड़ों की जो कीमत तय कर रखी है वो साल 1994 के हिसाब से है। जबकि समय के साथ लकड़ी की कीमत कई गुना बढ़ चुकी। जिस तेज़ी से पेड़ कट रहे हैं इसके लिए ज़रूरी है कानून में बदलाव किये जाए और इसे सख्ती से लागू किया जाए।

पेड़ों के मुआवजे में घोटाले को लेकर प्रवीन ने डिपार्टमेंट ऑफ फॉरेस्ट एंड एन्वायरमेंट , सेट्रल विजिलेंस कमिश्न और लेफ्टिनेंट गवर्नर सभी को लिखा। RTI के जरिए ये भी जानना चाहा की किस आधार पर प्राइवेट ऑर्गेनाइजेशन से इतने कम पैसे वसूले जा रहे हैं और जो पेड़ कट रहे हैं उनके बदले नए पेड़ कहां लगाए जा रहे हैं। लेकिन उन्हें कोई जवाब नहीं मिला।

दिल्ली की हरियाली भ्रष्टाचार की भेंट न चढ़े इसके लिए प्रवीन ने हर संभव कोशिश की। सिटिज़न जर्नलिस्ट टीम के साथ वो डिपार्टमेंट ऑप फॉरेस्ट एंड एन्वायरमेंट गए ये जानने कि पेड़ों की कटाई के बदले मुआवजे में इतना घोटाला क्यों है।

प्रवीन दिल्ली वालों से अपील करते हैं की वो इस बात को समझे की पेड़ हमारे इको सिस्टम के लिए कितने ज़रूरी हैं और उन्हें इतनी आसानी से ख़त्म न होने दे।

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